Dil se Singer

राग केदार : SWARGOSHTHI – 405 : RAG KEDAR







स्वरगोष्ठी – 405 में आज


कल्याण थाट के राग – 3 : राग केदार

शुभा मुद्गल से राग केदार की बन्दिश और फिल्म ‘नरसी भगत’ का इसी राग में पिरोया गीत सुनिए


विदुषी शुभा मुद्गल
हेमन्त कुमार, सुधा मल्होत्रा और मन्ना डे

“रेडियो
प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
लघु श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” के तीसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र,
आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के
अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था
है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का
प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम
5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति
है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट
कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72
मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग
किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ
किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है।
भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव,
पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत
प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट
स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है।
पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ‘राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन
कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत ‘ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का
परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस
समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी
में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली
का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक
ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का
प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने
भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई
सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट
में से पहला थाट कल्याण है। इस श्रृंखला में हम कल्याण थाट के दस रागों पर
क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है
और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में कल्याण थाट के एक और जन्य राग
“केदार” पर चर्चा करेंगे। इस राग में पहले सुविख्यात संगीत-विदुषी शुभा
मुद्गल के स्वर में इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके बाद इसी
राग पर आधारित एक गीत फिल्म “नरसी भगत” से हेमन्त कुमार, सुधा मल्होत्रा
और मन्ना डे के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं।

भक्तिरस की
अभिव्यक्ति के लिए केदार एक समर्थ राग है। कर्नाटक संगीत पद्धति में राग
हमीर कल्याणी, राग केदार के समतुल्य है। औड़व-षाड़व जाति, अर्थात आरोह में
पाँच और अवरोह में छह स्वरों का प्रयोग होने वाला यह राग कल्याण थाट के
अन्तर्गत माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थकार राग केदार को बिलावल थाट के
अन्तर्गत मानते थे, आजकल अधिकतर गुणिजन इसे कल्याण थाट के अन्तर्गत मानते
हैं। इस राग में दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। शुद्ध मध्यम का प्रयोग
आरोह और अवरोह दोनों में तथा तीव्र मध्यम का प्रयोग केवल अवरोह में किया
जाता है। आरोह में ऋषभ और गान्धार स्वर और अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित
होता है। कभी-कभी अवरोह में गान्धार स्वर का अनुलगन कण का प्रयोग कर लिया
जाता है। राग केदार में तीव्र मध्यम आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम
आरोह और अवरोह दोनों में प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी अवरोह में धैवत से
मध्यम को जाते समय मींड़ के साथ दोनों मध्यम एक साथ प्रयोग किया जाता है। यह
प्रयोग रंजकता से परिपूर्ण होता है। राग हमीर के समान राग केदार में
कभी-कभी अवरोह में मधुरता बढ़ाने के लिए कोमल निषाद विवादी स्वर के रूप में
प्रयोग किया जाता है। राग का चलन वक्र होता है, किन्तु तानों में वक्रता का
नियम शिथिल हो जाता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता
है। इस दृष्टि से यह उत्तरांग प्रधान राग होगा, क्योंकि मध्यम स्वर
उत्तरांग का और षडज स्वर पूर्वांग का स्वर होता है। मध्यम स्वर का समावेश
सप्तक के पूर्वांग में नहीं हो सकता। राग का एक नियम यह भी है कि
वादी-संवादी दोनों स्वर सप्तक के एक अंग में नहीं हो सकते। इस दृष्टि से यह
राग उत्तरांग प्रधान तथा दिन के उत्तर अंग में अर्थात रात्रि 12 बजे से
दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाना चाहिए। परन्तु राग केदार प्रचलन में
इसके ठीक विपरीत रात्रि के पहले प्रहर में ही गाया-बजाया जाता है। राग
केदार उपरोक्त नियम का अपवाद है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के पहले प्रहर
में किया जाता है। राग केदार का स्पष्ट अनुभव करने के लिए अब हम आपको इस
राग के स्वरों से अभिसिंचित एक सुमधुर बन्दिश सुनवा रहे हैं। यह खयाल रचना
विख्यात गायिका विदुषी शुभा मुद्गल ने प्रस्तुत किया है। शुभा जी से आप
तीनताल में निबद्ध राग केदार की यह रचना सुनिए।
राग केदार : “काहे सुन्दरवा बोलो नाहिं…” : विदुषी शुभा मुद्गल

