एक गीत सौ अफ़साने

रस्मे उल्फत को निभाएं तो निभाएं कैसे

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वर्ष 1973 की फ़िल्म ’दिल की राहें’ की ग़ज़ल “रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे”। लता मंगेशकर की आवाज़, नक्श ल्यालपुरी के बोल, और मदन मोहन का संगीत। फ़िल्म के निर्माता इस गाने के सिचुएशन पर ग़ज़ल की माँग की? क्यों नक्श ल्यालपुरी को फ़ूटपाथ के किनारे बैठ कर इस ग़ज़ल को लिखना पड़ा? क्या है इस ग़ज़ल के बनने की कहानी? जानिये नक्श साहब से मदन मोहन की शख़्सियत के बारे में। और कुछ बातें उस्ताद र‍ईस ख़ाँ की भी। ये सब आज के इस अंक में।

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