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तेरी नज्म से गुजरते वक्त खदशा रहता है…

चाहे बात हो गुलज़ार साहब की या जिक्र छिड़े अमृता प्रीतम का, एक नाम सभी हिन्दी चिट्टाकारों के जेहन में सहज ही आता है- रंजना भाटिया का, जिन्होंने इन दोनों हस्तियों पर लगातार लिखा है और बहुत खूब लिखा है, आज हम जिस एल्बम का जिक्र आवाज़ पर कर रहें हैं उसमें संवेदनायें हैं अमृता की तो आवाज़ है गुलज़ार साहब की. अब ऐसे एल्बम के बारे में रंजना जी से बेहतर हमें कौन बता सकता है. तो जानते हैं उन्हीं से क्या है इस एल्बम की खासियतें –

तेरी नज्म से गुजरते वक्त खदशा रहता है
पांव रख रहा हूँ जैसे ,गीली लैंडस्केप पर इमरोज़ के
तेरी नज्म से इमेज उभरती है
ब्रश से रंग टपकने लगता है

वो अपने कोरे कैनवास पर नज्में लिखता है ,
तुम अपने कागजों पर नज्में पेंट करती हो

-गुलजार

अमृता की लिखी नज्म हो और गुलजार जी की आवाज़ हो तो इसको कहेंगे सोने पर सुहागा …..दोनों रूह की अंतस गहराई में उतर जाते हैं ..रूमानी एहसास लिए अमृता के लफ्ज़ हैं तो मखमली आवाज़ में गुलजार के कहे बोल हैं इसको गाये जाने के बारे में गुलजार कहते हैं की यह तो ऐसे हैं जैसे “दाल के ऊपर जीरा” किसी ने बुरक दिया हो ..गुलजार से पुरानी पीढी के साथ साथ आज की पीढी भी बहुत प्रभावित है ..उनके लिखे बोल .गाए लफ्ज़ हर किसी के दिल में अपनी जगह बना लेते हैं ..पर गुलजार ख़ुद भी कई लिखने वालों से बहुत ही प्रभावित रहे हैं ..अमृता प्रीतम उन में से एक हैं …अमृता प्रीतम पंजाबी की जानी मानी लेखिका रही हैं …

गुलजार जी पुरानी यादों में डूबता हुए कहते हैं कि .मुझे ठीक से याद नही कि मैं पहली बार उनसे कब मिला था …पर जितना याद आता है .तो यह कि तब मैं छात्र था और साहित्य कारों को सुनने का बहुत शौक था ..अमृता जी से शायद में पहली बार “एशियन राईटर की कान्फ्रेंस” में मिला था एक लिफ्ट मैं जब मैं वहां ऊपर जाने के लिए चढा तब उसी लिफ्ट मैं अमृता प्रीतम और राजगोपालाचारी भी थे .जब उनसे मिला तो उनसे बहुत प्रभावित हुआ उनकी नज्मों को पढ़ते हुए ही वह बड़े हुए और उनकी नज्मों से जुड़ते चले गए और जब भी दिल्ली आते तो उनसे जरुर मिलते ..तब तक गुलजार भी फ़िल्म लाइन में आ चुके थे.

अमृता जी की लिखी यह नज्में गुलजार जी की तरफ़ से एक सच्ची श्रद्दांजली है उनको ..उनकी लिखी नज्में कई भाषा में अनुवादित हो चुकी है .पर गुलजार जी आवाज़ में यह जादू सा असर करती हैं ..इस में गाई एक नज्म अमृता की इमरोज़ के लिए है .

मैं तुम्हे फ़िर मिलूंगी …
कहाँ किस तरह यह नही जानती
शायद तुम्हारे तख्यिल की कोई चिंगारी बन कर
तुम्हारे केनवास पर उतरूंगी
या शायद तुम्हारे कैनवास के ऊपर
एक रहस्यमय रेखा बन कर
खामोश तुम्हे देखती रहूंगी


गुलजार कहते हैं की यदि इस में से कोई मुझे एक नज्म चुनने को कहे तो मेरे लिए यह बहुत मुश्किल होगा ..क्योँ की मुझे सभी में पंजाब की मिटटी की खुशबू आती है ..और मैं ख़ुद इस मिटटी से बहुत गहरे तक जुडा हुआ हूँ ..यह मेरी अपनी मात्र भाषा है .. अमृता की लिखी एक नज्म दिल को झंझोर के रख देती है …और उसको यदि आवाज़ गुलजार की मिल गई हो तो ..दिल जैसे सच में सवाल कर उठता है …

आज वारिस शाह से कहती हूँ
अपनी कब्र से बोलो !
और इश्क की किताब का कोई नया वर्क खोलो !
पंजाब की एक बेटी रोई थी ,
तुने उसकी लम्बी दास्तान लिखी
आज लाखों बेटियाँ रो रही है वारिस शाह !
तुमसे कह रही है :

इसकी एक एक नज्म अपने में डुबो लेती है ..और यह नशा और भी अधिक गहरा हो जाता है ..जब गुलजार जी की आवाज़ कानों में गूंजने लगती है ..यह नज्में वह बीज है इश्क के जो दिल कि जमीन पर पड़ते ही कहीं गहरे जड़े जमा लेते हैं ..और आप साथ साथ गुनगुनाने पर मजबूर हो जाते हैं ..

एक जमाने से
तेरी ज़िन्दगी का पेड़
कविता ,कविता
फूलता फलता और फैलता
तुम्हारे साथ मिल कर देखा है
और जब
तेरी ज़िन्दगी के पेड़ ने
बीज बनना शुरू किया
मेरे अन्दर जैसे कविता की
पत्तियां फूटने लगीं है ..

और जिस दिन तू पेड़ से
बीज बन गई
उस रात एक नज्म ने
मुझे पास बुला कर पास बिठा कर
अपना नाम बताया
अमृता जो पेड़ से बीज बन गई

गुलज़ार की आवाज़ में अमृता प्रीतम की कविताओं की यह CD टाईम्स म्यूजिक ने जारी की है, इसकी कुछ झलकियाँ आप आज आवाज़ पर सुन सकते हैं (कृपया नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें).पूरी CD आप यहाँ से खरीद सकते हैं,आप भी इस नायाब संकलन को हमेशा के लिए अपनी संगीत लाइब्रेरी का हिस्सा अवश्य बनाना चाहेंगे.

प्रस्तुति – रंजना भाटिया “रंजू”

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