Dil se Singer

राग कलिंगड़ा : SWARGOSHTHI – 439 : RAG KALINGADA







स्वरगोष्ठी – 439 में आज


भैरव थाट के राग – 5 : राग कलिंगड़ा



कौशिकी चक्रवर्ती से राग कलिंगड़ा में एक दादरा और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए


लता मंगेशकर
विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती

“रेडियो
प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब
संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत
आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय
संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग
होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5
स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है।
सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट
कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72
मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग
किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ
किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है।
भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव,
पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत
प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में
थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता
है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ‘राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक
लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत ‘ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का
परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस
समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी
में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली
का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक
ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का
प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने
भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई
सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट
में से चौथा थाट भैरव है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है
और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम भैरव थाट के जनक और जन्य
रागों पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में भैरव थाट के जन्य राग “कलिंगड़ा” पर
चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के पाँचवें अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध
संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती द्वारा राग कलिंगड़ा का परिचय और उनकी
सुपुत्री विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती द्वारा इस राग में निबद्ध एक उपशास्त्रीय
दादरा प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत लता
मंगेशकर के स्वर में सुनवाएँगे। 1952 में प्रदर्शित फिल्म “बैजू बावरा” से
शकील बदायूनी का लिखा और नौशाद का संगीतबद्ध किया एक गीत – “मोहे भूल गए
साँवारिया…”
का रसास्वादन भी आप करेंगे।




राग कलिंगड़ा
की रचना भैरव थाट से मानी गई है। इस राग में ऋषभ और धैवत स्वर कोमल लगते
हैं। वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण
जाति का राग है, अर्थात इस राग के वादी और संवादी में सात-सात स्वर प्रयोग
होते हैं। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि का अन्तिम
प्रहर अर्थात प्रातः 4 से 7 बजे के बीच माना जाता है। कुछ विद्वान राग
कलिंगड़ा का वादी स्वर कोमल धैवत और संवादी स्वर गान्धार मानते हैं। इसमें
धैवत को वादी मानना उचित नहीं है, क्योंकि इस राग मेन धैवत स्वर पर बिल्कुल
न्यास नहीं होता और पंचम स्वर की तुलना में इसका स्थान गौड़ है। इस राग में
पंचम स्वर प्रमुख है और इस पर अत्यधिक न्यास होता है, इसलिए पंचम स्वर को
वादी स्वर मानना अधिक उचित है। दूसरे, इसके समप्रकृति राग भैरव में धैवत
स्वर को ही वादी स्वर माना गया है। अतः वरिष्ठ संगीतज्ञों के मतानुसार राग
कलिंगड़ा पंचम को वादी और षडज को संवादी स्वर माना जाना चाहिए। यह चंचल
प्रकृति का राग है। इसमें बड़ा खयाल और मसीतखानी गतें कम सुनाई देती हैं।
राग भैरव की तुलना में राग कलिंगड़ा कम लोकप्रिय है। यह प्रातःकालीन
सन्धिप्रकाश राग है। इसका कारण यह है कि कि इसमें ऋषभ और धैवत स्वर कोमल
होने के साथ ही शुद्ध गान्धार और शुद्ध मध्यम स्वर प्रयोग किए जाते हैं।
आइए, विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती के स्वर में इस राग में निबद्ध उस्ताद दबीर खाँ रचित एक दादरा का
रसास्वादन करें। इस वीडियो में दादरा से पहले सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित अजय
चक्रवर्ती से राग कलिंगड़ा की स्वर-संरचना का वर्णन किया है।

राग कलिंगड़ा : “तुम कहाँ से आए हो…” : दादरा : विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती


