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कैसे छुपाऊँ राज़-ए-ग़म…आज की महफ़िल में पेश हैं "मौलाना" के लफ़्ज़ और दर्द-ए-"अज़ीज़"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३५

पिछली महफ़िल में किए गए एक वादे के कारण शरद जी की पसंद की तीसरी गज़ल लेकर हम हाज़िर न हो सके। आपको याद होगा कि पिछली महफ़िल में हमने दिशा जी की पसंद की गज़लों का ज़िक्र किया था और कहा था कि अगली गज़ल दिशा जी की फ़ेहरिश्त से चुनी हुई होगी। लेकिन शायद समय का यह तकाज़ा न था और कुछ मजबूरियों के कारण हम उन गज़लों/नज़्मों का इंतजाम न कर सके। अब चूँकि हम वादाखिलाफ़ी कर नहीं सकते थे, इसलिए अंततोगत्वा हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि क्यों न आज अपने संग्रहालय में मौजूद एक गज़ल हीं आप सबके सामने पेश कर दी जाए। हमें पूरा यकीन है कि अगली महफ़िल में हम दिशा जी को निराश नहीं करेंगे। और वैसे भी हमारी आज़ की गज़ल सुनकर उनकी नाराज़गी पल में छू हो जाएगी, इसका हमें पूरा विश्वास है। तो चलिए हम रूख करते हैं आज़ की गज़ल की ओर जिसे मेहदी हसन साहब की आवाज़ में हम सबने न जाने कितनी बार सुना है लेकिन आज़ हम जिन फ़नकार की आवाज़ में इसे आप सबके सामने पेश करने जा रहे हैं, उनकी बात हीं कुछ अलग है। आप सबने इनकी मखमली आवाज़ जिसमें दर्द का कुछ ज्यादा हीं पुट है, को फिल्म डैडी के “आईना मुझसे मेरी पहली-सी सूरत माँगे” में ज़रूर हीं सुना होगा। उसी दौरान की “वफ़ा जो तुमसे कभी मैने निभाई होती”, “फिर छिड़ी बात रात फूलों की”, “ज़िंदगी जब भी तेरी बज़्म में” या फिर “ना किसी की आँख का” जैसी नज़्मों में इनकी आवाज़ खुलकर सामने आई है। मेहदी हसन साहब के शागिर्द इन महाशय का नाम पंकज़ उधास और अनूप जलोटा की तिकड़ी में सबसे ऊपर लिया जाता है। ९० के दशक में जब गज़लें अपने उत्तरार्द्ध पर थी, तब भी इन फ़नकारों के कारण गज़ल के चाहने वालों को हर महीने कम से कम एक अच्छी एलबम सुनने को ज़रूर हीं नसीब हो जाया करती थीं।

