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ईन मीना डीका…रम पम पोस रम पम पोस….

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 28

निर्देशक एम् वी रमण किशोर कुमार को बतौर नायक दो फिल्मों में अभिनय करवा चुके थे. 1954 की फिल्म “पहली झलक” में और 1956 की फिल्म “भाई भाई” में. 1957 में जब रमण साहब ने खुद फिल्म निर्माण का काम शुरू किया तो अपनी पहली निर्मित और निर्देशित फिल्म “आशा” में किशोर कुमार को ही बतौर नायक मौका दिया. नायिका बनी वैजैन्तीमाला. “पहली झलक” में राजेंदर कृष्ण और हेमंत कुमार पर गीत संगीत का भार था तो “भाई भाई” में राजेंदर कृष्ण और मदन मोहन पर. “आशा” में एक बार फिर राजेंदर कृष्ण ने गीत लिखे, लेकिन संगीतकार एक बार फिर बदलकर बने सी रामचंद्र. इस फिल्म में सी रामचंद्र ने एक ऐसा गीत दिया किशोर कुमार और आशा भोंसले को जो इन दोनो के संगीत सफ़र का एक मील का पत्थर बनकर रह गया. “ईना मीना डीका” का शुमार सदाबहार ‘क्लब सॉंग्स’ में होता है. इस गीत की धुन, ‘ऑर्केस्ट्रेशन’, संगीत संयोजन, और ‘कॉरल सिंगिंग’, कुल मिलकर यह गीत उस ज़माने के ‘क्लब्स’ और ‘पार्टीस’ में बजनेवाले ‘ऑर्केस्ट्रा’ को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था. इस गीत के दो ‘वर्ज़न’ हैं, एक किशोर कुमार की आवाज़ में और दूसरे में आशा भोंसले की आवाज़ है. आशाजी की आवाज़ कभी और, आज आपको किशोर-दा की आवाज़ में यह गीत सुनवा रहे हैं.

“ईना मीना डीका” हिन्दी फिल्म संगीत के पहले ‘रॉक एन रोल’ गीतों में से एक है. ऐसा कहा जाता है कि सी रामचंद्र के संगीत कक्ष के बाहर कुछ बच्चे खेल रहे थे और “ईनी, मीनी, मिनी, मो” जैसे शब्द बोल रहे थे. इसी से प्रेरित होकर उन्होने अपने सहायक जॉन गोमेस के साथ मिलकर इस गीत के पहले ‘लाइन’ का ईजाद किया – “ईना मीना डीका, दे डाई दमनिका”. जॉन गोमेस, जो की गोआ के रहनेवाले थे, उन्होने आगे गीत को बढाया और कहा “मका नाका”, जिसका कोंकनी में अर्थ है “मुझे नहीं चाहिए”. इस तरह से वो शब्द जुड्ते चले गये और “रम रम पो” पे जाके उनकी गाडी रुकी. है ना मज़ेदार किस्सा! इस गाने को पूरा किया राजेंदर कृष्ण ने. यह गीत सुनवाने से पहले आपको यह भी बता दें की इसी गीत के मुख्डे से प्रेरित होकर डेविड धवन ने 1994 में फिल्म बनाई थी “ईना मीना डीका”. तो अब इतनी जानकारी के बाद आप उठाइये आनंद किशोर-दा के खिलंदड और मस्ती भरे अंदाज़ का.

और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला “ओल्ड इस गोल्ड” गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं –

१. शैलेन्द्र के बोल और शंकर जयकिशन का अमर संगीत.
२. लता की दिव्य आवाज़.
३. मुखड़े में शब्द है – “सौतन”.

कुछ याद आया…?

पिछली पहेली का परिणाम –
नीरज जी एक बार फिर आपने सही पकडा, चूँकि ईना मीना डीका “डमी” शब्द हैं इसलिए वैसे संकेत दिए थे. तो मनु जी और आचार्य जी परेशान न होइए आपके system में कोई प्रॉब्लम नहीं है, हा हा हा….अब तो हँसना भी पाप हो गया भाई. राज जी पहेली भी बूझा कीजिये कभी कभी

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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