एक गीत सौ अफ़साने

“छलिया मेरा नाम..”

छलिया मेरा नाम

एक गीत सौ अफ़साने || एपिसोड 08 ||

फिल्म –छलिया
आलेख- सुजॉय चटर्जी
स्वर- शिवेन्द्र शुक्ला
प्रस्तुति- संज्ञा टंडन

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का यह स्तंभ ‘एक गीत सौ अफ़साने’। इसकी आठवीं कड़ी में आज प्रस्तुत है राज कपूर के एक ऐसे गीत की कहानी जिस पर चली थी सेन्सर बोर्ड की कैंची…

दोस्तों, राज कपूर की मशहूर फ़िल्म ’छलिया’ और इसके शीर्षक गीत “छलिया मेरा नाम” के बारे में कौन नहीं जानता! पर क्या आपको पता है कि यह गीत जब लिखा गया था, तब इसके मुखड़े और अन्तरों के बोल काफ़ी अलग थे। क्यों चली थी सेन्सर बोर्ड की कैंची इस भोले-भाले से गीत पर? क्यों मुखड़ा और तीनों अन्तरों के बोलों में बदलाव करने पडे गीतकार क़मर जलालाबादी को? और इसी फ़िल्म में रफ़ी साहब का एक गीत क्यों रखा गया और फ़िल्म के अन्त में शीर्षक गीत की झलकी की जगह रफ़ी साहब वाले गीत की झलकी क्यों बजायी गई। आइए आज इन्हीं सब सवालों के जवाब ढूंढ़े फ़िल्म ’छलिया’ के इस शीर्षक गीत की चर्चा के बहाने…

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