Uncategorized

जब दिल ही टूट गया….सहगल की दर्द भरी आवाज़ और मजरूह के बोल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 329/2010/29

‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ में पिछले तीन दिनो से आप शरद तैलंग जी के पसंद के गाने सुनते आ रहे हैं, जो ‘महासवाल प्रतियोगिता’ में सब से ज़्यादा सवालों के सही जवाब देकर विजेयता बने थे। आज उनकी पसंद का आख़िरी गीत, और गीत क्या साहब, यह तो ऐसा कल्ट सॊंग् है कि ६५ साल बाद भी लोग इस गीत को भुला नहीं पाए हैं। कुंदन लाल सहगल की आवाज़ में बेहद मक़बूल, बेहद ख़ास, नौशाद साहब की अविस्मरणीय संगीत रचना “जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे”। फ़िल्म ‘शाहजहाँ’ का यह मशहूर गीत लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने। दोस्तों, अब तक ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ में आपने सहगल साहब के कुल दो गीत सुन चुके हैं। एक तो हाल ही में उनकी पुण्यतिथि पर फ़िल्म ‘ज़िंदगी’ की लोरी “सो जा राजकुमारी” सुनवाया था, और एक गीत हमने आपको फ़िल्म ‘शाहजहाँ’ से ही सुनवाया था “ग़म दिए मुस्तक़िल” अपने ५०-वें एपिसोड को ख़ास बनाते हुए। लेकिन उस दिन हमने इस फ़िल्म की चर्चा नहीं की थी, बल्कि नौशाद साहब की सहगल साहब पर लिखी हुई कविता से रु-ब-रु करवाया था। तो आज ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ में फ़िल्म ‘शाहजहाँ’ की बातें। यह सन् १९४६ की एक सुपरहिट फ़िल्म थी जिसका निर्माण व निर्देशन ए. आर. कारदार साहब ने किया था। सहगल साहब के अलावा फ़िल्म के मुख्य कलाकारों में थे रागिनी, जयराज और नसरीन। यह सहगल साहब की अंतिम मशहूर फ़िल्म थी। और यह एकमात्र फ़िल्म है सहगल साहब का जिसमें नौशाद साहब का संगीत है। इस फ़िल्म ने इस इंडस्ट्री को दो नए गीतकार दिए मजरूह सुल्तानपुरी और ख़ुमार बाराबंकवी के रूप में। जहाँ एक तरफ़ ख़ुमार साहब के गानें केवल दस सालों तक ही सुनाई दिए, मजरूह साहब ने ५ दशकों तक इस इंडस्ट्री में राज किया। जहाँ तक इस फ़िल्म में सहगल साहब के गाए हुए गीतों का सवाल है, “ग़म दिए मुस्तक़िल” और आज के प्रस्तुत गीत के अलावा “ऐ दिल-ए-बेक़रार झूम”, “चाह बरबाद करेगी हमें मालूम न था”, “छिटकी हुई है चांदनी”, “मेरे सपनों की रानी रुही रुही रुही” और “कर लीजिए चलकर मेरी जन्नत के नज़ारे” जैसे कामयाब गानें गाए सहगल साहब ने।

नौशाद साहब का दिमाग़ बहुत ही इन्नोवेटिव था तकनीकी दृष्टि से। उन्होने ही हिंदी फ़िल्म संगीत में पहली बार साउंड मिक्सिन्ग् और ट्रैक रिकार्डिंग् की शुरुआत की। यानी कि बोल और संगीत के लिए अलग अलग ट्रैक्स का इस्तेमाल। इस तक़नीक ने आगे चलकर फ़िल्म संगीत को एक नई दिशा दिखाई। और यह पहली बार नौशाद साहब ने फ़िल्म ‘शाहजहाँ’ में ही कर दिखाया था कि सहगल साहब की आवाज़ एक ट्रैक पर रिकार्ड हुई और उसका संगीत एक अन्य ट्रैक पर। ४० के दशक के लिहाज़ से यह हैरान कर देने वाली ही बात है! ख़ैर, “जब दिल ही टूट गया” गीत आधारित है राग भैरवी पर। सहगल साहब को समर्पित जयमाला में नौशाद साहब यह गीत बजाते हुए सहगल साहब को याद करते हुए ये कहा था – “किसी महबूबा के ग़म से दिल पाश पाश हो गया होगा! मैंने भी इसी ख़यालात का एक गीत फ़िल्म ‘शाहजहाँ’ के लिए बनाया था। मजरूह सुल्तानपुरी के इस गीत को गाया था महान गायक कुंदन लाल सहगल ने। उनको तो यह गीत इतना पसंद था कि मरने से पहले अपने घरवालों और अपने दोस्तों से उन्होने वसीयत की कि मेरे आख़िरी सफ़र में शमशान की भूमि तक यही गीत बजाते रहना कि “जब दिल ही टूट गया“। और लोगों ने उनकी यह वसीयत पूरी भी की।” दोस्तों, हम भी शरद जी की फ़रमाइश पूरी करते हैं इस गीत को सुनवाकर, आइए सुनते हैं।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

कोई दोस्त न दुश्मन, रहजन न रहबर है,
है सोने को धरती तो ओढने को अम्बर है,
अब कोई फूल बिछाए या सीने ताने बन्दूक,
दिल तो फकीर का अब गहरा समुन्दर है…

अतिरिक्त सूत्र -आवाज़ है आशा भोसले और साथियों की इस गीत में

पिछली पहेली का परिणाम-
वाह जी अवध जी लौटे हैं एक बार फिर, २ अंकों के लिए बधाई…शरद जी को धन्येवाद दे ही चुके हैं, निर्मला जी और अनुराग जी का भी बहुत आभार

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना –सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Related posts

पॉडकास्ट कवि सम्मेलन – दिसम्बर २००८

Amit

पीपरा के पतवा सरीके डोले मनवा…मिटटी की सौंधी सौंधी महक लिए "गोदान" का ये गीत

Sajeev

हरिहर झा का काव्य-पाठ (Kavya-Paath of Harihar Jha)

Amit