राग - भारतीय शास्त्रीय संगीत

स्वरगोष्ठी – 510: “बार-बार हाँ, बोलो यार हाँ …” : राग जोग :: SWARGOSHTHI – 510 : RAG JOG

              



स्वरगोष्ठी – 510 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 14 

“बार-बार हाँ, बोलो यार हाँ…”, जीत के लिए उत्साहवर्धन ,राग जोग के सुरों में ढल कर


“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी,  साथी सलाहकर शिलाद चटर्जी के साथ, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।उन्नीसवीं सदी में देशभक्ति गीतों के लिखने-गाने का रिवाज हमारे देश में काफ़ी ज़ोर पकड़ चुका था। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा देश गीतों, कविताओं, लेखों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करने लगा। जहाँ एक तरफ़ कवियों और शाइरों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखे, वहीं उन कविताओं और गीतों को अर्थपूर्ण संगीत में ढाल कर हमारे संगीतकारों ने उन्हें और भी अधिक प्रभावशाली बनाया। ये देशभक्ति की धुनें ऐसी हैं कि जो कभी हमें जोश से भर देती हैं तो कभी इनके करुण स्वर हमारी आँखें नम कर जाते हैं। कभी ये हमारा सर गर्व से ऊँचा कर देते हैं तो कभी इन्हें सुनते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन देशभक्ति की रचनाओं में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और इन्हीं रागाधारित देशभक्ति रचनाओं से सुसज्जित है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की तेरह कड़ियों में राग आसावरी, कोमल ऋषभ आसावरी, गुजरी तोड़ी, पहाड़ी, भैरवी, मियाँ की मल्हार, कल्याण (यमन), शुद्ध कल्याण, जोगिया, काफ़ी, भूपाली, दरबारी कान्हड़ा, देश/देस, देस मल्हार और तिलंग पर आधारित देशभक्ति गीतों की चर्चा की गई हैं।आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की चौदहवीं कड़ी, जिसमें हम सुनवा रहे हैं राग जोग पर आधारित एक फ़िल्मी देशभक्ति गीत फ़िल्म ’लगान’ से – “बार-बार हाँ, बोलो यार हाँ, अपनी जीत हो, उनकी हार हाँ…”। साथ ही राग जोग की एक जुगलबन्दी सरोद और वायलिन पर। 

ए. आर. रहमान  एक ऐसे संगीतकार हैं जिन्होंने अपने गीतों में शास्त्रीय संगीत का व्यापक प्रयोग किया है। हिन्दुस्तानी शैली के रागों के साथ-साथ बहुत से दक्षिण भारतीय रागों का प्रयोग उनके गीतों में लगातार सुनने को मिला है और यह परम्परा उनके नए गीतों में भी जारी है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि रहमान के गाने केवल शास्त्रीय संगीत आधारित ही होते हैं। 90 के दशक में उनके गीतों में हमें पाश्चात्य संगीत का अद्भुत प्रयोग सुनने को मिला है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की मिठास और पाश्चात्य संगीत की थिरकन, दोनों के फ़्युज़न ने रहमान के गीतों को लोकप्रियता की उस बुलन्दी पर पहुँचाया कि अब तक वे उस शीर्ष स्थान पर विराजमान हैं। वर्ष 2001 की आमिर ख़ान निर्मित, आशुतोष गोवारिकर निर्देशित ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ’लगान’ के गीत संगीत में जावेद अख़्तर और ए. आर. रहमान ने कमाल का काम किया है। फ़िल्म का हर एक गीत अपने आप में मास्टरपीस साबित हुआ है। पीरियड फ़िल्म होने की वजह से रहमान को फिर एक बार मौका मिला इसके गीतों में शास्त्रीय और लोक संगीत की छटा बिखेरने का। उस पर ब्रिटिश पार्श्वभूमि होने की वजह से पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत के उनके फ़्युज़न की वजह से फ़िल्म के गाने कहानी से इस क़दर घुलमिल गए कि सारे गाने कहानी का ही अंग बन गए। The Los Angeles Times समाचार पत्र ने अपनी समीक्षा में लिखा, “Songs and dances are not mere interludes inserted in the action, bringing it to a halt—a Bollywood trademark—but are fully integrated into the plot and marked by expressive, dynamic singing and dancing that infuse a historical drama with energy and immediacy. A review of the tracks suggests that “the music is true to the time period (the British Raj)”“घनन घनन घिर घिर आये बदरा…”, “ओ मितवा, सुन मितवा, तुझको क्या डर है रे…”, “राधा कैसे ना जले…”, “ओ पालनहारे…”, “ओ री छोरी, मान भी ले बात मोरी…” और “बार-बार हाँ, बोलो यार हाँ…”, हर एक गीत में सिचुएशन के अनुरूप शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत और पाश्चात्य संगीत के प्रयोग ने हर गीत को यथार्थ किया।


