Dil se Singer

राग बिलावल : SWARGOSHTHI – 413 : RAG BILAWAL






स्वरगोष्ठी – 413 में आज

बिलावल थाट के राग – 1 : थाट और राग बिलावल

उस्ताद अब्दुल करीम खाँ से राग बिलावल में खयाल और लता जी से इस राग में पिरोया फिल्मी गीत सुनिए


उस्ताद अब्दुल करीम खाँ
लता मंगेशकर

“रेडियो
प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी नवीन
श्रृंखला “बिलावल थाट के राग” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब
संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने
वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय
संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग
होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5
स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है।
सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट
कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72
मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग
किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ
किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है।
भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव,
पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत
प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट
स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है।
पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ‘राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन
कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत ‘ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का
परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस
समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी
में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली
का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक
ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का
प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने
भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई
सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट
में से दूसरा थाट बिलावल है। इस श्रृंखला में हम बिलावल थाट के रागों पर
क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है
और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में बिलावल थाट के जनक राग “बिलावल”
पर चर्चा करेंगे।
इस राग के शास्त्रीय
स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वर में
एक खयाल रचना का रसास्वादन आप करेंगे। इसके बाद इसी राग पर आधारित एक गीत
फिल्म “क़ैदी नम्बर 911” से लता मंगेशकर और डेज़ी ईरानी के स्वर में प्रस्तुत
किया जाएगा। संगीतकार दत्ताराम ने इस गीत को राग बिलावल के स्वरों का आधार
दिया है।





आज
का थाट और राग बिलावल है। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे,
ग, म, प, ध, नि अर्थात सभी शुद्ध स्वर का प्रयोग होता है। पण्डित विष्णु
नारायण भातखण्डे कृत ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’ (भाग-1) के अनुसार ‘बिलावल’
थाट का आश्रय राग ‘बिलावल’ ही है। इस थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख
राग हैं- अल्हैया बिलावल, बिहाग, देशकार, हेमकल्याण, दुर्गा, शंकरा,
पहाड़ी, भिन्न षडज, हंसध्वनि, माँड़ आदि। राग ‘बिलावल’ में सभी सात शुद्ध
स्वरों का प्रयोग होता है। वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गांधार होता है।
इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल का प्रथम प्रहर होता है। अब हम आपको
राग ‘बिलावल’ पर आधारित एक खयाल रचना सुनवाते हैं। यह रचना एक ऐसे महान
संगीतज्ञ की आवाज़ में है, जो उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु
थे। किराना घराने के इस महान कलासाधक को हम उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के नाम
से जानते हैं। इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान
मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष 1884 में हुआ था। आज
जिसे हम संगीत के किराना घराने के नाम से जानते हैं वह इसी कस्बे के नाम
पर पड़ा था। एक संगीतकार परिवार में जन्में अब्दुल करीम खाँ के पिता का नाम
काले खाँ था। खाँ साहब के तीन भाई क्रमशः अब्दुल लतीफ़ खाँ, अब्दुल मजीद
खाँ और अब्दुल हक़ खाँ थे। सुप्रसिद्ध गायिका रोशन आरा बेग़म सबसे छोटे भाई
अब्दुल हक़ की सुपुत्री थीं। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम
खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही संगीत
की सभाओं गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की
आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे 1899
से 1902 तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। आइए, खाँ साहब की आवाज़ में सुनिए
राग बिलावल की एक दुर्लभ रिकार्डिंग।

राग बिलावल : “कोई तारा नज़र नहीं आवे…’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ

भारतीय
कालगणना सिद्धान्तों के अनुसार नये दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है।
सूर्योदय से लेकर तीन घण्टे तक प्रथम प्रहर माना जाता है। भारत में
सूर्योदय का समय ऋतु और स्थान के अनुसार चार से सात बजे के बीच बदलता रहता
है। संगीत के प्रथम प्रहर का निर्धारण समान्यतः प्रातःकाल 6 से 9 बजे के
बीच किया गया है। रागों का समय निर्धारण कुछ प्रमुख सिद्धान्तों के आधार पर
किया गया है। सामान्यतः प्रातःकाल के रागों में शुद्ध मध्यम वाले राग और
ऋषभ और धैवत कोमल स्वर वाले राग होते हैं। आज हम पहले राग बिलावल का उदाहरण
प्रस्तुत करते हैं। बिलावल राग, बिलावल थाट का आश्रय राग है। यह सभी शुद्ध
स्वरों वाला सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में
सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग बिलावल का वादी स्वर धैवत और संवादी
स्वर गान्धार होता है। अब हम आपके लिए इस राग की छाया लिये एक फिल्मी गीत
प्रस्तुत कर रहे हैं। कहरवा ताल में निबद्ध इस गीत के बोल है; “मीठी मीठी बातों से बचना जरा…”
यह गीत हमने 1959 में प्रदर्शित फिल्म क़ैदी नम्बर 911 से लिया है और इसे
हम सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं।
गीत के अन्तराल में बाल कलाकार डेज़ी ईरानी की आवाज़ भी है। संगीत दत्ताराम
का है। आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति
दीजिए।
राग बिलावल : “मीठी मीठी बातों से बचना जरा…” : लता मंगेशकर : फिल्म – क़ैदी नं. 911

संगीत पहेली


“स्वरगोष्ठी”
के 413वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1959 में प्रदर्शित एक
फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर
आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो
प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा
तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते
हैं। 420वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019
के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के
प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की
जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।


1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर हैं? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 6 अप्रैल, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 415 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता


1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर हैं?
आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com
पर ही शनिवार, 6 अप्रैल, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि
उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली
प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर
स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम
के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 415 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में
प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या
अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी
में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।
अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर नई
श्रृंखला “बिलावल थाट के राग” की पहली कड़ी में आज आपने थाट और राग “बिलावल”
का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के
लिए सुविख्यात गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वर में एक खयाल रचना का
रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित एक गीत फिल्म “क़ैदी नम्बर 911”
से लता मंगेशकर और डेज़ी ईरानी के स्वर में प्रस्तुत किया गया। संगीतकार
दत्ताराम ने इस गीत को राग बिलावल के स्वरों का आधार दिया है। “स्वरगोष्ठी”
पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया
लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के
प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते
रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें
अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव
या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया
राग बिलावल : SWARGOSHTHI – 413 : RAG BILAWAL : 31 मार्च, 2019

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