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तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा…पति प्रेम की पवित्र भावनाओं को समर्पित एक गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 71

ज ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’के लिए हमने जिस गीत को चुना है उसमें एक पत्नी का अपने पति के लिए जो निष्पाप पवित्र प्रेम है उसका वर्णन हुआ है। इस गीत के बोल इतने सुंदर हैं कि जो पति-पत्नी के प्रेम को और भी कई गुना पावन कर देता है। लताजी की दिव्य आवाज़ और संगीतकार रवि का सुमधुर संगीत ने राजेन्द्र कृष्ण के बोलों को और भी ज़्यादा प्रभावशाली बना दिया है। लताजी की आवाज़ एक कर्तव्य-परायन भारतीय नारी के रूप को साकार करती है। और भारतीय नारी का यही रूप प्रस्तुत गीत में भी कूट कूट कर भरा हुआ है। फ़िल्म ‘ख़ानदान’ का यह गीत है “तुम ही मेरे मंदिर तुम ही मेरी पूजा तुम ही देवता हो”। यूँ तो १९६५ की इस फ़िल्म में मुमताज़, सूदेश कुमार, और प्राण भी थे, लेकिन वरिष्ठ जोड़ी के रूप में सुनिल दत्त और नूतन नज़र आये और यह गीत भी इन दोनो पर ही फ़िल्माया गया है। भारतीय संस्कृति मे पत्नी के लिए पति का रूप परमेश्वर का रूप होता है। आज के समाज में यह कितना सार्थक है इस बहस में हम पड़ना नहीं चाहते, लेकिन इस गीत का भाव कुछ इसी तरह का है। पत्नी की श्रद्धा और प्रेम की मिठास गीत के हर एक शब्द में झलक रहा है। इस गीत में नूतन को अपने बीमार अपाहिज पति (सुनिल दत्त) को बहलाते हुए दिखाया गया है। जैसे जैसे गीत आगे बढ़ता है, वह एक लोरी की शक्ल ले लेती है। “बहुत रात बीती चलो मैं सुला दूँ, पवन छेड़े सरगम मैं लोरी सुना दूँ” लाइन के ठीक बाद लताजी जिस नरमोनाज़ुक अंदाज़ में बिना बोलों के गुनगुनाती हैं, उसका असर बहुत से बोलों वाले लोरियों से भी कई गुना ज़्यादा है। इस गीत के लिए संगीतकार रवि को उस साल का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का ‘फ़िल्म-फ़ेयर’ पुरस्कार मिला था। फ़िल्म ‘ख़ानदान’ की एक और ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म के एक नहीं बल्कि दो दो गीतों को अमीन सयानी के ‘गीतमाला’ के वार्षिक कार्यक्रम में स्थान मिला था। आशा भोंसले और मोहम्मद. रफ़ी का गाया “नील गगन पर उड़ते बादल आ” १४-वीं पायदान पर था और प्रस्तुत गीत “तुम्ही मेरे मंदिर” उस साल तीसरे पायदान पर था। दूसरे पायदान के लिए ‘हिमालय की गोद में’ फ़िल्म का “एक तू ना मिला” और पहले पायदान के लिए ‘सहेली’ फ़िल्म का “जिस दिल में बसा था प्यार तेरा” गीत चुने गये थे।

अब आपको आज के गीत के संगीतकार रवि और उनके साथ इस गीत के रिश्ते की बात बताते हैं। रवि के संघर्ष के दिनों में उनकी पत्नी ने बहुत दुख-दर्द झेलें हैं और अपने पति की ख़ातिर कई निस्वार्थ त्याग भी किये। इस बात का ज़िक्र रवि ने विविध भारती की एक मुलाक़ात में कई बार किया था। तो जब रविजी से यह पूछा गया कि उनके बनाए गीतों को सुनकर उनकी पत्नी का क्या विचार रहता था, उन्होने कहा था, “हलाँकि वो शब्दों में बयान नहीं करती थी, लेकिन मैं उसके चेहरे से जान जाता था कि वो ख़ुश है। और मुझे जब भी ‘फ़िल्मफ़ेयर अवाराड्स‍’ मिलते थे तब भी वो बहुत ख़ुश हो जाती थी। मैंने कभी उसके लिए कोई गीत नहीं बनाया, लेकिन उसे ‘ख़ानदान’ फ़िल्म का गीत “तुम ही मेरे मंदिर तुम ही मेरी पूजा” बहुत पसंद था। वो अकसर कहा करती थी कि इस तरह के गाने और बनने चाहिए।” रविजी की पत्नी कांता देवी का सन् १९८६ में स्वर्गवास हो गया। तो लीजिए रविजी की स्वर्गवासी पत्नी के त्याग और प्रेम को श्रद्धाजंली अर्पित करते हुए आज का यह गीत सुनते हैं।

और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला “ओल्ड इस गोल्ड” गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं –

१. इस बेहद सफल संगीतकार जोड़ी में से एक संगीतकार ने अपने बंगले का नाम इसी फिल्म के नाम पर रखा.
२. लता और मुकेश की आवाजों में एक प्यारा सा गीत.
३. गीत शुरू होता है इस शब्द युगल से – “चोरी चोरी”

कुछ याद आया…?

पिछली पहेली का परिणाम –
मनु जी एकदम सही जवाब….इस बार तो सभी ने बिलकुल सही जवाब दिया…दिलीप जी, नीलम जी, नीरज जी,संजीव जी सभी को बधाई, पराग जी, फिल्म का नाम बताना अनिवार्य नहीं है….आपने बस गीत का अंदाजा लगाना है. शन्नो जी सही कहा आपने ये गीत वाकई बहुत मजेदार है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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