एक गीत सौ अफ़साने

“हरि दिन तो बीता शाम हुई..”

हरि दिन तो बीता

एक गीत सौ अफ़साने || एपिसोड 06 ||

फिल्म – किताब
आलेख- सुजॉय चटर्जी
स्वर- ऋतु कौशिक
प्रस्तुति- संज्ञा टंडन

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का यह स्तंभ ‘एक गीत सौ अफ़साने’। इसकी छठी कड़ी में आज प्रस्तुत है फ़िल्म ’किताब’ के कमसुने गीत “हरि दिन तो बीता शाम हुई, रात पार करा दे” से सम्बन्धित जानकारी …

दोस्तों,  आपने फ़िल्म ’किताब’ में राजकुमारी की गायी लोरी “हरि दिन तो बीता शाम हुई” ज़रूर सुनी होगी। इतने वर्षों के बाद कैसे और क्यों मिली गायिका राजकुमारी को फ़िल्म में गाने का मौका? गुलज़ार और पंचम ने कैसे राज़ी करवाया राजकुमारी जी को इतने सालों के बाद माइक के सामने आने के लिए? और एक अन्य गीत की रिकॉर्डिंग् पर राजकुमारी जी को कोरस में गाते देख क्यों नम हो गई थीं नौशाद साहब की आँखें? आज के इस अंक में राजकुमारी जी से सम्बन्धित इन सब बातों की जानकारी…

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