राग - भारतीय शास्त्रीय संगीत

स्वरगोष्ठी – 509: “पुरवा सुहानी आयी रे …” : राग – तिलंग :: SWARGOSHTHI – 509 : RAG – TILANG

             



स्वरगोष्ठी – 509 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 13 

“आत्मा और परमात्मा मिले जहाँ, यही है वो स्थान…”, तिलंग के सुरों  से होती है “पुरवा सुहानी आयी रे” की शुरुआत


“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी,  साथी सलाहकर शिलाद चटर्जी के साथ, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।उन्नीसवीं सदी में देशभक्ति गीतों के लिखने-गाने का रिवाज हमारे देश में काफ़ी ज़ोर पकड़ चुका था। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा देश गीतों, कविताओं, लेखों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करने लगा। जहाँ एक तरफ़ कवियों और शाइरों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखे, वहीं उन कविताओं और गीतों को अर्थपूर्ण संगीत में ढाल कर हमारे संगीतकारों ने उन्हें और भी अधिक प्रभावशाली बनाया। ये देशभक्ति की धुनें ऐसी हैं कि जो कभी हमें जोश से भर देती हैं तो कभी इनके करुण स्वर हमारी आँखें नम कर जाते हैं। कभी ये हमारा सर गर्व से ऊँचा कर देते हैं तो कभी इन्हें सुनते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन देशभक्ति की रचनाओं में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और इन्हीं रागाधारित देशभक्ति रचनाओं से सुसज्जित है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की बारह कड़ियों में राग आसावरी, कोमल ऋषभ आसावरी, गुजरी तोड़ी, पहाड़ी, भैरवी, मियाँ की मल्हार, कल्याण (यमन), शुद्ध कल्याण, जोगिया, काफ़ी, भूपाली, दरबारी कान्हड़ा, देश/देस और देस मल्हार पर आधारित देशभक्ति गीतों की चर्चा की गई हैं। आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की तेरहवीं कड़ी, जिसमें हम सुनवा रहे हैं राग तिलंग और भैरवी पर आधारित एक फ़िल्मी देशभक्ति गीत फ़िल्म ’पूरब और पश्चिम’ से – “पुरवा सुहानी आयी रे…”। साथ ही राग तिलंग की एक ठुमरी, इन्दुबाला देवी की आवाज़ में। 

हिन्दी  फ़िल्मी देशभक्ति गीतों पर कोई भी चर्चा फ़िल्मकार मनोज कुमार की फ़िल्मों के देशभक्ति गीतों के बग़ैर अधूरी है। फ़िल्मी देशभक्ति गीतों के ख़ज़ाने को समृद्ध करने में मनोज कुमार की भूमिका सराहनीय है। ’शहीद’, ’उपकार’, ’पूरब और पश्चिम’, ’क्रान्ति’, ’क्लर्क’, ’देशवासी’ जैसी फ़िल्मों में एक से बढ़ कर एक देशभक्ति गीत हमें सुनने को मिले हैं। आज के इस अंक के लिए फ़िल्म ’पूरब और पश्चिम’ के एक बेहद ख़ूबसूरत गीत को हमने चुना है। इस गीत की सबसे ख़ास बात यह है कि शुरुआती पंक्तियों के अलावा पूरे गीत में कहीं भी देश भक्ति या राष्ट्रीयता से सम्बन्धित शब्द सुनने को नहीं मिलते। पर बावजूद इसके, समूचे गीत में भारतीयता का चित्रण स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। फ़िल्मांकन में भी देश के उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक के विशिष्ट पर्यटन स्थलों के दृश्य दिखाये जाते हैं। विभिन्न प्रसंगों और संदर्भों के सांकेतिक उल्लेखों से यह गीत महज़ एक नृत्य गीत ना रह कर एक संदेशात्मक राष्ट्रीय उत्सव गीत बन पड़ा है। गीतकार संतोष आनन्द मनोज कुमार की कई फ़िल्मों में एक से एक सुन्दर गीत लिखे हैं और यह गीत भी उन्हीं में से एक है। कल्याणजी-आनन्दजी के संगीत में रिदम और ठेकों को ख़ास जगह हमेशा मिली है और यह गीत कोई व्यतिक्रम नहीं। लता मंगेशकर, महेन्द्र कपूर, मनहर और साथियों द्वारा गाया यह गीत फ़िल्माया गया है मनोज कुमार, विनोद खन्ना और भारती पर। मनहर ने विनोद खन्ना का पार्श्वगायन किया है। दृश्य में सायरा बानो भी नज़र आती हैं।


“पुरवा सुहानी आयी रे” गीत के शुरू में मुखड़े से पहले कुछ पंक्तियाँ गायी जाती हैं बिना ताल के।

“कहीं ना ऐसी सुबह देखी जैसे बालक की मुस्कान
लाख दूर कहीं मन्दिर हल्की सी मुरली की तान
गुरुबानी गुरुद्वारे में तो मस्जिद से उठती अज़ान
आत्मा परमात्मा मिले जहाँ, यही है वो स्थान”

