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नि मैं यार मानना नि चाहें लोग बोलियां बोले…जब मिलाये मीनू पुरषोत्तम ने लता के साथ ताल से ताल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 338/2010/38

फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं को समर्पित ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ की लघु शृंखला ‘हमारी याद आएगी’ की आठवीं कड़ी में आज एक ऐसी गायिका का ज़िक्र जिन्होने कमल बारोट की तरह दूसरी गायिका के रूप में लता मंगेशकर और आशा भोसले के साथ कई हिट गीत गाईं हैं। मिट्टी की सौंधी सौंधी महक वाली आवाज़ की धनी मीनू पुरुषोत्तम का ज़िक्र आज की कड़ी में। युं तो मीनू पुरुषोत्तम ने बहुत सारे कम बजट की फ़िल्मों में एकल गीत गाईं हैं, लेकिन उनके जो चर्चित गानें हैं वह दूसरी गायिकाओं के साथ गाए उनके युगल गीत ही हैं। जैसे कि लता जी के साथ फ़िल्म ‘दाग़’ का थिरकता गीत “नि मैं यार मनाना नी, चाहे लोग बोलियाँ बोले”, आशा जी के साथ ‘ये रात फिर ना आएगी’ का “हुज़ूर-ए-वाला जो हो इजाज़त”, सुमन कल्य़ाणपुर के साथ गाया फ़िल्म ‘ताजमहल’ का गीत “ना ना ना रे ना ना, हाथ ना लगाना” (जिसे हम ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ पर बजा चुके हैं), परवीन सुल्ताना के साथ गाया फ़िल्म ‘दो बूंद पानी’ का गीत “पीतल की मेरी गागरी” आदि। मीनू जी के गाए ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लें भी काफ़ी मशहूर हैं। मीनू पुरुषोत्तम का जन्म २४ नवंबर १९४४ को पंजाब के पटियाला में एक कृषक परिवार में हुआ था। बचपन से ही संगीत में दिलचस्पी होने के कारण उन्होने शास्त्रीय संगीत की तालीम हासिल की सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और गुरु पंडित लक्ष्मण प्रसाद जयपुरवाले से। मीनू जी बम्बई आकर संगीत में विशारद, यानी की स्नातक की उपाधी प्राप्त की। जहाँ तक फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने की बात है, तो उन्हे केवल १६ वर्ष की आयु में ही इस क्षेत्र में क़दम रखने का मौका मिला, जब संगीतकार रवि ने पहली बार उन्हे अपनी फ़िल्म ‘चायना टाउन’ में रफ़ी साहब के साथ एक डुएट गाने का मौका दिया। १९६२ की इस फ़िल्म का वह गीत था “देखो जी एक बाला जोगी मतवाला”। यहीं से शुरुआत हुई मीनू पुरुषोत्तम के फ़िल्मी गायन की। फिर उसके बाद तो कई संगीतकारों ने उनसे गानें गवाए जिनमें कई बड़े नाम शामिल हैं जैसे कि रोशन, मदन मोहन, ओ. पी. नय्यर, जयदेव, और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल प्रमुख।

मीनू पुरुषोत्तम स्टेज पर बेहद सक्रीय रहीं हैं। देश और विदेश में बराबर उन्होने शोज़ किए हैं नामी गायकों के साथ, जिनमें शामिल हैं मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, तलत महमूद और महेन्द्र कपूर। ग़ज़ल और भजन गायकी में अपना एक अलग मुक़ाम हासिल करते हुए उनके कई एल. पी रिकार्ड्स बनें हैं जिनमें शामिल हैं, ‘रंज में राहत’, ‘रहगुज़र’, ‘ओ सलौने सांवरिया’, ‘भक्ति रस’, ‘कृष्ण रास’, ‘दशावतार’, ‘गुजराती वैष्णव भजन’, ‘मनमन्दिर में साईं’, और ‘जागो जागो माँ जवालपा’। हिंदी और अपनी मातृभाषा पंजाबी के अलावा मीनू जी ने मराठी, बंगला, भोजपुरी, सिंधी जैसी भाषाओं में भी बहुत से गानें गाएं हैं। आज के लिए हमने चुना है लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत में १९७० की फ़िल्म ‘दाग़’ का वही सुपरहिट पंजाबी लोक रंग में रंगा गीत जिसे मीनू जी ने लता जी के साथ मिलकर गाया था, “नि मैं यार मनाना नी”। पंजाब की धरती में जन्मीं मीनू जी ने इस गीत में भी वही पंजाबी ख़ास लोक शैली का रंग भरा है अपनी आवाज़ से कि इसे सुनते हुए हम उसी रंगीले पंजाब के किसी गाँव में पहुँच जाते हैं। अगर आप इसे मेरी छोटी मुंह और बड़ी बात ना समझें तो मैं यह कहना चाहूँगा कि इस गीत में मीनू पुरुषोत्तम ने लता जी के साथ बराबर की टक्कर ली थी। एक तरफ़ लता जी की पतली मधुर आवाज़ और दूसरी तरफ़ मीनू जी की इस मिट्टी से जुड़ी लोक संगीत वाली आवाज़, कुल मिलाकर ऐसा कॊन्ट्रस्ट पैदा हुआ कि गीत में एक अलग ही चमक आ गई है। इस गीत को सुनते हुए आपके क़दम थिरके बग़ैर नहीं रह पाएँगे। तो आइए अब इस गीत का आनंद उठाते हैं, फ़िल्म ‘दाग़’ के बारे में हम आपको फिर किसी दिन तफ़सील से बताएँगे!

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

लिए हाथ में एक फूल गुलाब,
आएगा वो सपनों का राजकुमार,
कौन नहीं यहाँ उसका तलबगार,
बेकार नहीं दिल इतना बेकरार…

अतिरिक्त सूत्र- शैलेन्द्र ने लिखा है इस सरल मगर खूबसूरत गीत को

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी “सेज” की जगह पर “सूनी” बोल्ड हो गया :), पर एकदम सही जवाब…बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना –सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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