एक गीत सौ अफ़साने

ज़िंदगी फूलों की नही, फूलों की तरह महकती रहे

वर्ष 1979 की चर्चित फ़िल्म ’गृहप्रवेश’ का गीत “ज़िन्दगी फूलों की नहीं, फूलों की तरह महकी रहे”। भूपेन्द्र की आवाज़, गुलज़ार के बोल, और कानु रॉय का संगीत। संगीतकार बनने से पहले कानु रॉय ने फ़िल्म जगत में और फ़िल्म जगत के बाहर कौन से काम किया करते थे? उनके रचे गीतों में साज़ और साज़िन्दे की कमी क्यों हुआ करती थीं? उनके बारे में अधिक मालूमात लोगों को क्यों नहीं है? उनके संगीत देने की शैली की एक मज़ेदार बात क्या थी? इस गीत को गुलज़ार साहब अपना उम्दा गीत क्यों नहीं मानते? गुलज़ार साहब के अनुसार किसी गीत के संदर्भ में कैसी दलीलें नहीं चलतीं? ये सब, आज के अंक में।

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