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राग काफी : SWARGOSHTHI – 457 : RAG KAFI






स्वरगोष्ठी – 457 में आज

काफी थाट के राग – 1 : राग और थाट काफी

विदुषी गिरिजा देवी से राग काफी में होरी और मुहम्मद रफी व साथियों से फिल्मी गीत सुनिए


विदुषी गिरिजा देवी
मुहम्मद रफी

“रेडियो
प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब
संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत
आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय
संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का
प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम
पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति
है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट
कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण
भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत
पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु
नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के
वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस
थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी
और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत
सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं
जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के
उत्तरार्द्ध में ‘राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के
वर्गीकरण की परम्परागत ‘ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल
अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग
प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत
रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं
शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया
है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों
तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक
दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल
संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे
जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में
हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा करेंगे। प्रत्येक थाट एक आश्रय अथवा
जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम
काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में काफी
थाट के जनक अथवा आश्रय जन्य राग काफी पर चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की पहली
कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध विदुषी गिरिजा देवी के स्वर में राग काफी
में निबद्ध एक होरी ठुमरी रचना का रसास्वादन कराएंगे और फिर इसी राग पर
आधारित एक पुरानी हिन्दी फिल्म का गीत मुहम्मद रफी और साथियों के स्वर में
प्रस्तुत करेंगे। 1963 में प्रदर्शित सुप्रसिद्ध उपन्यासकार मुंशी
प्रेमचन्द के उपन्यास “गोदान” पर आधारित फिल्म के गीतकार अनजान और संगीतकार
पण्डित रविशंकर हैं।

काफी थाट
में गान्धार और निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते
हैं। राग काफी, काफी थाट का जनक अथवा आश्रय राग माना जाता है। राग काफी में
उसके थाट के अनुकूल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर पंचम
और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इसकी जाति सम्पूर्ण होती है। इस राग के गायन
अथवा वादन का अनुकूल समय मध्यरात्रि माना जाता है, किन्तु फाल्गुन मास में
किसी भी समय गायन या वादन किया जा सकता है। राग काफी और काफी थाट के अन्य
जन्य रागों में भारतीय पर्व होली की रचनाएँ भरपूर मिलती हैं। होली, उल्लास,
उत्साह और मस्ती का प्रतीक पर्व होता है। यह ऋतु परिवर्तन और नई फसल के
तैयार होने का प्रतीक पर्व भी माना जाता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण
भारतीय संगीत की सभी शैलियों में पाया जाता है। उपशास्त्रीय संगीत में तो
होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी, दादरा विशेष रूप से पूरब अंग
की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की
वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी
रंग से रँगी होली में परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल बनाव से
गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली
गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है। अब हम आपको विदुषी
गिरिजा देवी के स्वरों में जो काफी होरी सुनवा रहे हैं, उसमें राधाकृष्ण की
होली का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। लीजिए, आप भी सुनिए, राग काफी में निबद्ध यह मनमोहक होरी।
काफी होरी : “तुम तो करत बरजोरी…” : विदुषी गिरिजा देवी


राग
काफी चंचल प्रकृति का राग है। अतः इस राग में अधिकतर छोटा खयाल और ठुमरी
गायी जाती है। अधिकांश ठुमरियों में ब्रज की होली का चित्रण मिलता है। ऐसी
ठुमरियों को होली के आसपास फाल्गुन मास में हर समय गाया जा सकता है। दरअसल
राग काफी ऋतु प्रधान राग है। अब हम आपको सुनवाते है, राग काफी पर आधारित एक
फिल्मी गीत। 1963 में मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यास पर आधारित फिल्म “गोदान”
प्रदर्शित हुई थी। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी कृति ‘गोदान’
पर आधारित इस फिल्म के संगीतकार थे विश्वविख्यात सितार वादक पण्डित
रविशंकर। फिल्म के प्रायः सभी गीत रागों और उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल की
विभिन्न लोक संगीत शैलियों पर आधारित थे। इन्हीं में एक होली गीत भी था,
जिसे गीतकार अनजान ने लिखा और मोहम्मद रफी और साथियों ने स्वर दिया था। यह
होली गीत फिल्म में गोबर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता महमूद और उनके
साथियों पर फिल्माया गया था। इस गीत के माध्यम से परदे पर ग्रामीण होली का
परिवेश साकार हुआ था। लोकगीत के स्वरूप में होते हुए भी राग काफी के स्वर
समूह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। यह गीत कहरवा ताल में है, जिसमें
ब्रज की होली का चित्रण है। आइए, हम सब आनन्द लेते है, फिल्म “गोदान” के इस
होली गीत का। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की
अनुमति दीजिए।
राग काफी : “होली खेलत नन्दलाल बिरज में…” मुहम्मद रफी और साथी : फिल्म – गोदान

संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के 457वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1997 में प्रदर्शित एक
फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक
अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही
उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों
का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 460वें अंक
की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के प्रथम
सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों
की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें
सम्मानित भी किया जाएगा।

1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका का स्वर है?
आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com
पर ही शनिवार 29 फरवरी, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि
उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली
प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार
नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के
नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 459 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक
में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने
किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में
स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।
पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता


“स्वरगोष्ठी”
के 455वें अंक में हमने आपको 2015 में प्रदर्शित मराठी फिल्म “कटयार
कालजात घुसली” से एक राग आधारित नाट्य गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से
कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही
उत्तर है; राग – पूरिया कल्याण, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – शंकर महादेवन और महेश काले

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी।
उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक
इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है
कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई मेल से ही भेजा करें। इस पहेली
प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं
है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको
पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।

अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी
नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की पहली कड़ी में आज आपने काफी थाट और उसके
आश्रय अथवा जनक राग काफी राग का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के
उपशास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा
देवी के स्वर में इस राग की एक होरी ठुमरी का रसास्वादन किया। राग काफी के
आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए 1963 में
प्रदर्शित फिल्म “गोदान” का एक गीत मुहम्मद रफी और साथियों के स्वर में
प्रस्तुत किया। फिल्म के संगीतकार पण्डित रविशंकर हैं। कुछ तकनीकी समस्या
के कारण अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर
पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट https://radioplaybackindia.com अथवा http://139.59.14.115/rpi/wordpress
पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें।
“स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी
अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर
सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की
प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी
“स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया
हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ
कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के
इसी मंच पर एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
 राग काफी : SWARGOSHTHI – 457 : RAG KAFI : 23 फरवरी, 2020 

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