एक गीत सौ अफ़साने

“दिल आने के ढंग निराले हैं..”

दिल आने के ढंग निराले

एक गीत सौ अफ़साने || एपिसोड 07 ||

फिल्म – सिंगार/मेरी कहानी
आलेख- सुजॉय चटर्जी
स्वर- दीप्ति अग्रवाल
प्रस्तुति- संज्ञा टंडन

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का यह स्तंभ ‘एक गीत सौ अफ़साने’। इसकी सातवीं कड़ी में आज प्रस्तुत है एक ऐसे गीत की कहानी जिसके दो रूप हैं। एक रूप 1949 की फ़िल्म ’सिंगार’ में सुनने को मिला तो दूसरा रूप 1948 की फ़िल्म ’मेरी कहानी’ में।  …

दोस्तों1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, चारो ओर अफ़रा-तफ़री मची हुई थी। बहुत से कलाकार सरहद के इस पार – उस पार हो गए थे। ऐसे में एक गीत बना, जो दो दो फ़िल्मों में सुनने को मिला। दोनों के गीतकार एक पर संगीतकार अलग। एक सुरिन्दर कौर की आवाज़ में तो दूसरा सुरेन्द्र की आवाज़ में। सुरिन्दर कौर वाले गीत को लता मंगेशकर ने गाने से क्यों किया इनकार? आइए आज इन्हीं सब सवालों के जवाब ढूंढ़े इस भूले बिसरे गीत की चर्चा के बहाने

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