Dil se Singer

राग सिन्दूरा : SWARGOSHTHI – 399 : RAG SINDURA






स्वरगोष्ठी – 399 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 14 : राग सिन्दूरा

मुकेश से फिल्म का एक गीत और पण्डित श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर से राग सिन्दूरा सुनिए


डॉ.श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर
मुकेश

‘रेडियो
प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की चौदहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन
मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को
पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ
तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में
बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम
से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग
(पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में
गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग
(उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया
जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन
रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के
पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे
दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक
के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में
होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर
सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार
स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम
या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार
अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद
होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का
क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग
का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार
वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग
में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान
रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए अधिकतर रागों में वादी
स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है।
श्रृंखला की चौदहवीं कड़ी में आज हमने राग सिन्दूरा चुना है। श्रृंखला की इस
कड़ी में आज 1960 में निर्मित और अप्रदर्शित फिल्म “भूल न जाना” से मुकेश
के स्वर में राग सिन्दूरा का स्पर्श करता एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके
साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ और
लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय (तब – मैरिस म्यूजिक कालेज) के
यशस्वी प्रधानाचार्य पण्डित (डॉ.) श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के स्वर में
राग सिन्दूरा की एक दुर्लभ रिकार्डिंग भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं।

राग सिन्दूरा
को काफी थाट का जन्य राग माना जाता है। इसके आरोह में गान्धार और निषाद
स्वर वर्जित किया जाता है और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किया जाता है।
इसलिए इस राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। राग में प्रयोग किया जाने वाला
गान्धार और निषाद स्वर कोमल होता है। वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम
है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन सर्वाधिक उपयुक्त माना
जाता है, किन्तु इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। कुछ विद्वान इस
राग को सैन्धवी कहते हैं। राजस्थान में इसे सिन्धोड़ा भी कहा जाता है। यह
उत्तरांग प्रधान राग है। इस राग के स्वर-समूह श्रृंगार रस, विशेष रूप से
श्रृंगार रस के विरह पक्ष की सार्थक अनुभूति कराते है। राग के शास्त्रीय
पक्ष को समझने के लिए अब हम आपके लिए सुविख्यात संगीतज्ञ और लखनऊ स्थित
भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय (तब – मैरिस म्यूजिक कालेज) के तत्कालीन
यशस्वी
प्रधानाचार्य पण्डित (डॉ.) श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के स्वर में
राग सिन्दूरा की एक दुर्लभ रिकार्डिंग हम प्रस्तुत कर रहे हैं। इस
रिकार्डिंग में उन्होने नोम-तोम का आलाप और फिर तीनताल की एक रचना प्रस्तुत
की है।
राग सिन्दूरा : “विघ्नविनाशन चतुर्भुज एकदन्त लम्बोदर…” : डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर


इसराज
और मयूर वीणा के सुविख्यात वादक, विद्वान संगीतज्ञ और संगीत से रोगोपचार
विषय पर शोधकर्त्ता पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग सिन्दूरा की जाति
औड़व-सम्पूर्ण होती है। इस राग के न्यास का स्वर पंचम होता है और उपन्यास
का स्वर षडज होता है। यह राग होली के दिनों में किसी भी समय गाया-बजाया जा
सकता है। यद्यपि परम्परा यह है कि अन्य दिनों में राग सिन्दूरा रात्रि के
दूसरे प्रहर में गाया-बजाया जाता है। कुछ विद्वानों का मत है कि राग
सिन्दूरा का गायन-वादन किसी भी समय किया जा सकता है। इस राग में ऋषभ,
मध्यम, पंचम और धैवत स्वर मुख्य रूप से प्रयुक्त होते हैं। यदि राग काफी के
आरोह में से कोमल गान्धार और कोमल निषाद स्वर निकाल दिया जाए तो राग
सिन्दूरा का स्वरूप दृष्टिगत होगा। इस राग की प्रकृति चंचल और श्रृंगारिक
होती है। अब हम आपको इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। इस गीत
का चुनाव करने में “फिल्मी गीतों पर रागों का प्रभाव” विषयक सुप्रसिद्ध
शोधकर्त्ता के.एल. पाण्डेय ने हमारा सहयोग किया है। यह गीत फिल्म “भूल न
जाना” का है, जिसका निर्माण वर्ष 1960 में हुआ था, किन्तु फिल्म किन्हीं
कारणों से प्रदर्शित नहीं हो सकी थी। प्रदर्शित न होने के बावजूद फिल्म के
गीतों के रिकार्ड जारी हुए थे और लोकप्रिय भी हुए थे। इन्हीं गीतों में से
एक गीत पार्श्वगायक मुकेश के स्वर में है, जिसके बोल हैं –“गम-ए-दिल किस से कहूँ…”
इसके गीतकार हरिराम आचार्य और संगीतकार दान सिंह हैं। लीजिए अब आप राग
सिन्दूरा (काफी थाट) पर आधारित यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने
की अनुमति दीजिए।

राग सिन्दूरा : “गम-ए-दिल किस से कहूँ…” : मुकेश : फिल्म – भूल न जाना

संगीत पहेली


“स्वरगोष्ठी”
के 399वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित एक
फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको
दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के
सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों
प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं।
वर्ष 2018 की इस अन्तिम पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे,
उन्हें वर्ष 2018 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही
पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं
की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।



1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में मुख्य स्वर किस पार्श्वगायिका के हैं?
आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com
पर ही शनिवार, 29 दिसम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको
यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप
पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर
स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम
के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 401वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में
प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या
अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी
में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।
पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’
की 397वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित
फिल्म “साज और आवाज़” से राग की छाया लिये एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन
में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग
मारवा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और साथी

“स्वरगोष्ठी”
की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नों के सही
उत्तर देकर विजेता बने हैं; फरीदाबाद, हरियाणा की इन्दिरा वार्ष्णेय, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी।
उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक
बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर
ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी
हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के
सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप
इसमें भाग ले सकते हैं।
अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी
श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की चौदहवीं कड़ी में आपने राग
सिन्दूरा का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने सुविख्यात शिक्षक और
संगीतज्ञ गायक डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के स्वर में नोम-तोम का आलाप
और एक बन्दिश का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग पर आधारित संगीतकार
दान सिंह द्वारा संगीतबद्ध अप्रदर्शित फिल्म “भूल न जाना” से एक गीत मुकेश
के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के
प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे।
आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य
लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या
अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग सिन्दूरा : SWARGOSHTHI – 399 : RAG SINDURA : 23 दिसम्बर, 2018

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3 comments

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सम्पादक

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