Dil se Singer

राग देसी : SWARGOSHTHI – 448 : RAG DESI






स्वरगोष्ठी – 448 में आज

नौशाद की जन्मशती पर उनके राग – 4 : राग देसी

पं.दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ से सुनिए; “आज गावत मन मेरो…”


उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ
नौशाद

‘रेडियो
प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
श्रृंखला – “नौशाद की जन्मशती पर उनके राग” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन
मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम
भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान रहे नौशाद अली के व्यक्तित्व और
उनके कृतित्व पर चर्चा करेंगे। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको
फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार
नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को
सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण
परिवार में नौशाद अली का जन्म हुआ था। इस तिथि के अनुसार दिसम्बर, 2019 में
नौशाद का एक सौवाँ जन्मदिन पड़ता है। इस उपलक्ष्य में हम “स्वरगोष्ठी” के
दिसम्बर मास के प्रत्येक अंक में नौशाद के कुछ राग आधारित ऐतिहासिक गीत
प्रस्तुत करेंगे। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी
मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड
(वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली
दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को
निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा
भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें।
नौशाद उस दूकान पर रोज बैठने लगे। वहाँ वह साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान
के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी
बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म
प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ
के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो
हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने।
नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए
सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस
दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घरवालों की फटकार बदस्तूर
जारी रही। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए मायानगरी
बम्बई (अब मुम्बई) की ओर रुख किया।

लखनऊ से
बम्बई (अब मुम्बई) आकर कुछ समय तक नौशाद अपने एक मित्र के परिचित डॉ.
अब्दुल अलीम नामी के यहाँ रहे। परन्तु जब उन्हें ‘न्यू पिक्चर कम्पनी’ में
पियानो वादक की नौकरी मिल गई तब वह लखनऊ के ही एक अख्तर साहब के साथ दादर
में रहने लगे। अख्तर साहब एक दूकान में सेल्समैन थे और उसी दूकान में रहा
करते थे। रात को दूकान में जब गर्मी लगती तब दोनों मित्र बाहर फुटपाथ पर
अपना बिस्तर लगा लेते। सड़क के दूसरी ओर ‘ब्राडवे सिनेमाघर’ था। जब बरसात
होती तो उन्हे शिवाजी भवन की सीढ़ियों के नीचे शरण लेनी पड़ती। उसी सीढ़ियों
पर खट-खट करती उस जमाने की मशहूर हीरोइन लीला चिटनिस अपने निवास में जाया
करती थी। ‘ब्राडवे सिनेमाघर’ में ही वर्षों बाद नौशाद की फिल्म ‘बैजू
बावरा’ ने गोल्डन जुबली मनाई थी। इस अवसर पर सामने के फुटपाथ को देख कर
नौशाद ने अपने कड़की के दिनों के फुटपाथ के दिनों को याद कर नम आँखों से
फिल्म के निर्देशक विजय भट्ट से कहा था; –“इस सड़क को पार करने में मुझे
पन्द्रह वर्ष लग गए”।

