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आजा रे अब मेरा दिल पुकारा…- लता-मुकेश का एक बेमिसाल युगल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 52

ले ही आज की फ़िल्मों में दर्द भरे गानें ज़्यादा सुनने को नहीं मिलते, लेकिन एक दौर ऐसा भी रहा है कि जब हर फ़िल्म में कम से कम एक ग़मज़दा नग्मा ज़रूरी हुआ करता था। दर्द भरे गीतों का एक अलग ही मुक़ाम हुआ करता था। ऐसे गीतों के साथ लोग अपना ग़म बांट लिया करते थे, जी हल्का कर लिया करते थे। युं तो ३० और ४० के दशकों में बहुत सारे दर्दीले नग्में बने और ख़ूब चले, ५० के दशक के आते आते जब नये नये संगीतकार फ़िल्म जगत में धूम मचा रहे थे, तब दूसरे गीतों के साथ साथ दुख भरे गीतों का भी मिज़ाज कुछ बदला। शंकर जयकिशन फ़िल्म संगीत में जो नई ताज़गी लेकर आए थे, वही ताज़गी उनके ग़मज़दा गीतों में भी बराबर दिखाई दी। १९५१ में राज कपूर और नरगिस की फ़िल्म ‘आवारा’ में हसरत जयपुरी का लिखा, शंकर जयकिशन क संगीतबद्ध किया, और लता मंगेशकर का गाया “आ जाओ तड़पते हैं अरमान अब रात गुज़रनेवाली है” बहुत बहुत लोकप्रिय हुआ था। “चांद की रंगत उड़ने लगी, वो तारों के दिल अब डूब गए, घबराके नज़र भी हार गई, तक़दीर को भी नींद आने लगी”, अपने साथी के इंतज़ार की यह पीड़ा बिल्कुल जीवन्त हो उठी है हसरत साहब के इन शब्दों में। इस गीत का असर कुछ इस क़दर हुआ कि राज कपूर की अगली ही फ़िल्म ‘आह’ में भी उन्होने हसरत साहब से ऐसा ही एक गीत लिखवाया। इस बार गीत एकल नहीं बल्कि लताजी और मुकेश साहब की युगल आवाज़ों में था। और यही गीत आज पेश-ए-खिदमत है ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ में।

१९५३ की फ़िल्म ‘आह’ में राज कपूर के साथ नरगिस की जोड़ी एक बार फिर नज़र आयीं। यह फ़िल्म ‘आवारा’ की तरह ‘बॉक्स औफ़िस’ पर कामयाबी के झंडे तो नहीं गाढ़े लेकिन जहाँ तक इसके संगीत का सवाल है, तो इसके गाने गली गली गूंजे, और आज भी कहीं ना कहीं से अक्सर सुनाई दे जाते हैं। प्रस्तुत गीत “आजा रे अब मेरा दिल पुकारा” फ़िल्मी गीतों के इतिहास का वह मोती है जिसको अच्छे संगीत के क़द्र्दानों ने आज भी अपने दिलों में बसा रखा है, और आज ५५ साल बाद भी इस मोती की वही चमक बरक़रार है। इस गीत की ख़ासीयत यह है कि बहुत कम साज़ों का इस्तेमाल किया है शंकर जयकिशन ने, मुख्य रूप से मटके का सुंदर प्रयोग हुआ है। लताजी के गाया अलाप इस गीत को और भी ज़्यादा असरदार बना देते हैं। और जुदाई के दर्द को बयां करते हसरत साहब के बोलों के तो क्या कहने, बस गीत सुनिये और ख़ुद ही महसूस कीजिये।

और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला “ओल्ड इस गोल्ड” गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं –

१. दत्ता राम, हसरत जयपुरी और मुकेश की टीम.
२. १९५८ में आई इस फिल्म के नाम पर एक और फिल्म बनी जिसमें अमिताभ बच्चन थे.
३. पहला अंतरा इस शब्द से शुरू होता है -“वादे…”

कुछ याद आया…?

पिछली पहेली का परिणाम –
पहेली कुछ आसान थी. इसी बहाने हमें मिला एक नया विजेता – सुमित भारद्वाज के रूप में. मनु जी, अविनाश जी, हेमंत दा के ये गीत आपका भी पसंदीदा है जानकार ख़ुशी हुई. नीरज जी व्यस्ततायें लाख हों पर संगीत से दूर न रहें. यही तो हमारी लाइफ लाइन है भाई 🙂

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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