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राग गौड़ सारंग : SWARGOSHTHI – 406 : RAG GAUD SARANG






स्वरगोष्ठी – 406 में आज

कल्याण थाट के राग – 4 : राग गौड़ सारंग

पन्नालाल घोष से गौड़ सारंग की रचना और फिल्म ‘हमदर्द’से इसी राग में निबद्ध गीत सुनिए


पन्नालाल घोष
लता मंगेशकर और मन्ना डे

“रेडियो
प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
लघु श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” के चौथे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप
सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत
आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय
संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग
होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5
स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है।
सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट
कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72
मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग
किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ
किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है।
भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव,
पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत
प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट
स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है।
पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ‘राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन
कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत ‘ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का
परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस
समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी
में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली
का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक
ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का
प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने
भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई
सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट
में से पहला थाट कल्याण है। इस श्रृंखला में हम कल्याण थाट के दस रागों पर
क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है
और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में कल्याण थाट के एक और जन्य राग
‘गौड़ सारंग’ पर चर्चा करेंगे। इस राग में पहले सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित
पन्नालाल घोष की बाँसुरी पर एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके बाद इसी राग
पर आधारित एक गीत फिल्म “हमदर्द” से लता मंगेशकर और मन्ना डे के स्वर में
प्रस्तुत कर रहे हैं।

इस
श्रृंखला में आप कल्याण थाट के रागों का रसास्वादन कर रहे हैं। आम तौर पर
इन रागों को रात्रि के पहले प्रहर में ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा
है। दोनों मध्यम स्वर स्वर से युक्त आज का राग, ‘गौड़ सारंग’ भी कल्याण थाट
का माना जाता है, किन्तु इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का प्रथम प्रहर
नहीं बल्कि दिन का दूसरा प्रहर होता है। राग गौड़ सारंग में दोनों मध्यम के
अलावा सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इस राग के आरोह और अवरोह में
सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं, इसीलिए इसे सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग
कहा जाता है। परन्तु इसमे आरोह और अवरोह के सभी स्वर वक्र प्रयोग किये जाते
है, इसलिए इसे वक्र सम्पूर्ण जाति का राग माना जाता है। राग का वादी स्वर
गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। प्राचीन ग्रन्थकार राग कामोद, केदार
और हमीर की तरह राग गौड़ सारंग को भी बिलावल थाट का राग मानते थे, क्योंकि
तब इस राग में तीव्र मध्यम स्वर प्रयोग नहीं किया जाता था। परन्तु जब से इन
रागों में दोनों मध्यम का प्रयोग होने लगा, तब से इन्हें कल्याण थाट का
राग माना जाने लगा। राग गौड़ सारंग के आरोह और अवरोह में तीव्र मध्यम स्वर
का अल्प प्रयोग केवल पंचम स्वर के साथ किया जाता है। शुद्ध मध्यम स्वर आरोह
और अवरोह दोनों में किया जाता है। राग की रंजकता को बढ़ाने के लिए कभी-कभी
अवरोह में कोमल निषाद का अल्प प्रयोग राग केदार और हमीर की तरह राग गौड़
सारंग में भी किया जाता है। इस राग का चलन वक्र होता है। किन्तु तानों में
वक्रता कम की जाती है। राग गौड़ सारंग का उदाहरण हम आपको बाँसुरी पर
सुनवाएँगे। बाँसुरी वाद्य को शास्त्रीय मंच पर प्रतिष्ठित कराने वाले
सुविख्यात बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष से अब हम इस राग में निबद्ध एक
मनोहारी रचना सुनवा रहे हैं। 24 जुलाई, 1911 को अविभाजित भारत के बारिसाल,
पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में जन्में पन्नालाल घोष का एक और नाम था,
अमलज्योति घोष। परन्तु अपने संगीतज्ञ जीवन में वह अपने पुकारने के नाम से
ही विख्यात हुए। इनके पिता अक्षय कुमार घोष स्वयं एक संगीतज्ञ थे और सितार
बजाते थे। पन्ना बाबू को बचपन में अपने पिता से ही सितार वादन की शिक्षा
मिली थी। जब वे कुछ बड़े हुए तो उनके हाथ कहीं से एक बाँसुरी मिल गई।
उन्होने बाँसुरी पर अपने सितार पर सीखे हुए तंत्रकारी कौशल की नकल करना
शुरू किया। एक बार एक सन्यासी ने सुन कर बालक पन्नालाल को भविष्य में महान
बाँसुरी वादक बनने का आशीर्वाद दिया। आगे चल कर शास्त्रीय संगीत के मंच पर
उन्होने बाँसुरी वाद्य को प्रतिष्ठा दिलाई। लीजिए, अब आप पण्डित पन्नालाल
घोष से बाँसुरी पर बजाया राग गौड़ सारंग की तीनताल में निबद्ध एक रचना
सुनिए।
राग गौड़ सारंग : तीनताल में निबद्ध एक रचना : पण्डित पन्नालाल घोष

