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सुहानी रात ढल चुकी न जाने तुम कब आओगे…अनंत इंतज़ार की पीड़ा है इस गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 254

पूर्वी जी के पसंद के गानों का लुत्फ़ इन दिनों आप उठा रहे हैं ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ पर। पूर्वी जी के पसंद के इन पाँच गीतों की खासियत यह है कि ये पाँच गानें पाँच अलग गीतकार और पाँच अलग संगीतकारों की रचनाएँ हैं। कमाल अमरोही – ग़ुलाम मोहम्मद, हसरत जयपुरी – दत्ताराम, और राजेन्द्र कृष्ण – मदन मोहन के बाद आज बारी है एक ऐसे गीतकार – संगीतकार जोड़ी की जो फ़िल्म जगत के इस तरह की जोड़ियों में एक बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह जोड़ी है शक़ील बदायूनी और नौशाद अली की। जी हाँ, आज प्रस्तुत है शक़ील – नौशाद की एक रचना मोहम्मद रफ़ी के स्वर में। फ़िल्म ‘दुलारी’ का यह गीत है “सुहानी रात ढल चुकी, ना जाने तुम कब आओगे”। १९४९ का साल शक़ील – नौशाद के लिए एक सुखद साल रहा। महबूब ख़ान की फ़िल्म ‘अंदाज़’, ताजमहल पिक्चर्स की फ़िल्म ‘चांदनी रात’, तथा ए. आर. कारदार साहब की दो फ़िल्में ‘दिल्लगी’ और ‘दुलारी’ इसी साल प्रदर्शित हुई थी और ये सभी फ़िल्मों का गीत संगीत बेहद लोकप्रिय सिद्ध हुआ था। आज ज़िक्र ‘दुलारी’ का। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सुरेश, मधुबाला और गीता बाली। फ़िल्म का निर्देशन कारदार साहब ने ख़ुद ही किया था। आज के प्रस्तुत गीत पर हम अभी आते हैं, लेकिन उससे पहले आपको यह बताना चाहेंगे कि इसी फ़िल्म में लता जी और रफ़ी साहब ने अपना पहला डुएट गीत गाया था, यानी कि इसी फ़िल्म ने हमें दिया पहला ‘लता-रफ़ी डुएट’ और वह गीत था “मिल मिल के गाएँगे दो दिल यहाँ, एक तेरा एक मेरा”। एक और ऐसा युगल गीत था “रात रंगीली मस्त नज़ारे, गीत सुनाए चाँद सितारे”। फिर उसके बाद लता और रफ़ी की आवाज़ों में कैसे कैसे युगल गीत आए, उनके बारे में बोलने लगें तो कई हफ़्ते गुज़र जाएँगे!

मोहम्मद रफ़ी की एकल आवाज़ में “सुहानी रात ढल चुकी” राग पहाड़ी पर आधारित है। इसी फ़िल्म का गीत “तोड़ दिया दिल मेरा” भी इसी राग पर आधारित है। दोस्तों, यह राग जितना शास्त्रीय है, उससे भी ज़्यादा यह जुड़ा हुआ है पहाड़ों के लोक संगीत से। यह पहाड़ों का संगीत है, जिसमें प्रेम, शांति और वेदना के सुर सुनाई देते हैं। राग पहाड़ी पर असंख्य फ़िल्मी गानें बने हैं, लेकिन आज क्योंकि हम बात कर रहे हैं नौशाद साहब के गाने की, तो हम नज़र दौड़ाएँगे उन्ही के स्वरबद्ध कुछ ऐसे गीतों पर जो इस राग पर आधारित हैं।

१. आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले (राम और श्याम)
२. दिल तोड़ने वाले तुझे दिल ढ़ूंढ रहा है (सन ऒफ़ इंडिया)
३. दो सितारों का ज़मीं पर है मिलन आज की रात (कोहिनूर)
४. जवाँ है मोहब्बत हसीं है ज़माना (अनमोल घड़ी)
५. कोई प्यार की देखे जादूगरी (कोहिनूर)
६. ओ दूर के मुसाफ़िर हम को भी साथ ले ले (उड़न खटोला)
७. तोरा मन बड़ा पापी साँवरिया रे (गंगा जमुना)

तो दोस्तो, आनंद लीजिए रफ़ी की आवाज़ का, और हाँ, आपको यह भी बताते चलें कि यही गीत रफ़ी साहब के करीयर का पहला पहला ब्लॉकबस्टर गीत साबित हुआ था। सुनिए…

और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला “ओल्ड इस गोल्ड” गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)”गेस्ट होस्ट”.अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. एल पी और आनंद बख्शी ने रचा है ये गीत.
२. ये फिल्म एक कोंकणी फिल्म “निर्मोन” का रीमेक थी.
३. गीत शुरू होता है एक से नौ तक के एक अंक के नाम के साथ.

पिछली पहेली का परिणाम –

मनु जी धीमे धीमे चलते ही सही…आप १२ अंकों तक पहुँच ही गए बधाई…कभी कभी तुक्के लगा लिया कीजिये 🙂

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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