जन्म से “तलत अब्दुल अज़ीज़ खान” और फ़न से “तलत अज़ीज़” का जन्म १४ मई १९५५ को हैदराबाद में हुआ था। इनकी माँ साजिदा आबिद उर्दू की जानीमानी कवयित्री और लेखिका थीं, इसलिए उर्दू अदब और अदीबों से इनका रिश्ता बचपन में हीं बंध गया था। इन्होंने संगीत की पहली तालीम “किराना घराना” से ली थी, जिसकी स्थापना “अब्दुल करीम खान साहब” के कर-कलमों से हुई थी। उस्ताद समाद खान और उस्ताद फ़याज़ अहमद से शिक्षा लेने के बाद इन्होंने मेहदी हसन की शागिर्दगी करने का फ़ैसला लिया और उनके साथ महफ़िलों में गाने लगे। शायद यही कारण है कि मेहदी साहब द्वारा गाई हुई अमूमन सारी गज़लों के साथ इन्होंने अपने गले का इम्तिहान लिया हुआ है। हैदराबाद के “किंग कोठी” में इन्होंने सबसे पहला बड़ा प्रदर्शन किया था। लगभग ५००० श्रोताओं के सामने इन्होंने जब “कैसे सुकूं पाऊँ” गज़ल को अपनी आवाज़ से सराबोर किया तो मेहदी हसन साहब को अपने शागिर्द की फ़नकारी पर यकीन हो गया। स्नातक करने के बाद ये मुंबई चले आए जहाँ जगजीत सिंह से इनकी पहचान हुई। कुछ हीं दिनों में जगजीत सिंह भी इनकी आवाज़ के कायल हो गए और न सिर्फ़ इनके संघर्ष के साथी हुए बल्कि इनकी पहली गज़ल के लिए अपना नाम देने के लिए भी राज़ी हो गए। “जगजीत सिंह प्रजेंट्स तलत अज़ीज़” नाम से इनकी गज़लों की पहली एलबम रीलिज हुई। इसके बाद तो जैसे गज़लों का तांता लग गया। तलत अज़ीज़ यूँ तो जगजीत सिंह के जमाने के गायक हैं, लेकिन इनकी गायकी का अंदाज़ मेहदी हसन जैसे क्लासिकल गज़ल-गायकी के पुरोधाओं से मिलता-जुलता है। आज की गज़ल इस बात का साक्षात प्रमाण है। लगभग १२ मिनट की इस गज़ल में बस तीन हीं शेर हैं, लेकिन कहीं भी कोई रूकावट महसूस नहीं होती, हरेक लफ़्ज़ सुर और ताल में इस कदर लिपटा हुआ है कि क्षण भर के लिए भी श्रवणेन्द्रियाँ टस से मस नहीं होतीं। आज तो हम एक हीं गज़ल सुनवा रहे हैं लेकिन आपकी सहायता के लिए इनकी कुछ नोटेबल एलबमों की फ़ेहरिश्त यहाँ दिए देते हैं: “तलत अज़ीज़ लाईव” , “इमेजेज़”, “बेस्ट आफ़ तलत अज़ीज़”, “लहरें”, “एहसास”, “सुरूर”, “सौगात”, “तसव्वुर”, “मंज़िल”, “धड़कन”, “शाहकार”, “महबूब”, “इरशाद”, “खूबसूरत” और “खुशनुमा”। मौका मिले तो इन गज़लों का लुत्फ़ ज़रूर उठाईयेगा… नहीं तो हम हैं हीं।

चलिए अब गुलूकार के बाद शायर की तरफ़ रूख करते हैं। इन शायर को अमूमन लोग प्रेम का शायर समझते हैं, लेकिन प्रोफ़ेसर शैलेश ज़ैदी ने इनका वह रूप हम सबके सामने रखा है, जिससे लगभग सभी हीं अपरिचित थे। ये लिखते हैं: भारतीय स्वाधीनता के इतिहास में हसरत मोहानी (१८७५-१९५१) का नाम भले ही उपेक्षित रह गया हो, उनके संकल्पों, उनकी मान्यताओं, उनकी शायरी में व्यक्त इन्क़लाबी विचारों और उनके संघर्षमय जीवन की खुरदरी लयात्मक आवाजों की गूंज से पूर्ण आज़ादी की भावना को वह ऊर्जा प्राप्त हुई जिसकी अभिव्यक्ति का साहस पंडित जवाहर लाल नेहरू नौ वर्ष बाद १९२९ में जुटा पाये. प्रेमचंद ने १९३० में उनके सम्बन्ध में ठीक ही लिखा था “वे अपने गुरु (बाल गंगाधर तिलक) से भी चार क़दम और आगे बढ़ गए और उस समय पूर्ण आज़ादी का डंका बजाया, जब कांग्रेस का गर्म-से-गर्म नेता भी पूर्ण स्वराज का नाम लेते काँपता था. मुसलमानों में गालिबन हसरत ही वो बुजुर्ग हैं जिन्होंने आज से पन्द्रह साल क़ब्ल, हिन्दोस्तान की मुकम्मल आज़ादी का तसव्वुर किया था और आजतक उसी पर क़ायम हैं. नर्म सियासत में उनकी गर्म तबीअत के लिए कोई कशिश और दिलचस्पी न थी” हसरत मोहानी ने अपने प्रारंभिक राजनीतिक दौर में ही स्पष्ट घोषणा कर दी थी “जिनके पास आँखें हैं और विवेक है उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि फिरंगी सरकार का मानव विरोधी शासन हमेशा के लिए भारत में क़ायम नहीं रह सकता. और वर्त्तमान स्थिति में तो उसका चन्द साल रहना भी दुशवार है.” स्वराज के १२ जनवरी १९२२ के अंक में हसरत मोहनी का एक अध्यक्षीय भाषण दिया गया है. यह भाषण हसरत ने ३० दिसम्बर १९२१ को मुस्लिम लीग के मंच से दिया था- “भारत के लिए ज़रूरी है कि यहाँ प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली अपनाई जाय. पहली जनवरी १९२२ से भारत की पूर्ण आज़ादी की घोषणा कर दी जाय और भारत का नाम ‘यूनाईटेड स्टेट्स ऑफ़ इंडिया’ रखा जाय.” ध्यान देने की बात ये है कि इस सभा में महात्मा गाँधी, हाकिम अजमल खां और सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे दिग्गज नेता उपस्थित थे. सच्चाई यह है कि हसरत मोहानी राजनीतिकों के मस्लेहत पूर्ण रवैये से तंग आ चुके थे. एक शेर में उन्होंने अपनी इस प्रतिक्रिया को व्यक्त भी किया है-