पन्द्रहवीं
शताब्दी के वैष्णव भक्तकवि नरसी मेहता के जीवन पर हिन्दी में दो फिल्मों
का निर्माण हुआ था। पहली फिल्म 1940 में बनी थी, जिसमें गायक अभिनेता
विष्णुपन्त पगणीस और अभिनेत्री दुर्गा खोटे ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई थी। इस
फिल्म के संगीत निर्देशक शंकरराव व्यास थे। दूसरी फिल्म 1957 में “नरसी
भगत” बनी थी। राग केदार पर आधारित जो भक्तिगीत हम आज आपको सुनवा रहे हैं वह
इसी फिल्म से है। गीत के बोल हैं- ‘दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ
प्यासी रे…’। इस गीत का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इसके गीतकार
सुप्रसिद्ध कवि और साहित्यकार गोपाल सिंह नेपाली थे। गोपाल सिंह नेपाली का
जितना योगदान साहित्य जगत में रहा है, फिल्मों के गीतकार के रूप में भी
उनका योगदान अतुलनीय रहा है। पाँचवें से सातवें दशक तक वे फिल्मों में सफल
गीतकार के रूप में सक्रिय रहे। उन्होने फिल्मों में लगभग 400 गीतों की रचना
की थी। उन्होने अधिकतर धार्मिक और सामाजिक फिल्मों में गीत लिखे। अपने
फिल्मी गीतों में भी उन्होने साहित्यिक स्तर में कभी समझौता नहीं किया।
1946 में सचिनदेव बर्मन ने फिल्म ‘आठ दिन’, 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘नाग
पंचमी’, 1955 की फिल्म ‘शिवभक्त’, 1959 की फिल्म ‘नई राह’ तथा 1961 में
प्रदर्शित फिल्म ‘जय भवानी’ के गीत गोपाल सिंह नेपाली की बहुआयामी प्रतिभा
के उदाहरण हैं। फिल्म के इन गीतों के बीच 1957 में श्री नेपाली रचित एक ऐसा
गीत फिल्म ‘नरसी भगत’ में शामिल हुआ जिसने लोकप्रियता के सारे कीर्तिमानों
को ध्वस्त कर दिया। संगीतकार रवि द्वारा स्वरबद्ध तथा हेमन्त कुमार, सुधा
मल्होत्रा और मन्ना डे के स्वरों में वह गीत है। इस गीत से जुड़ा एक
उल्लेखनीय प्रसंग श्री नेपाली के निधन के चार दशक बाद सामने आया। ब्रिटिश
फिल्म निर्माता डेनी बोयेल ने ‘स्लमडॉग मिलियोनर’ का निर्माण किया था।
आस्कर पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म में नेपाली जी के गीत का इस्तेमाल किया
गया था, किन्तु फिल्म में इस गीत का श्रेय भक्तकवि सूरदास को दिया गया था।
गोपाल सिंह नेपाली के सुपुत्र नकुल सिंह ने मुम्बई उच्च न्यायालय में फिल्म
के निर्माता के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा भी पेश किया था। कैसा
दुर्भाग्य है कि एक स्वाभिमानी गीतकार को मृत्यु के बाद भी अन्याय का शिकार
होना पड़ा। संगीतकार रवि का स्वरबद्ध किया, हेमन्त कुमार, सुधा मल्होत्रा
और मन्ना डे के साथ समूह स्वर में अब आप यही गीत सुनिए। आप यह गीत सुनिए और
मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।
राग केदार : ‘दर्शन दो घनश्याम नाथ…’ : हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा : फिल्म नरसी भगत

संगीत पहेली


“स्वरगोष्ठी”
के 405वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1953 में प्रदर्शित एक
फिल्म के रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको
दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के
सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों
प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं।
पहेली क्रमांक 410 तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष
2019 के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के
प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की
जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।



1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किन युगल-गायकों के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com
पर ही शनिवार, 9 फरवरी, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि
उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली
प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर
स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम
के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 407 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में
प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या
अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी
में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।
पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’
क्रमांक 403 की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1964 में प्रदर्शित फिल्म
“चित्रलेखा” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक
प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी।
पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 403 की पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया और विजय शर्मा,
(विजय जी का उत्तर हमें COMMENTS के माध्यम से मिला है और उन्होने अपना
पता नहीं लिखा। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की
ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ
कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे
नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के
तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर
ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।

अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी
श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” की तीसरी कड़ी में आज आपने राग केदार का परिचय
प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए
सुविख्यात गायिका विदुषी शुभा मुद्गल के स्वर में इस राग की एक लोकप्रिय
बन्दिश का रसास्वादन किया। इसी राग को आधार बना कर 1957 में प्रदर्शित
फिल्म “नरसी भगत” में एक गीत शामिल किया गया था। गीतकार गोपाल सिंह नेपाली
की रचना को संगीतकार रवि ने राग केदार में पिरोया था। इस गीत को हेमन्त
कुमार, सुधा मल्होत्रा और मन्ना डे ने गाया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी
पिछले अंकों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही
है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक
का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और
श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी
वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो
हमें swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  

राग केदार : SWARGOSHTHI – 405 : RAG KEDAR : 3 फरवरी, 2019

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