राग
कलिंगड़ा में वादी-संवादी स्वरों के अतिरिक्त गान्धार स्वर खूब चमकता है।
इसीलिए यह राग भैरव से अलग दीखता है। राग कलिंगड़ा में वही स्वर प्रयोग किये
जाते हैं, जो राग भैरव में इस्तेमाल होते हैं। किन्तु दोनों का चलन अलग
होता है। दोनों रागों में उत्तरांग स्वर वादी है अर्थात सप्तक के दूसरे भाग
से वादी स्वर चुना गया है। दोनों रागों की प्रकृति में यह अन्तर है कि राग
कलिंगड़ा की प्रकृति चंचल और राग भैरव की प्रकृति गम्भीर होती है। राग भैरव
में ऋषभ और धैवत स्वरों पर आन्दोलन होता है, किन्तु राग कलिंगड़ा में किसी
भी स्वर पर आन्दोलन नहीं होता। कुछ गायक राग की रंजकता बढ़ाने के लिए
कभी-कभी भैरव के अवरोह में कोमल निषाद लगा देते हैं, किन्तु राग कलिंगड़ा
में ऐसा कभी नहीं होता। राग भैरव में कोमल निषाद लगाने पर राग रामकली की
छाया आने की बहुत सम्भावना रहती है, इसीलिए इसे नहीं प्रयोग किया जाना उचित
है। राग कलिंगड़ा में गान्धार पर न्यास होता है, किन्तु राग भैरव में इस
स्वर पर न्यास नहीं होता। राग भैरव अपने थाट का आश्रय राग है, जबकि राग
कलिंगड़ा थाट का जन्य राग है। राग कलिंगड़ा में मींड़ का काम लगभग नहीं होता,
जबकि राग भैरव में यह कार्य प्रचुरता से किया जाता है, क्योंकि राग कलिंगड़ा
चंचल प्रकृति राग है और भैरव गम्भीर प्रकृति का राग है। इसके अलावा राग
कलिंगड़ा का विस्तार केवल मध्य और तार सप्तकों में किया जाता है, जबकि राग
भैरव का विस्तार तीनों सप्तकों में किया जाता है। राग कलिंगड़ा की अनुभूति
कराने के लिए अब हम आपको एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। फिल्मी गीतों में
राग-तत्व पर शोधकर्ता के.एल. पाण्डेय के अनुसार इस गीत में राग कलिंगड़ा की
छाया है, किन्तु कहीं-कहीं इसमें राग भैरव भी दिखाई देता है। गीत 1952 में
प्रदर्शित फिल्म “बैजू बावरा” से लिया गया है, जिसके बोल हैं – “मोहे भूल गए साँवरिया…”। गीत लता मंगेशकर के स्वर में है। इसे गीतकार शकील बदायूनी ने लिखा और नौशाद ने संगीतबद्ध किया है। गीत कहरवा ताल में निबद्ध है।
राग कलिंगड़ा : “मोहे भूल गए साँवरिया…” : लता मंगेशकर : फिल्म – बैजू बावरा

संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के 439वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1954 में प्रदर्शित एक
फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक
अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही
उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों
का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 440वें अंक
की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे,
उन्हें वर्ष 2019 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही
पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की
घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।

1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com
पर ही शनिवार, 26 अक्तूबर, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको
यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप
पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर
स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम
के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 441 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में
प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या
अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी
में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता


“स्वरगोष्ठी”
के 437वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा
कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो
प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही
उत्तर है; राग – विभास (भैरव थाट), दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – सुरेश वाडकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया।
उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक
बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर
ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी
हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के
सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप
इसमें भाग ले सकते हैं।

अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी
श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में आज आपने भैरव थाट के जन्य
राग कलिंगड़ा का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को
समझने के लिए आपने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती से राग के
स्वर को समझने और उनकी सुपुत्री विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती के स्वर में इस
राग की एक दादरा रचना का रसास्वादन किया। राग कलिंगड़ा के आधार पर रचे गए
फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर
के स्वर में फिल्म “बैजू बावरा” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम
भैरव थाट के एक अन्य जन्य राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या
के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र
समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी
वेबसाइट https://radioplaybackindia.com अथवा http://139.59.14.115/rpi/wordpress
पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें।
“स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की
प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी
“स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया
हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो
तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका
कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




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