लगा दो आग उज़रे-मस्लेहत को
के है बेज़ार अब इस से मेरा दिल

हसरत मोहानी का मूल्यांकन भारतीय स्वाधीनता के इतिहास में अभी नहीं हुआ है. किंतु मेरा विश्वास है कि एक दिन उन्हें निश्चित रूप से सही ढंग से परखा जाएगा. जनाब हसरत मोहानी का दिल जहाँ देश के लिए धड़कता था, वहीं माशुका के लिए भी दिल का एक कोना उन्होंने बुक कर रखा था तभी तो वे कहते हैं कि:

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है,
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है।

उन्नाव के पास मोहान में जन्मे “सैयद फ़ज़ल उल हसन” यानि कि मौलाना हसरत मोहानी ने बँटवारे के बाद भी हिन्दुस्तान को हीं चुना और मई १९५१ में लखनऊ में अपनी अंतिम साँसें लीं। ऐसे देशभक्त को समर्पित है हमारी आज़ की महफ़िल-ए-गज़ल। मुलाहज़ा फ़रमाईयेगा:

कैसे छुपाऊं राजे-ग़म, दीदए-तर को क्या करूं
दिल की तपिश को क्या करूं, सोज़े-जिगर को क्या करूं

शोरिशे-आशिकी कहाँ, और मेरी सादगी कहाँ
हुस्न को तेरे क्या कहूँ, अपनी नज़र को क्या करूं

ग़म का न दिल में हो गुज़र, वस्ल की शब हो यूं बसर
सब ये कुबूल है मगर, खौफे-सेहर को क्या करूं

हां मेरा दिल था जब बतर, तब न हुई तुम्हें ख़बर
बाद मेरे हुआ असर अब मैं असर को क्या करूं

चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली –

अपनी तबाहियों का मुझे कोई __ नहीं,
तुमने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी…

आपके विकल्प हैं –
a) दुःख, b) रंज, c) गम, d) मलाल

इरशाद ….

पिछली महफिल के साथी –
पिछली महफिल का सही शब्द था “रूह” और शेर कुछ यूं था –

रुह को दर्द मिला, दर्द को ऑंखें न मिली,
तुझको महसूस किया है तुझे देखा तो नहीं।

इस शब्द पर सबसे पहले मुहर लगाई दिशा जी ने, लेकिन सबसे पहले शेर लेकर हाज़िर हुए सुजाय जी। सुजाय जी आपका हमारी महफ़िल में स्वागत है, लेकिन यह क्या रोमन में शेर…देवनागरी में लिखिए तो हमें भी आनंद आएगा और आपको भी।

अगले प्रयास में दिशा जी ने यह शेर पेश किया:

काँप उठती है रुह मेरी याद कर वो मंजर
जब घोंपा था अपनों ने ही पीठ में खंजर

शरद जी का शेर कुछ यूँ था:

हरेक रूह में इक ग़म छुपा लगे है मुझे,
ए ज़िन्दगी तू कोई बददुआ लगे है मुझे।

हर बार की तरह इस बार भी शामिख जी ने हमें शायर के नाम से अवगत कराया। इसके साथ-साथ मुजफ़्फ़र वारसी साहब की वह गज़ल भी प्रस्तुत की जिससे यह शेर लिया गया है:

मेरी तस्वीर में रंग और किसी का तो नहीं
घेर लें मुझको सब आ के मैं तमाशा तो नहीं

ज़िन्दगी तुझसे हर इक साँस पे समझौता करूँ
शौक़ जीने का है मुझको मगर इतना तो नहीं

रूह को दर्द मिला, दर्द को आँखें न मिली
तुझको महसूस किया है तुझे देखा तो नहीं

सोचते सोचते दिल डूबने लगता है मेरा
ज़हन की तह में ‘मुज़फ़्फ़र’ कोई दरिया तो नही.

शामिख साहब, आपका किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूँ! गज़ल के साथ-साथ आपने ’रूह’ शब्द पर यह शेर भी हम सबके सामने रखा:

हम दिल तो क्या रूह में उतरे होते
तुमने चाहा ही नहीं चाहने वालों की तरह

’अदा’ जी वारसी साहब के रंग में इस कदर रंग गईं कि उन्हें ’रूह’ लफ़्ज़ का ध्यान हीं नहीं रहा। खैर कोई बात नहीं, आपने इसी बहाने वारसी साहब की एक गज़ल पढी जिससे हमारी महफ़िल में चार चाँद लग गए। उस गज़ल से एक शेर जो मुझे बेहद पसंद है:

सोचता हूँ अब अंजाम-ए-सफ़र क्या होगा
लोग भी कांच के हैं राह भी पथरीली है

रचना जी, मंजु जी और सुमित जी का भी तह-ए-दिल से शुक्रिया। आप लोग जिस प्यार से हमारी महफ़िल में आते है, देखकर दिल को बड़ा हीं सुकूं मिलता है। आप तीनों के शेर एक हीं साँस में पढ गया:

नाम तेरा रूह पर लिखा है मैने
कहते हैं मरता है जिस्म रूह मरती नहीं।
रूह काँप जाती है देखकर बेरुखी उनकी
अरे! कब आबाद होगी दिल लगी उनकी।
रूह को शाद करे,दिल को जो पुरनूर करे,
हर नज़ारे में ये तन्जीर कहाँ होती है।

मनु जी, आप तो गज़लों के उस्ताद हैं। शेर कहने का आपका अंदाज़ औरों से बेहद अलहदा होता है। मसलन:

हर इक किताब के आख़िर सफे के पिछली तरफ़
मुझी को रूह, मुझी को बदन लिखा होगा

कुलदीप जी ने जहाँ वारसी साहब की एक और गज़ल महफ़िल-ए-गज़ल के हवाले की, वहीं जॉन आलिया साहब का एक शेर पेश किया, जिसमें रूह आता है:

रूह प्यासी कहां से आती है
ये उदासी कहां से आती है।

शामिख साहब के बाद कुलदीप जी धीरे-धीरे हमारी नज़रों में चढते जा रहे हैं। आप दोनों का यह हौसला देखकर कभी-कभी दिल में ख्याल आता है कि क्यों न महफ़िल-ए-गज़ल की एक-दो कड़ियाँ आपके हवाले कर दी जाएँ। क्या कहते हैं आप। कभी इस विषय पर आप दोनों से अलग से बात करेंगे।

चलिए इतनी सारी बातों के बाद आप लोगों को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!
प्रस्तुति – विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. “महफ़िल-ए-ग़ज़ल” श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक “तन्हा”. साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -“शान-ए-महफिल”. हम उम्मीद करते हैं कि “महफ़िल-ए-ग़ज़ल” का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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