नौशाद, पलुस्कर जी और अमीर खाँ

अपने
संगीत निर्देशन के आरम्भिक दशक में नौशाद के गीतों की विशेषता थी कि इनमें
अवधी लोक संगीत का मनोहारी मिश्रण मिलता है। इस पहले दशक के गीतों में
जहाँ भी रागों का स्पर्श उन्होने किया, उनकी धुनें सुगम और गुनगुनाने लायक
थीं। नौशाद की छठें दशक की फिल्मों में रागदारी संगीत का प्रभुत्व बढ़ता
गया। अब हम वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ और उसके गीतों की
चर्चा करते हैं, जिसमें नौशाद ने रागों के प्रति अपने अगाध श्रद्धा को
सिद्ध किया और राग आधारित गीतों को संगीतबद्ध करने की अपनी क्षमता को उजागर
किया। इस वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ में नौशाद ने कई कालजयी गीतो
की रचना की थी। फिल्म के गीतों के लिए उनके पास कई लोकप्रिय पार्श्वगायक और
गायिकाओं की आवाज़ का साथ तो था ही, रागों का शुद्ध रूप में प्रस्तुत करने
की ललक के कारण उन्होने उस समय के प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ
और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर को भी फिल्म गीत गाने के लिए राजी
किया। खाँ साहब और पण्डित पलुस्कर द्वारा प्रस्तुत राग देशी के स्वरों में
जुगलबन्दी वाला गीत- ‘आज गावत मन मेरो…’ तो फिल्म संगीत के इतिहास में एक
अमर गीत बन चुका है। इसके अलावा उस्ताद अमीर खाँ ने अपने एकल स्वर में राग
पूरिया धनाश्री में गीत- ‘तोरी जय जय करतार…’ भी गाया था। अकबर के
समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1953 में
एक फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के
संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक
बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के
रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन
सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञ थे।
परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी
हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत
प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष
यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य
अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश
में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग देसी के
स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन बादशाह अकबर
के दरबार में किया गया था। तानसेन और बैजू बावरा के बीच एक सांगीतिक
प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। अकबर बादशाह ने श्रेष्ठता के निर्णय के
लिए यह शर्त रखी कि जिसके संगीत के असर से पत्थर पिघल जाएगा वही गायक
सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस प्रतियोगिता में तानसेन
की तुलना में बैजू बावरा की श्रेष्ठता सिद्ध हुई थी। आज का गीत फिल्म के
इसी प्रसंग में प्रस्तुत किया गया है। इस गीत में अपने समय के दो दिग्गज
गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी.वी.) पलुस्कर ने
अपना स्वर दिया है।

राग देसी : ‘आज गावत मन मेरो झूम के…’: पण्डित डी.वी. पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ

संगीतकार
नौशाद को भारतीय संगीत के रागों के प्रति कितनी श्रद्धा थी, इस गीत को सुन
कर स्पष्ट हो जाता है। अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञों को फिल्म संगीत
के मंच पर लाने में नौशाद अग्रणी रहे हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हमने
फिल्म ‘बैजू बावरा’ के एक गीत के माध्यम से प्रकृति के रंगों को बिखेरने
में सक्षम राग ‘देसी’ अथवा ‘देसी तोड़ी’ पर चर्चा की। अभी आपने जो युगल गीत
सुना, वह तीनताल में निबद्ध था। परदे पर तानसेन के लिए उस्ताद अमीर खाँ ने
और बैजू बावरा के लिए पण्डित पलुस्कर जी ने स्वर दिया था। मित्रों, इन
दोनों कलासाधकों का व्यक्तित्व और कृतित्व इतना विशाल है कि ‘स्वरगोष्ठी’
के इस अंक में मात्र कुछ पंक्तियों में समेटा नहीं जा सकता। इस गीत के
गीतकार, शकील बदायूनी और संगीतकार, नौशाद हैं। अपने समय के इन दो दिग्गज
संगीतज्ञों की उपस्थिति में नौशाद साहब किस प्रकार उन्हें निर्देशित कर पाए
होंगे यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। वर्षों पहले एक साक्षात्कार में नौशाद
जी ने स्वयं इस गीत की चर्चा करते हुए बताया था कि उन्होने दोनों दिग्गज
संगीतज्ञों को फिल्म के प्रसंग की जानकारी दी, राग पर चर्चा हुई और गाने के
बोल दिये। उन्होने आपस में सलाह-मशविरा किया और फिर रिकार्डिंग शुरू हो
गई। इस गीत के आरम्भिक लगभग 1 मिनट 45 सेकेण्ड की अवधि में दोनों गायकों ने
‘तुम्हरे गुण गाउँ…’ पंक्तियों के माध्यम से विलम्बित खयाल की झलक और
शेष भाग में द्रुत खयाल का रूप प्रदर्शित किया है। गीत के अन्तिम भाग में
तानसेन के तानपूरा का तार टूट जाता है, जबकि बैजू द्रुत लय की तानें लगाते
रहते हैं। फिल्म में उनकी तानों के असर से काँच के पात्र में रखा पत्थर
पिघलने लगता है।

