Dil se Singer

राग जोगिया : SWARGOSHTHI – 437 : RAG JOGIYA







स्वरगोष्ठी – 437 में आज


भैरव थाट के राग – 3 : राग जोगिया



पण्डित राजन-साजन मिश्र से राग जोगिया में खयाल तथा कमल बारोट और महेन्द्र कपूर से फिल्मी गीत सुनिए


पण्डित राजन और साजन मिश्र
कमल बारोट

“रेडियो
प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब
संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने
वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय
संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग
होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5
स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है।
सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट
कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72
मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग
किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ
किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव,
पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। 

महेन्द्र कपूर

इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत
प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में
थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता
है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ‘राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक
लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत ‘ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का
परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस
समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी
में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली
का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक
ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का
प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने
भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई
सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट
में से चौथा थाट भैरव है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है
और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम भैरव थाट के जनक और जन्य
रागों पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में भैरव थाट के जन्य राग “जोगिया” पर
चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के तीसरे अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध
संगीतज्ञ पण्डित राजन और साजन मिश्र के युगल-स्वर में राग जोगिया में
निबद्ध खयाल प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत कमल
बारोट और महेन्द्र कपूर के युगल स्वर में सुनवाएँगे। 1962 में प्रदर्शित
फिल्म “संगीत सम्राट तानसेन” से शैलेंद्र का लिखा और एस.एन. त्रिपाठी का
संगीतबद्ध किया एक गीत – “हे नटराज गंगाधर शम्भो भोलेनाथ…” का रसास्वादन
भी आप करेंगे।

‘भैरव’ थाट
के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग होते हैं- अहीर भैरव, गौरी, नट
भैरव, वैरागी, रामकली, गुणकली, कलिंगड़ा, जोगिया, विभास आदि। आज के अंक में
हम राग जोगिया पर चर्चा कर रहे हैं। राग जोगिया, भैरव थाट का जन्य राग माना
जाता है। इसके आरोह में गान्धार तथा निषाद स्वर वर्जित तथा अवरोह में
गान्धार स्वर वर्जित किया जाता है। अतः इस राग की जाति औड़व-षाड़व होती है।
राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग जोगिया का गायन
समय प्रातःकाल सन्धिप्रकाश के सय सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। कुछ
विद्वान राग जोगिया में तार षडज को वादी और मध्यम को संवादी मानते हैं।
किन्तु दोनों दृष्टियों में यह उत्तरांग प्रधान राग है। राग जिया में बहुधा
बड़ा खयाल नहीं गाया जाता। यह छोटा खयाल और ठुमरी के उपयुक्त राग माना जाता
है। कभी-कभी राग के आकर्षण को बढ़ाने के लिए अवरोह में कोमल निषाद का अल्प
प्रयोग कर लिया जाता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप के दिग्दर्शन के लिए अब
हम आपको इस राग में एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे है,
बनारस घराने के सुविख्यात युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र।
राग जोगिया : “मोरे अँगना कागा बोले…” : पण्डित राजन और साजन मिश्र

आज
हम भैरव थाट के जन्य राग जोगिया पर आधारित एक फिल्मी गीत भी सुनवा रहे
हैं। राग जोगिया औड़व-षाड़व जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में पाँच और
अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में गान्धार और निषाद तथा
अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। राग में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का
प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी शुद्ध स्वर प्रयोग होते हैं। आरोह के स्वर
हैं- सा, रे(कोमल), म, प, ध(कोमल), सां और अवरोह के स्वर हैं- सां, नि,
ध(कोमल), प, ध(कोमल), म, रे(कोमल), सा। इस राग का वादी स्वर मध्यम और
संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है।
राग जोगिया के स्वरों का सार्थक प्रयोग 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत
सम्राट तानसेन’ के एक गीत में संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने किया था। गीत का
फिल्मी संस्करण गीतकार शैलेन्द्र ने रचा है। यह गीत वास्तव में शिव-वन्दना
है। अनेक विद्वानों का मत है कि इसकी गीत और संगीत रचना स्वयं तानसेन ने
की थी। फिल्म में यह गीत कमल बारोट और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में है। आप यह
गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।
राग जोगिया : “हे नटराज गंगाधर शम्भो भोलेनाथ…” : कमल बारोट और महेन्द्र कपूर

संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के 437वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1985 में प्रदर्शित एक
फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक
अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही
उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों
का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 440वें अंक
की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे,
उन्हें वर्ष 2019 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही
पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की
घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।

1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक का स्वर है?
आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com
पर ही शनिवार, 12 अक्तूबर, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको
यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप
पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर
स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम
के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 439 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में
प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या
अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी
में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।
पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता


“स्वरगोष्ठी”
के 435वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा
कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो
प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही
उत्तर है; राग – अहीर भैरव, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – अद्धा तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मन्ना डे

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी।
उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक
बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर
ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी
हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के
सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप
इसमें भाग ले सकते हैं।
अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी
श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की तीसरी कड़ी में आज आपने भैरव थाट के जन्य
राग जोगिया का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को
समझने के लिए आपने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित राजन और साजन मिश्र के युगल
स्वर में इस राग की एक रचना का रसास्वादन किया। राग जोगिया के आधार पर रचे
गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए सुप्रसिद्ध युगल गायक और
गायिका कमल बारोट और महेन्द्र कपूर के स्वर में फिल्म “संगीत सम्राट
तानसेन” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम भैरव थाट के एक अन्य
जन्य राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण
“स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर
साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट https://radioplaybackindia.com अथवा http://139.59.14.115/rpi/wordpress
पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें।
“स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की
प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी
“स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया
हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो
तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका
कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग जोगिया : SWARGOSHTHI – 437 : RAG JOGIYA : 6 अक्तूबर, 2019

Related posts

धडकन जरा रुक गयी है….सुरेश वाडकर के गाये एल पी के इस गीत को सुनकर एक पल को धडकन थम ही जाती है

Sajeev

सुनो कहानी – अपील का जादू – हरिशंकर परसाई

Amit

आता है तेरा नाम मेरे नाम से पहले…"निकाह" और "तलाक" के बीच उलझी एक फ़नकारा

Amit

Leave a Comment