उपर्युक्त पंक्तियों के गायन में राग तिलंग की स्पष्ट छाया का अनुभव किया जा सकता है। तिलंग के आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध निषाद, किन्तु अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। ये सारी विशेषताएँ प्रस्तुत गीत की इन शुरुआती पंक्तियों में भी मौजूद है। इसके बाद समूह स्वरों में लोक नृत्य आधारित पंक्ति “ढोली ढोल बजाणा, ताल से ताल मिलाना…” गीत के रिदम को सेट करती है और फिर मुखड़ा शुरू होता है “पुरवा सुहानी आयी रे, पुरवा”। इस पंक्ति में राग भैरवी की हल्की छाया मिलती है। विविध भारती के ’उजाले उनकी यादों के’ कार्यक्रम में संगीतकार आनन्दजी से बातचीत के दौरान “पुरवा सुहानी आयी रे” गीत को बजाने से पहले आनन्दजी ने विविध भारती के ’लोक संगीत’ का हवाला देते हुए इस गीत के संगीत से जुड़ी महत्वपूर्ण बात बतायी जो यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं –

लोक संगीत’, इस प्रोग्राम को मैं बहुत सुनता रहा हूँ। यहाँ पे मादल क्यों बज रहा है, यहाँ पे यह क्यों बज रहा है, वो चीज़ें मुझपे बहुत हावी होती रही हैं, क्योंकि शुरू से मेरी यह जिज्ञासा रही है कि यह ऐसा क्यों है? कि यहाँ मादल क्यों बजाई जाती है? हिमाचल में अगर गाना हो रहा है तो फ़ास्ट गाना नहीं होगा क्योंकि ऊपर high altitude पे साँस नहीं मिलती, तो वहाँ पे आपको स्लो ही नंबर देना पड़ेगा। अगर पंजाब है तो वहाँ plateau है तो आप धनधनाके, खुल के डांस कर सकते हैं। सौराष्ट्र में आप जाएँगे तो वहाँ पे कृष्ण, उषा, जो लेके आए थे, वो आपको मिलेगा, वहाँ का डांडिया एक अलग होता है, यहाँ पे ये अलग होता है, तो ये सारी चीज़ें अगर आप सीखते जाएँ, सीखने का आनंद भी आता है, और इन चीज़ों को काम में डालते हैं तो काम आसान भी हो जाता है।”
 

गीत : “पुरवा सुहानी आयी रे…” , फ़िल्म : पूरब और  पश्चिम, गायक: लता मंगेशकर, महेन्द्र कपूर, मनहर, साथी 



राग तिलंग को खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत वर्जित होता है। राग की जाति औड़व-औड़व होती है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध निषाद, किन्तु अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग तिलंग के गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना जाता है। यद्यपि राग तिलंग में ऋषभ स्वर वर्जित होता है, फिर भी राग के सौन्दर्य-वृद्धि के लिए कभी-कभी तार सप्तक के अवरोह में ऋषभ स्वर का प्रयोग कर लिया जाता है। यह श्रृंगार रस प्रधान, चंचल प्रकृति का राग होता है, अतः इसमें छोटा खयाल, ठुमरी और सुगम संगीत की रचनाएँ अधिक मिलती हैं। यह पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग तिलंग में अधिकतर ठुमरी गायी जाती है। एक शताब्दी से भी पहले व्यावसायिक गायिकाओं द्वारा गायी गई ठुमरियों का स्वरूप कैसा होता था, इसका अनुभव कराने के लिए अब हम आपको पिछली शताब्दी की गायिका इन्दुबाला देवी के स्वर में राग तिलंग की एक ठुमरी सुनवाते है। भारत में ग्रामोफोन रिकार्ड के निर्माण का आरम्भ 1902 से हुआ था। सबसे पहले ग्रामोफोन रिकार्ड में उस समय की मशहूर गायिका गौहर जान की आवाज़ थी। संगीत की रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर में ग्रामोफोन कम्पनी को बड़ी कठिनाई से गायिकाएँ उपलब्ध हो पातीं थीं। प्रारम्भ में व्यावसायिक गायिकाएँ ठुमरी, दादरा, कजरी, होरी, चैती आदि रिकार्ड कराती थीं। 1902 से गौहर जान ने जो सिलसिला आरम्भ किया था, 1910 तक लगभग 500 व्यावसायिक गायिकाओं ने अपनी आवाज़ रिकार्ड कराई। इन्हीं में एक गायिका इन्दुबाला देवी भी थीं। आइए अब हम इन्हीं की आवाज़ में राग तिलंग की ठुमरी सुनते हैं। ठुमरी के बोल हैं, -“तुम काहे को नेहा लगाए…”। आप यह ठुमरी सुनिए।

ठुमरी : तुम काहे को नेहा लगाये…”, राग : तिलंग, गायक : इन्दुबाला देवी 


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कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
विशेष सलाहकार : शिलाद चटर्जी
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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