एक गीत सौ अफ़साने

“मेरो गाम काठ पारे”

मेरो गाँव काठा पारे

एक गीत सौ अफ़साने || एपिसोड 05 ||

फिल्म – मंथन
आलेख- सुजॉय चटर्जी
स्वर- सुमेधा अग्रश्री
प्रस्तुति- संज्ञा टंडन

रेडियो प्लेबैक इण्डियाके सभी श्रोता-पाठकों को प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है रेडियो प्लेबैक इण्डियाका यह स्तंभ एक गीत सौ अफ़साने। इसकी पांचवीं कड़ी में आज प्रस्तुत है फ़िल्म ’मंथन’ के अनोखे गीत “मेरो गाम काठा पारे” से सम्बन्धित जानकारी … …

दोस्तों,  आपने फ़िल्म ’मंथन’ का गीत “मेरो गाम काठा पारे” बहुत बार सुना होगा, पर क्या आपको पता है कि इस गीत के बनने की कहानी? फ़िल्म में गीत की गुंजाइश ना होते हुए भी क्यों रचा गया यह गीत? कैसे रचा गया? इस गीत के एक हिस्से की रिदम को तेज़ क्यों किया गया? क्या सम्बन्ध है इस गीत का प्रिन्स चार्ल्स के साथ? चलिए आज इन सवालों पर से परदा उठाया जाए!

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