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रिमझिम के गीत सावन गाये….एल पी के संगीत में जब सुर मिले रफ़ी साहब और लता जी के तो सावन का मज़ा दूना हो गया

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 439/2010/139

रिमझिम के तरानों पर सवार होकर हम आज पहुंचे हैं इस भीगी भीगी शृंखला की अंतिम कड़ी पर। ‘रिमझिम के तराने’ में आज प्रस्तुत है संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की एक बेहतरीन रचना की। एल.पी ने सावन के कई हिट गीत हमें दिए हैं, जैसे कि “आया सावन झूम के”, “कुछ कहता है यह सावन”, “झिलमिल सितारों का आँगन होगा”, और आज का प्रस्तुत गीत “रिमझिम के गीत सावन गाए हाए भीगी भीगी रातों में”। यह १९६९ की फ़िल्म ‘अनजाना’ का गीत है। बताना ज़रूरी है कि यह वही साल था जिस साल ‘आराधना’ में “रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना” जैसा सेन्सुअस गीत आया था जो एक नया प्रयोग था। उसके बाद से तो जैसे एक ट्रेण्ड सा ही बन गया कि बारिश से बचने के लिए हीरो और हीरोइन किसी सुनसान और खाली पड़े मकान में शरण लेते हैं, और वहाँ पर बारिश को सलाम करते हुए एक रोमांटिक गीत गाते हैं। तो एक तरह से इसे “रूप तेरा मस्ताना” जौनर भी कह सकते हैं। लता-रफ़ी की आवाज़ में फ़िल्म ‘अनजाना’ का यह गीत बेहद ख़ूबसूरत है हर लिहाज़ से। बोल जितने अच्छे हैं, संगीत भी उतना ही सुरीला। राजेन्द्र कुमार और बबिता पर फ़िल्माया गया यह गीत भी सेन्सुअस है जो भीगी भीगी रात में एक आग सी लगा देती है मन में। “मेरा दिल भी है दीवाना, तेरे नैना भी हैं नादान से, कुछ ना सोचा कुछ ना देखा, कुछ भी पूछा ना इस अनजान से, चल पड़े साथ हम कैसे, ऐसे बनके साथी राहों में, के रिमझिम के गीत सावन गाए हाए भीगी भीगी रातों में”।

दोस्तों, आज इस लघु शृंखला ‘रिमझिम के तराने’ की अंतिम कड़ी है। तो क्यों ना आज भी कुछ शायराना बातें हो जाए सावन पर। तो अर्ज़ किया है…

सावन की पहली बारिश में बचपन में नहाना याद है,
रिमझिम रिमझिम टप टप टप टप बारिश का गाना याद है।
वो बादलों के मजमे को देख कर वो हम सब का शोर मचाना,
वो भीग भीग कर नाच नाचना बन कर दीवाना याद है।
बादलों का गरजना बिजली का चमकना सावन की बरसात में,
कोयल का मीठा मीठा प्यारा प्यारा सुंदर तराना याद है।
मस्ती मे डूब जाना सब बंदिशें भूल ख़ुशियाँ मनाना,
ज़मीन पे गिरे पानी में सब दोस्तों को भीगाना याद है।
बारिश के पानी को चखना मौसम की पहली बरसात में,
सावन की पहली बारिश में बचपन में नहाना याद है।

दोस्तों, हम यह पता तो नहीं लगा पाए कि यह किसने लिखा है, लेकिन वाक़ई बचपन का वह ज़माना याद आ दिला दिया इन अल्फ़ाज़ों ने। उम्मीद है आपको भी अपने बचपन के बारिश के दिन याद आ गए होंगे, वो काग़ज़ की कश्तियाँ, वो बारिश का पानी! ‘रिमझिम के तराने’ शृंखला तो हो गई पूरी, लेकिन सावन का महीना जारी है, और इस रूमानीयत भरे भीगे मौसम में हमारी तरफ़ से आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। सावन का आनंद लीजिए, हम ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ पर एक नई शृंखला के साथ फिर वापस आएँगे रविवार की शाम। तब तक के लिए अलविदा, लेकिन आप बने रहिए ‘आवाज़’ के साथ। धन्यवाद!

क्या आप जानते हैं…
कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ऐसे पहले संगीतकार बने जिन्होने लगातार चार साल (१९७८ से १९८१) सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता (अमर अकबर ऐंथनी, सत्यम शिवन सुंदरम, सरगम, कर्ज़)। इस कड़ी को तोड़ा ख़य्याम साहब ने १९८२ में फ़िल्म ‘उमरावजान’ के ज़रिए।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा 🙂

१. डीन मार्टिन के एक अंग्रेजी गीत की धुन से प्रेरित है ये गीत, संगीतकार बताएं – ३ अंक.
२. नूतन ने सहयोग दिया है इस गीत में मूल गायक का, कौन हैं जिनकी आवाज़ ने इस गीत को एक अलग मुकाम दे दिया है- २ अंक.
३. फिल्म का नाम बताएं – २ अंक.
४. इस फिल्म के जरिये किस अभिनेत्री को लॉन्च किया गया था फिल्मों में – १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम –
इस सप्ताहांत भी शरद जी ने बढ़त बरकरार रखी है, आप हैं ५६ पर, अवध जी ४९ पर और इंदु जी हैं जरा पीछे २३ पर. वीकेंड का आनंद लीजिए. फिर मिलेंगें चलते चलते 🙂

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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