आइए,
अब कुछ चर्चा राग देसी के बारे में करते है। दिन के दूसरे प्रहर में
गाये-बजाये जाने वाले इस राग को देसी के अलावा देसी तोड़ी अथवा देस तोड़ी भी
कहते हैं। यह आसावरी थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है अर्थात
आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी
स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल
होते है, जबकि धैवत और निषाद स्वर शुद्ध रूप में भी प्रयोग किया जाता है।
इसमे शुद्ध धैवत के स्थान पर कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है, शेष सभी
स्वर राग देस के समान ही प्रयोग किया जाता है। फिल्म ‘बैजू बावरा’ में इस
राग का संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त मुखर प्रयोग किया गया था। आइए, अब हम आपको
इस राग का एक समृद्ध आलाप उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में सुनवा रहे हैं।

भारतीय
संगीत के प्रचलित घरानों में जब भी आगरा घराने की चर्चा होगी तत्काल एक
नाम जो हमारे सामने आता है, वह है, आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का।
पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के
रूप में करते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ उन्ही में से एक थे। ध्रुपद-धमार,
खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा आदि सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें कुशलता
प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया
ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस की वर्षा कर देते थे।
फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा रँगीले घराना’ के नाम से विख्यात ध्रुवपद गायकों
के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास
पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही
पितृ-विहीन बालक को उनके नाना गुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बना
लिया और पालन-पोषण के साथ ही संगीत के शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक
आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब
बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ
से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण
पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित हो चुके थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना
ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई।
आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत
समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। अब हम उस्ताद
फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में राग देसी का आलाप प्रस्तुत कर रहे हैं। आप यह
रचना सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।
राग देसी : ध्रुपद अंग में आलाप : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ

संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के 448वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित एक
फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक
अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही
उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों
का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की
अन्तिम पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक
होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके
साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में
महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।

1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत को किस ताल में निबद्ध किया गया है, हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका का मुख्य स्वर है?
आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com
पर ही शनिवार, 28 दिसम्बर, 2019 की मध्यरात्रि तक अपने पते के साथ भेज
सकते हैं। इसके बाद आपका उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। आपको यदि उपरोक्त
तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली
प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर
स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम
के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 450  में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में
प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या
अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी
में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।
पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता


“स्वरगोष्ठी”
के 446वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा
कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो
प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही
उत्तर है; राग – पीलू, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और साथी

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी।
उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं। सभी विजेताओं को
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से
अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस
पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह
आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो।
यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते
हैं।
संवाद



पिछले
अंक में हमने लखनऊ में आयोजित पण्डित राधावल्लभ चतुर्वेदी की स्मृति में
संगीत संध्या पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इस समाचार पर हमारे कई पाठकों
ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इनमें से एक प्रतिक्रिया आज के अंक में
हम प्रस्तुत कर रहे हैं।

हमारी एक पुरानी पाठक पेंसिलवेनिया, अमेरिका निवासी श्रीमती विजया राजकोटिया लिखती हैं; Vijaya Rajkotia
:- It was quite interesting to read about gathering for Pandit
Radhavallabh Chaturvedi. Our music will live in this world forever.
अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी
श्रृंखला “नौशाद की जन्मशती पर उनके राग” की तीसरी कड़ी में आज आपने राग
देसी का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने
के लिए आपने सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में इस राग का एक
समृद्ध आलाप प्रस्तुत किया। नौशाद के राग देसी के आधार पर रचे गए फिल्मी
गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर और
उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में राग देसी में निबद्ध फिल्म “बैजू बावरा” का एक
गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम श्रृंखला की अगली कड़ी में नौशाद का
रागबद्ध एक अन्य गीत प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण
“स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर
साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट https://radioplaybackindia.com अथवा http://139.59.14.115/rpi/wordpress
पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें।
“स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की
प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी
“स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया
हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो
तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका
कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  राग देसी : SWARGOSHTHI – 448 : RAG DESI

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