Dil se Singer

राग मारवा : SWARGOSHTHI – 398 : RAG MARAVA






स्वरगोष्ठी – 398 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 13 : राग मारवा

लता मंगेशकर से फिल्म का एक गीत और उस्ताद राशिद खाँ से राग मारवा का खयाल सुनिए


उस्ताद राशिद खाँ
लता मंगेशकर

‘रेडियो
प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की तेरहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन
मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को
पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ
तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में
बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम
से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग
(पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में
गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग
(उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया
जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन
रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के
पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे
दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक
के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में
होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर
सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार
स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम
या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार
अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद
होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का
क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग
का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार
वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग
में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान
रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए अधिकतर रागों में वादी
स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है।
श्रृंखला की तेरहवीं कड़ी में आज हमने राग मारवा चुना है। श्रृंखला की इस
कड़ी में आज हम लता मंगेशकर के स्वर में 1966 में प्रदर्शित फिल्म “साज और
आवाज़” से राग मारवा पर आधारित एक नृत्य-गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ
ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात गायक उस्ताद राशिद
खाँ के स्वर में राग मारवा में निबद्ध एक खयाल रचना भी हम प्रस्तुत कर रहे
हैं।

राग मारवा इसी नाम से प्रचलित मारवा थाट का आश्रय राग है। मारवा थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒ (कोमल), ग, म॑ (तीव्र), प, ध, नि
अर्थात मारवा थाट में ऋषभ कोमल, मध्यम तीव्र तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग
किये जाते हैं। राग मारवा, ‘मारवा’ थाट का आश्रय राग है, जिसमे ऋषभ कोमल और
मध्यम तीव्र होता है, किन्तु पंचम स्वर वर्जित होता है। यह षाड़व-षाड़व जाति
का राग है। अर्थात आरोह और अवरोह में छः-छः स्वरों का प्रयोग होते हैं।
राग मारवा के आरोह स्वर हैं, सा, रे (कोमल), ग, म॑ (तीव्र) ध, नि, ध, सां तथा अवरोह के स्वर हैं, सां, नि, ध, म॑ (तीव्र), ग, रे (कोमल) सा
होता है। इसका वादी स्वर ऋषभ तथा संवादी स्वर धैवत होता है। इस राग का
गायन-वादन दिन के चौथे प्रहर में उपयुक्त माना जाता है। अब हम आपको राग
मारवा में निबद्ध एक खयाल सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, रामपुर
सहसवान घराने की गायकी के संवाहक उस्ताद राशिद खाँ। राग मारवा उदासी भाव का
राग होता है। द्रुत खयाल की बन्दिश के बोल हैं- ‘गुरु बिन ज्ञान न पावे…’
राग मारवा : “गुरु बिन ज्ञान न पावे…” : उस्ताद राशिद खाँ

भारतीय
संगीत में रागों के गायन-वादन का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों
ने अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। आज हम आपसे दिन के चौथे प्रहर
के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। इस प्रहर के अन्त में ही सायंकालीन
सन्धिप्रकाश रागों का समय आता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार
मध्यम स्वर के प्रकार से सन्धिप्रकाश रागों का निर्धारण भी किया जा सकता
है। सन्धिप्रकाश काल उस समय को कहा जाता है, जब अन्धकार और प्रकाश का मिलन
होता है। यह स्थिति चौबीस घण्टे की अवधि में दो बार उत्पन्न होती है।
प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश और सायंकालीन सन्धिप्रकाश जिसे गोधूलि बेला भी
कहते हैं। प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश रागों में शुद्ध मध्यम स्वर की तथा
सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों में रागों में तीव्र मध्यम की प्रधानता होती
है। भैरव, कलिंगड़ा, जोगिया आदि प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश रागों में शुद्ध
मध्यम और मारवा, श्री, पूरिया आदि सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों में तीव्र
मध्यम स्वर का प्रयोग होता है। दिन के चौथे प्रहर में गाने-बजाने वाले
रागों में तीव्र मध्यम स्वर की प्रधानता होती है। इस प्रहर के एक ऐसे ही
राग मारवा का उदाहरण आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। अन्य रागों की
तुलना में राग मारवा शुष्क और चंचल प्रकृति का राग है। इस राग में विलम्बित
खयाल और मसीतखानी गते कम प्रचलित हैं। इस राग का प्रयोग करते समय तानपूरे
का प्रथम तार मन्द्र निषाद में मिलाया जाता है, क्योंकि इस राग में शुद्ध
मध्यम और पंचम दोनों स्वर वर्जित होते हैं। अब हम आपको राग मारवा पर आधारित
एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। वर्ष 1966 में प्रदर्शित एक फिल्म है- ‘साज और
आवाज़’, जिसके गीतों को नौशाद ने संगीतबद्ध किया था। इस फिल्म का जो गीत
हम आपको सुनवा रहे हैं, उसे लता मंगेशकर व साथियों ने स्वर दिया था। इसके
गीतकार हैं, खुमार बाराबंकवी। फिल्म में यह गीत सायरा बानो और साथियों के
नृत्य पर फिल्माया गया था। आइए, सुनते हैं यह गीत और राग मारवा के स्वरों
को पहचानने का प्रयास करते हैं। आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को
यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।
राग मारवा : “पायलिया बाँवरी बाजे…” : लता मंगेशकर और साथी : फिल्म – साज और आवाज़

संगीत पहेली


“स्वरगोष्ठी”
के 398वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1960 में निर्मित, किन्तु अप्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के
इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम
से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से
केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में
भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक
अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।
इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में
महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।

1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर हैं?
आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com
पर ही शनिवार, 22 दिसम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको
यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप
पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर
स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम
के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 400वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में
प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या
अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी
में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।
पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’
की 396वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित
फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” के एक राग की छाया लिये एक गीत का अंश सुनवा कर
आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही
उत्तर है; राग – वृन्दावनी सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मोहम्मद रफी और आशा भोसले

“स्वरगोष्ठी”
की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नों के सही
उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी
उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक
बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर
ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी
हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के
सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप
इसमें भाग ले सकते हैं।

अपनी बात

मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी
श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की तेरहवीं कड़ी में आपने राग मारवा
का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने सुविख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ
के स्वर में एक बन्दिश का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग पर आधारित
संगीतकार नौशाद द्वारा संगीतबद्ध फिल्म “साज़ और आवाज़” का एक गीत लता
मंगेशकर के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी
“स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया
हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो
तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका
कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग मारवा : SWARGOSHTHI – 398 : RAG MARAVA : 16 दिसम्बर, 2018

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