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मुखड़े पे गेसू आ गए आधे इधर आधे उधर…किशोर कुमार की मीठी शिकायत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 44

दोस्तों, कुछ दिन पहले ‘ओल्ड इस गोल्ड’ में हमने आपको किशोर कुमार का गाया और सी रामचंद्र का संगीतबद्ध किया हुआ फिल्म “आशा” का मशहूर गीत सुनवाया था “ईना मीना डीका”. यह गीत किशोर और सी रामचंद्र की जोडी का शायद सबसे लोकप्रिय गीत रहा है. यूँ तो इस गायक – संगीतकार की जोडी ने साथ साथ बहुत ज़्यादा काम नहीं किया, लेकिन एक और ऐसी फिल्म है जिसमें इन दोनो ने अपने अपने हुनर के जलवे दिखाए, और वो फिल्म है “पायल की झंकार”. आज ‘ओल्ड इस गोल्ड’ में एक बार फिर से किशोर कुमार और सी रामचंद्र को सलाम करते हुए आप की खिदमत में हम लेकर आए हैं पायल की झंकार फिल्म का एक बडा ही अनूठा सा गीत जिसे आपने बहुत दिनों से शायद सुना नहीं होगा. क़मर जलालाबादी ने इस गीत को लिखा था. सन 1966 में बनी फिल्म “पायल की झंकार” के मुख्य कलाकार थे किशोर कुमार, राजश्री और ज्योति लक्ष्मी. इसी शीर्षक से राजश्री प्रोडक्शन ने 1980 में एक फिल्म बनाई थी, और 1980 की इस फिल्म में गायिका अलका याग्निक ने अपना पहला हिन्दी फिल्मी गीत गाया था.

बहरहाल 1980 से हम वापस आते हैं 1966 की फिल्म “पायल की झंकार” पे. “मुखड़े पे गेसू आ गये आधे इधर आधे उधर”. इस गीत को सुनते हुए आप यह महसूस करेंगे कि यूँ तो शास्त्रीय संगीत को आधार मानकर इस गीत को बनाया गया है लेकिन ‘इंटरल्यूड म्यूज़िक’ में एक पाश्चात्य रंग भी है. और अंतरे में फिर से वही शास्त्रीय रंग वापस आ जाता है. कुल मिलाकर इस गीत का संगीत संयोजन कमाल का है. क़मर साहब ने भी इस गीत में अपने शब्दों से जान डाल दी है, वो लिखते हैं “आज हमने रूप देखा चाँदनी के भेस में, एक परदेसी बेचारा लुट गया परदेस में, दिल के दुश्मन आ गये आधे इधर आधे उधर”. नायिका के चेहरे की खूबसूरती को छुपाने वाले गेसुओं से शिकायत की गयी है इस गीत में लेकिन बडे ही खूबसूरत अंदाज़ में. इस गीत के लिए ज़्यादा कुछ कहने के बजाए यही बेहतर होगा कि इस गाने को सुना जाए और इसका आनंद उठाया जाए.

और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला “ओल्ड इस गोल्ड” गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं –

१. शैलेन्द्र, आशा भोंसले, मोहम्मद रफी और शंकर जयकिशन की टीम.
२. पेरिस में शाम बिताते शम्मी कपूर और शर्मीला टैगोर.
३. अंतरे में पंक्ति है – “नींद तो अब तलक जाके लौटी नहीं…”

कुछ याद आया…?

पिछली पहेली का परिणाम –
नीरज जी इकलौते विजेता रहे इस बार. मुश्किल था पर आपने क्या खूब पकडा. मज़ा आ गया. गले लग कर बधाई. शोभा जी, नीलम जी, राज भाटिया जी और शन्नो जी, आप सब ने गीत का आनंद लिया जानकार ख़ुशी हुई. मनु जी कोई बात नहीं आज कोशिश कीजिये, और किशोर कुमार का ये गाना कैसा लगा ये भी बताईयेगा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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