Tag : noorjahan

Dil se Singer

मल्लिका ए तरन्नुम नूरजहाँ से आज की महफ़िल में सुनेंगे आदमी की पहचान कैसे हो

Pooja Anil
महफ़िल ए कहकशाँ 21 नूरजहाँ  दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित “कहकशां” और “महफिले ग़ज़ल” का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, “महफिल ए...
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गायिका नूरजहाँ के गाये अनमोल गीत

कृष्णमोहन
भारतीय सिनेमा के सौ साल – 35 कारवाँ सिने-संगीत का ‘आजा तुझे अफ़साना जुदाई का सुनाएँ…’ : नूरजहाँ   भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में...
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हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाये….और धीरे धीरे प्रेम में गुजारिशों का दौर शुरू हुआ

Sajeev
ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 552/2010/252 ‘एक मैं और एक तू’ – फ़िल्म संगीत के सुनहरे दशकों से चुने हुए युगल गीतों से सजी ‘ओल्ड...
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ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२१), जब नूरजहाँ की पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया पार्श्वगायिका शारदा ने

Sajeev
‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है इस साप्ताहिक विशेषांक में। आज फिर एक बार बारी ‘ईमेल के बहाने यादों के...
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ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने – जब १९५२ में लता ने जनमदिन की बधाई दी थी नूरजहाँ को

Sajeev
ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष’ में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। इस साप्ताहिक स्तंभ में हम आप तक हर हफ़्ते पहूँचाते हैं आप...
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आहें ना भरी शिकवे ना किए और ना ही ज़ुबाँ से काम लिया….इफ्तार की शामों में रंग भरती एक शानदार कव्वाली

Sajeev
ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 471/2010/171 ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ के सभी दोस्तों का फिर एक बार स्वागत है इस सुरीली महफ़िल में। दोस्तों, माह-ए-रमज़ान चल...
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रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ.. नूरजहां की काँपती आवाज़ में मचल पड़ी ग़ालिब की ये गज़ल

Amit
महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७३ लाजिम था कि देखो मेरा रस्ता कोई दिन और, तनहा गये क्यों अब रहो तनहा कोई दिन और। ग़ालिब की ज़िंदगी बड़ी हीं...
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आवाज़ दे कहाँ है…ओल्ड इस गोल्ड में पहली बार बातें गायक/अभिनेता सुरेन्द्र की

Sajeev
ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 347/2010/47 ४० का दशक हमारे देश के इतिहास में राष्ट्रीय जागरण के दशक के रूप में याद किया जाता है।...
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दिया जलाकर आप बुझाया तेरे काम निराले…याद करें नूरजहाँ और उनकी सुरीली आवाज़ को इस गीत में

Sajeev
ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 346/2010/46 इन दिनों ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ के अंतर्गत हम आपको ४० के दशक के हर साल का एक सुपरहिट गीत...
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दुखाए दिल जो किसी का वो आदमी क्या है.. मुज़फ़्फ़र वारसी के शब्दों के सहारे पूछ रही हैं मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहां

Amit
महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६८ पिछली दो कड़ियों से न जाने क्यों वह बात बन नहीं पा रही थी, जिसकी दरकार थी। वैसे कारण तो हमें भी पता...