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आज पिया तोहे प्यार दूं….पॉडकास्टर गिरीश बिल्लोरे की यादों को सहला जाता है ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 407/2010/107

संदीदा गीतों की इस शृंखला को आगे बढ़ाते हुए आज हमने एक ऐसे शख़्स का फ़रमाइशी गीत चुना है जो ख़ुद एक कवि हैं, एक मशहूर ब्लॊगर हैं, पॊडकास्ट के क्षेत्र में इनका एक मशहूर ब्लॊग है। इस शख़्स को उभरते गायक आभास जोशी के मार्गदर्शक और गुरु कहा जा सकता है, जिन्होने आभास की पहली ऐल्बम के लिए गीत लिखे हैं। जी हाँ, इस शख़्स का नाम है गिरिश बिल्लोरे। गिरिश जी की पसंद के गीत के बारे में उन्हे के शब्द प्रस्तुत है – “आजा पिया तोहे प्यार दूँ”, जो मेरी उस मित्र ने गाया था जिसे पहला प्यार कहा जा सकता है। उस दौर मे सामाजिक अनुशासन के चलते बस मैं खुद प्यार का इज़हार न कर सका। जानते हैं उसने मुझे दिल की बात बेबाक कह देने की नसीहत दी थी। आज वो अपने परिवार मे खुश है। अब बस वो रोमान्टिक एहसास है मेरे पास और अपना प्रतिबंधों के सामने घुटने टेक देने का अहसास।” गिरिश जी, आपके जीवन इन बातों को जानकर हमें अफ़सोस हुआ। हम आपको बस यही मानने की सलाह देंगे कि “तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है, मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों, तू कहीं भी हो मेरे साथ है”। आज आपकी पसंद पर हम सुनवा रहे हैं १९६७ की फ़िल्म ‘बहारों के सपनें’ से आशा पारेख पर फिल्माया हुआ लता मंगेशकर का गाया “आजा पिया तोहे प्यार दूँ”। मजरूह सुल्तानपुरी के बोल और राहुल देव बर्मन का संगीत। पंचम पर केन्द्रित शुंखला के अन्तर्गत हमने इस फ़िल्म से “चुनरी संभाल गोरी” गीत आपको सुनवाया था और फ़िल्म की तमाम जानकारी भी दी थी।

क्योंकि प्रस्तुत गीत के साथ लता, पंचम और मजरूह साहब की तिकड़ी जुड़ी हुई है, इसलिए हमने सोचा कि क्यों ना मजरूह साहब द्वारा प्रस्तुत उस ‘जयमाला’ कार्यक्रम के कुछ अंश यहाँ पेश किए जाएँ, जिसमें उन्होने ना केवल लता जी और पंचम के बारे में कहे थे बल्कि दो गानें बैक टू बैक सुनवाए थे जो लता के गाए, पंचम के स्वरबद्ध किए हुए और ख़ुद के लिखे हुए थे। ये हैं वो अंश – “तो मेरे सिपाहियों, अब एक ख़ुशख़बरी भी सुन लीजिए जिसे मैंने, आर. डी. बर्मन ने और लता ने मिलकर आप के सामने पेश किया है। फ़िल्म है ‘सवेरेवाली गाड़ी’।” यहाँ पर “दिन प्यार के आएँगे सजनिया” बजाया जाता है। गीत ख़त्म होते ही मजरूह साहब कहते हैं – “तो मेरे अज़ीज़ फ़ौजी भाइयों, लता जी की इस आवाज़ के बाद, वैसे तो सभी को आप ने अपने दिलों में बसाया है, यह मेरी ज़ाती पसंद है, बुरा मानने की कोई बात नहीं, लेकिन लता जी की आवाज़ सुनने के बाद जी नहीं चाहता कि कोई दूसरी आवाज़ आए। यह आवाज़ सदियों में पैदा होती है। तो ‘बहारों के सपनें’ फ़िल्म का एक गाना पेश है जिसे लिखा मैंने और संगीत आर. डी. बर्मन का है। देखिए, कैसा लगता है!” तो आइए सुना जाए गिरिश बिल्लोरे की पसंद पर यह गीत जो याद उन्हे दिलाती है अपने पहले प्यार की, उन मीठी यादों की।

क्या आप जानते हैं…
कि मजरूह सुल्तानपुरी को दादा साहब फाल्के पुरस्कार सन् १९९४ में मिला था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. फिल्म के नाम में एक ही शब्द का दो बार इस्तेमाल हुआ है, गीत बताएं -३ अंक.
2. शंकर जयकिशन का संगीतबद्ध ये गीत किसकी कलम से निकला है- २ अंक.
3. बप्पी सोनी के निर्देशन में बनी इस फिल्म के प्रमुख कलाकार कौन कौन थे-२ अंक.
4. फिल्म का नाम बताएं -२ अंक.

विशेष सूचना -‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
सभी धुरंधर इन दिनों बेहद सावधानी से जवाब दे रहे हैं…..बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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