सुप्रसिद्ध
फिल्म संगीतकार अनिल विश्वास ने 1953 की फिल्म ‘हमदर्द’ के लिए एक रागमाला
गीत तैयार किया था, जिसमें चार अन्तरे चार अलग-अलग रागों में स्वरबद्ध थे।
इन्हीं में से एक अन्तरा राग गौड़ सारंग में था। आज हम आपको वही अन्तरा
सुनवा रहे हैं। पन्नालाल घोष और अनिल विश्वास परस्पर मित्र भी थे और
सम्बन्धी भी। हमारे साथी, फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार और
स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी ने एक साक्षात्कार में दोनों कलाकारों के
व्यक्तित्व और कृतित्व को उभारा था। उसी साक्षात्कार का कुछ अंश हम आपके
लिए प्रस्तुत करते हैं।
“पन्नालाल
घोष बाद में अनिल बिस्वास के बहनोई बने, पहले से ही दोनों बहुत अच्छे
मित्र थे। अपने परम मित्र और बहनोई को याद करते हुए विविध भारती के ’संगीत
सरिता’ में अनिल दा ने कुछ इस तरह से उनके बारे में बताया था साक्षात्कार
लेने वाले सितार वादक तुषार भाटिया को – “पन्नालाल घोष बाँसुरी को कॉनसर्ट
के स्तर पर लाने का श्रेय जाता है, अभी तक उन्हीं को पिता माना जाता है।
कुछ हमारी पुरानी बातें हमें याद आ जाती हैं। तुमको मालूम नहीं होगा कि
पन्ना से पहले मैं बाँसुरी बजाता था। तो एक दिन ऐसा हुआ कि माँ तीरथ से
वापस आईं, जब गईं तब मैं बच्चे की आवाज़ में बोलता था, वापस आईं तो मैं मर्द
की आवाज़ में बोलने लगा। तो उन्होंने आकर देखा कि हमारी कुलुंगी के उपर,
क्या कहते हैं उसको, वह बाँसुरी रखी हुई है, उन्होंने सारे उठाके फेंक दिए
और कहा कि यह तेरी आवाज़ को क्या हो गया? मैंने जाकर पन्ना को कहा कि मेरी
बाँसुरी तो गई, अब क्या होगा? उन्होंने कहा कि मैं पकड़ लेता हूँ!” अनिल दा
ने एक आश्चर्य करने वाले तथ्य को भी उजागर किया कि पन्नालाल घोष बाँसुरी से
पहले सितार बजाते थे और उनके पिता (अक्षय घोष) एक बहुत अच्छे सितार वादक
थे। तो इस तरह से बाँसुरी बजाने के शौकीन अनिल बिस्वास बन गए मशहूर
संगीतकार और सितार बजाने के शौकीन पन्नालाल घोष बन गए मशहूर बाँसुरी वादक।
दोनों एक दूसरे से इतना प्यार करते थे कि एक बाद जब अनिल बिस्वास को रेडियो
पर पहली बार गायन रेकॉर्ड करने के लिए रेकॉर्डिंग रूम में भेजा गया तो
बाहर प्रतीक्षा कर रहे पन्नालाल घोष पसीना-पसीना हो गए इस घबराहट में कि
उनका दोस्त कैसा परफ़ॉर्म करेगा! अनिल दा ने उस साक्षात्कार में यह भी बताया
कि पन्ना बाबू का पहला व्यावयासिक वादन अनिल दा के रेकॉर्डिंग में ही
बजाया था, और जब तक वो बम्बई में रहे, अनिल दा के हर फ़िल्म में वो ही
बाँसुरी बजाया करते थे।” 

पार्श्वगायक
मन्ना डे और लता मंगेशकर के गाये, राग गौड़ सारंग के स्वरों में पिरोए
फिल्म हमदर्द के इस गीत में पण्डित पन्नालाल घोष की बाँसुरी के अलावा
पण्डित रामनारायण की सारंगी का भी योगदान था। तीनताल में निबद्ध यह गीत अब
आप सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।
राग गौड़ सारंग : “ऋतु आए ऋतु जाए सखी…” : मन्ना डे और लता मंगेशकर फिल्म – हमदर्द

संगीत पहेली


“स्वरगोष्ठी” के 406ठे
अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1948 में प्रदर्शित एक फिल्म के
रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक
अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही
उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों
का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। पहेली
क्रमांक 410 तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के
पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के
प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की
जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।



1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com
पर ही शनिवार, 16 फरवरी, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि
उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली
प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर
स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम
के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 408 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में
प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या
अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी
में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।
पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’
क्रमांक 404 की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म “नरसी
भगत” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त
करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के
पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – केदार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मन्ना डे, सुधा मल्होत्रा, हेमन्त कुमार और साथी

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी
उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक
बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर
ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी
हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के
सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप
इसमें भाग ले सकते हैं।

अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी
श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” की चौथी कड़ी में आज आपने राग गौड़ सारंग का
परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए
सुविख्यात बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष से इस राग में निबद्ध तीनताल
की एक रचना का रसास्वादन किया। इसी राग को आधार बना कर 1953 में प्रदर्शित
फिल्म “हमदर्द” के एक रागमाला गीत का पहला अन्तरा शामिल किया गया था।
संगीतकार अनिल विश्वास इस अन्तरा को राग गौड़ सारंग में पिरोया था। इस गीत
को लता मंगेशकर और मन्ना डे ने गाया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछले अंकों
के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें
विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन
करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला
के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा
अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग गौड़ सारंग : SWARGOSHTHI – 406 : RAG GAUD SARANG : 10 फरवरी, 2019

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