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दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ…जब तुतलाती आवाजों में ऐसे बच्चे मनाएं तो कौन भला रूठा रह पाए

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 267

‘ब्रच्चों का एक गहरा लगाव होता है अपने दादा-दादी और नाना-नानी के साथ। कहते हैं कि बूढ़ों और बच्चों में ख़ूब अच्छी बनती है। कभी दादी-नानी बच्चों को परियों की कहानी सुनाते हुए रूपकथाओं के देश में ले जाते हैं तो कभी सर्दी की किसी सूनसान रात में बच्चों के ज़िद पर भूतों की ऐसी कहानी सुनाते हैं कि फिर उसके बाद बच्चे बिस्तर से नीचे उतरने में भी डरते हैं। कहानी चाहे कोई भी हो, नानी-दादी से कहानी सुनने का मज़ा ही कुछ और है। ठीक इसी तरह से बच्चे भी अपने इन बड़े बुज़ुर्गों का ख़याल रखते हैं। उनके साथ सैर पे जाना, उनकी छोटी मोटी ज़रूरतों को पूरा करना, चश्मा या लाठी खोजने में मदद करना जैसे काम नाती पोती ही तो करते आए हैं। घर में जब तक बड़े बूढ़े और बच्चे हों, घर की रौनक ही कुछ और होती है। अफ़सोस की बात है कि आज की पीढ़ी के बहुत से लोग अपने बूढ़े माँ बाप से अलग हो जाते हैं। ऐसे में आज के बच्चे भी अपने दादा-दादी से अलग हो जाते हैं। यह एक ऐसी हानि हो रही है बच्चों की जिसकी किसी भी और तरीके से भरपाई होना असंभव है। जो संस्कृति और शिक्षा दादा-दादी और नाना-नानी से मिलती है, वो किसी और सूत्र से मिल पाना संभव नहीं। ख़ैर, अब हम आते हैं आज के गीत पर जिसमें अपनी दादी अम्मा को मनाया जा रहा है। कभी ना कभी हर घर में ऐसा होता है कि जब बच्चे बहुत ज़्यादा शरारत करते हैं, बात नहीं सुनते, तो दादी उनसे रूठ जाती हैं भले ही झूठ मूठ का क्यों ना हो! तो कुछ ऐसी ही रूठने मनाने की बात चल रही है आज के प्रस्तुत गीत में जो है फ़िल्म ‘घराना’ का। आशा भोसले और कमल बारोट की युगल आवाज़ों में यह गीत है “दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ, छोड़ो भी यह गुस्सा ज़रा हँस के दिखाओ”।

‘घराना’ १९६१ की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे राजेन्द्र कुमार, राज कुमार, आशा पारेख और शोभा खोटे। लेकिन एस. एस. वासन निर्देशित इस फ़िल्म के इस गीत में जिस दादी और जिन बच्चों का ज़िक्र हो रहा है वो हैं दादी की भूमिका में ललिता पवार और बच्चे थे डेज़ी इरानी और मास्टर रणदीप। मुखराम शर्मा लिखित इस कहानी के तमाम किरदार इस तरह से थे – शांता (ललिता पवार) एक बहुत ही ग़ुस्सैल औरत जो पूरे परिवार को अपने इशारों पर चलाती है। उनका पति एक धार्मिक और शांत स्वभाव का इंसान जो अपनी पत्नी के रास्ते नहीं आते। परिवार में हैं उनकी बड़ी विधवा बहू और उसके दो छोटे छोटे बच्चे। शांता का मझला बेटा कैलाश (राज कुमार) और छोटा बेटा कमल (राजेन्द्र कुमार) जो एक कॊलेज स्टुडेंट है जिसे उषा (आशा पारेख) नाम की लड़की से प्यार है। अचानक शांता की बिगड़ी हुई लड़की अपना ससुराल छोड़कर मायके चली आती है और घर में फूट डालने की कोशिश करती है। हम फ़िल्म की कहानी पर नहीं जाएँगे क्योंकि फ़िल्म की मूल कहानी से बच्चों का कोई लेना देना नहीं है, हम तो भई आज अपनी दादी अम्मा को मनाने के मूड में हैं। तो इससे पहले कि हम अपना प्रयास शुरु करें, आपको बता दें कि इस फ़िल्म ने उस साल कई पुरस्कार बटोरे थे फ़िल्मफ़ेयर में, जैसे कि सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के रूप में रवि, सर्वश्रेष्ठ गीतकार शक़ील बदायूनी (“हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं” गीत के लिए)। शोभा खोटे को सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री के लिए और रफ़ी साहब को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक (“हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं”) के लिए नामांकित किया गया था। तो चलिए अब सुना जाए आशा भोसले और कमल बारोट की आवाज़ों में शक़ील – रवि की यह बाल-रचना। ज़रा सुनिए तो सही कि शक़ील के क़लम से कैसे लगते हैं “खाली पीली” जैसे शब्द, और ज़रा याद कीजिए कि कभी आप ने भी अपनी दादी नानी को इसी तरह से मनाया होगा!!!

और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला “ओल्ड इस गोल्ड” गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)”गेस्ट होस्ट”.अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. बच्चों की आवाजें है इस गीत में सुषमा सेठ और प्रतिभा की.
२. फिल्म में राजेश खन्ना एक यादगार अतिथि भूमिका में दिखे थे.
३. फिल्म के एक अन्य गीत के लिए गीतकार को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्म फेयर प्राप्त हुआ था.

पिछली पहेली का परिणाम –

अरे ये हम क्या देख रहे हैं..नीलम जी का खाता खुल ही गया..बधाई….जमे रहिये….शरद जी, पराग जी….और आप सब पुराने श्रोताओं से गुजारिश है कि कुछ सुझाव दें जिसे हम ३०१ वें एपिसोड से इस फोर्मेट में कुछ सकारात्मक बदलाव करसकें

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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