“बार-बार हाँ…” गीत में देशभक्ति का जस्बा और जीत हासिल करने की तीव्र इच्छा, और साथ ही अपने दल के सदस्यों का उत्साहवर्धन, ये सारे भाव कूट-कूट कर भरा हुआ है। एक कविता की शैली में लिखे इस गीत को संगीतबद्ध करते समय ए. आर. रहमान ने राग जोग के सुरों का आधार लिया। यह कमाल की बात है कि हिन्दी फ़िल्मी गीतों में राग जोग का प्रयोग शायद ही कभी सुनने को मिला हो। आशा भोसले की गायी ग़ैर-फ़िल्मी ग़ज़ल “दिल धड़कने का सबब याद आया, वो तेरी याद थी अब याद आया” में इस राग का प्रयोग मिलता है। हिन्दुस्तानी शैली का राग होने के बावजूद दक्षिण के संगीतकारों ने अपने गीतों में इस राग का प्रयोग किया है। इलैयाराजा और ए. आर. रहमान ने सर्वाधिक इस राग का प्रयोग अपने तमिल गीतों में किया। रहमान के संगीत में आशा भोसले का गाया “वेन्निला वेन्निला”, बॉम्बे जयश्री और पी. उन्नीकृष्णन् की आवाज़ों में “नरुमुग‍इये नरुमुग‍इये”, कुणाल गांजावाला और साधना सरगम का गाया “स्पाइडरमैन” और ए. आर. रहमान की आवाज़ में “संदोशा कन्निरे” जैसे तमिल फ़िल्मी गीत राग जोग पर ही आधारित हैं। पर हिन्दी फ़िल्मों में ’लगान’ के इस गीत के अलावा रहमान या अन्य किसी संगीतकार का शायद ही कोई और गीत इस राग पर आधारित हो। राग जोग की विशेषताओं पर बात करने से पहले लीजिए इस गीत का आनन्द लीजिए जिसे ए. आर. रहमान, श्रीनिवास और साथियों ने गाया है। 

गीत : “बार-बार हाँ…” , फ़िल्म : लगान, गायक: ए. आर. रहमान, श्रीनिवास, साथी 



राग जोग को काफ़ी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होते हैं। राग की जाति औड़व-औड़व है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग किये जाते हैं। शुद्ध निशाद की जगह कोमल निशाद का प्रयोग किया जाता है। अवरोह में कोमल गांधार का भी प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षड़ज होता है। राग जोग के गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना गया है। उत्तरांग में निषाद लगाते समय कभी कभी षड़ज को कण स्वर के रूप में प्रयोग करते हैं जैसे – ग म प (सां) कोमल नि सां। यह एक मींड प्रधान राग है जिसे तीनों सप्तकों में उन्मुक्त रूप से गाया जा सकता है। यह एक गम्भीर प्रकृति का राग है। कन्नड़ नाट में राग जोग और तिलक कामोद का प्रयोग बहुतायत में मिलता है। जोग सम्पूर्ण पुर्वांग प्रधान राग है जो राग तिलंग के समीप है। राग जोग को शुद्ध रूप से अनुभव करने के लिए आइए अब हम सरोद और वायलिन की एक जुगलबन्दी सुनते हैं दो महान कलाकारों से। सरोद पर हैं उस्ताद अली अक्बर ख़ाँ और वायलिन पर डॉ. एल. सुब्रह्मण्यम। इस जुगलबन्दी को ’संगीत संगम’ ऐल्बम के छठे वॉल्युम में शामिल किया गया है।

ठुमरी : तुम काहे को नेहा लगाये…”, राग : तिलंग, गायक : इन्दुबाला देवी 


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कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
विशेष सलाहकार : शिलाद चटर्जी
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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