एक गीत सौ अफ़साने

।। नीले गगन के तले धरती का प्यार पले।।

नीले गगन के तले

एक गीत सौ अफ़साने || एपिसोड 04 ||

फिल्म – हमराज़
आलेख- सुजॉय चटर्जी
स्वर- योगेश पांडे
प्रस्तुति- संज्ञा टंडन

“नीले गगन के तले धरती का प्यार पले” – क्यों नहीं है इस गीत के मुखड़े और अन्तरे की धुन में फ़र्क़?

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का यह स्तंभ ‘एक गीत सौ अफ़साने’। इसकी चौथी कड़ी में आज प्रस्तुत है फ़िल्म ’हमराज़’ के मशहूर गीत “नीले गगन के तले” से सम्बन्धित जानकारी …दोस्तों,  आपने फ़िल्म ’हमराज़’ का गीत “नीले गगन के तले” बहुत बार सुना होगा, पर क्या आपको पता है कि इस गीत को सिर्फ़ एक ही धुन पर क्यों रचा गया था? यानी मुखड़ा और अन्तरा एक ही धुन पर क्यों रखा गया? और उस दौर में बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों के सारे गाने अचानक मोहम्मद रफ़ी की जगह महेन्द्र कपूर को कैसे मिलने लगे? चलिए आज इन सवालों पर से परदा उठाया जाए!

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