Dil se Singer

राग सोहनी : SWARGOSHTHI – 382 : RAG SOHANI






स्वरगोष्ठी – 382 में आज

राग से रोगोपचार – 11 : अन्तिम प्रहर का राग सोहनी

गहरी निद्रा का आनन्द दिलाता है यह राग


पण्डित उल्हास  कशालकर
उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ

‘रेडियो
प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की ग्यारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस
श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक
पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत
करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के
प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो
जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों
की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित
है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है।
प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत
में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7
शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है।
इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य
माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात
संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में
नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क
सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम
कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं
में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं
का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों
का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना
और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध
होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गायन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से
रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के
साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन,
तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला
में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे
हैं। श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में आज हम राग मालकौंस के स्वरों से
विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको पण्डित उल्हास कशालकर के
स्वरों में राग सोहनी की दो खयाल रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही
“स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1960 में प्रदर्शित फिल्म “मुगल-ए-आजम”
से इसी राग में ठुमरी अंग में पिरोया एक मधुर गीत उस्ताद बड़े गुलाम अली
खाँ के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।

राग
सोहनी का वादी स्वर शुद्ध धैवत और संवादी स्वर शुद्ध गान्धार है। राग के
गायन और वादन का सटीक समय रात्रि के 3 बजे से 4 बजे के बीच होता है। यह
उत्तरांग प्रधान राग है। विरह या चिन्ताविकृति से ग्रस्त व्यक्ति के पीड़ित
मन के भाव इस राग में दृष्टिगत होते हैं। जब रात्रि में मध्यम रागों का
प्रयोग करने से भी रोगी का आवेग कम नहीं हो रहा हो और उसे निद्रा नहीं
आरही हो, तब राग सोहनी का गायन-वादन या श्रवण से गहरी निद्रा का आनन्द
प्राप्त होता है। तनावविकृति, कुण्ठा, फोबिया, पैनिक डिसआर्डर, हिस्टीरिया,
विषाद तथा अनेक मनोदैहिक विकृतियों का समुचित उपचार जब मध्यम प्रधान रागों
से नहीं हो पाता तब राग सोहनी सेवन सर्वथा उपयोगी होता है। यह राग व्यक्ति
की पीड़ा को कुछ देर के लिए शान्त कर सकता है। यह उपचार एक माह तक निरन्तर
किया जाना चाहिए। अब हम आपको राग सोहनी के यथार्थ शास्त्रीय स्वरूप की
अनुभूति कराने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में
इस राग में निबद्ध दो खयाल रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। मध्यलय खयाल के
बोल हैं – “जियरा रे कल नाहि पावे….” और द्रुतलय खयाल के बोल हैं – “देख
वेख मन ललचाए…”
। यह रिकार्डिंग हमें लखनऊ की सुप्रसिद्ध संगीत संस्था
‘आकर्षण’ के सौजन्य से प्राप्त हुई है। इस संस्था द्वारा 2007 में आयोजित
संगीत सभा में पण्डित उल्हास कशालकर को आमंत्रित किया था। आप राग सोहनी के
खयाल सुनिए।
राग सोहनी : “जियरा रे…” और “देख वेख मन ललचाए…” पण्डित उल्हास कशालकर

राग
सोहनी मारवा थाट का बेहद लोकप्रिय राग है। पण्डित श्रीकुमार मिश्र के
अनुसार राग सोहनी का प्रयोग खयाल और ठुमरी, दोनों प्रकार की गायकी में किया
जाता है। ठुमरी अंग में इस राग का प्रयोग अधिक होता है। इस राग का प्रयोग
दो प्रकार से किया जाता है। पहले प्रकार, औडव-षाड़व जाति के अन्तर्गत आरोह
में ऋषभ और पंचम तथा अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं किया जाता। राग के
दूसरे स्वरूप के आरोह में ऋषभ और अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं होता। राग
सोहनी में उन्हीं स्वरों का प्रयोग होता है, जिनका राग पूरिया और मारवा में
भी किया जाता है। किन्तु इसके प्रभाव और भावाभिव्यक्ति में पर्याप्त अन्तर
हो जाता है। राग सोहनी का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है।
धैवत पीड़ा की अभिव्यक्ति करने में समर्थ होता है। ‘नी सां रे(कोमल) सां’
की स्वर संगति से तीव्र पुकार का वातावरण निर्मित होता है। संवादी गान्धार
कुछ देर के लिए इस उत्तेजना को शान्त कर सुकून देता है। वास्तव में वादी और
संवादी स्वर राग के प्राणतत्त्व होते हैं, जिनसे रागों के भावों का सृजन
होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में राग सोहनी के भाव अधिक स्पष्ट होते
हैं। इस राग में मींड़ एवं गमक को कसे हुए ढंग से मध्यलय में प्रस्तुत करने
से राग का भाव अधिक मुखरित होता है। यह चंचल प्रवृत्ति का राग है। श्रृंगार
के विरह पक्ष की सार्थक अनुभूति कराने में यह राग समर्थ है। राग सोहनी,
कर्नाटक संगीत के राग हंसनन्दी के समतुल्य है। यदि राग हंसनन्दी में शुद्ध
ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो यह ठुमरी अंग के राग सोहनी की अनुभूति कराता है।
तंत्रवाद्य पर राग मारवा, पूरिया और सोहनी का वादन अपेक्षाकृत कम किया
जाता है।

भारतीय
फिल्मों के इतिहास में 1960 में प्रदर्शित, बेहद महत्त्वाकांक्षी फिल्म-
‘मुगल-ए-आजम’, एक भव्य कृति थी। इसके निर्माता-निर्देशक के. आसिफ ने फिल्म
की गुणबत्ता से कोई समझौता नहीं किया था। फिल्म के संगीत के लिए उन्होने
पहले गोविन्द राम और फिर अनिल विश्वास को दायित्व दिया, परन्तु
फिल्म-निर्माण में लगने वाले सम्भावित अधिक समय के कारण बात बनी नहीं।
अन्ततः संगीतकार नौशाद तैयार हुए। नौशाद ने फिल्म में मुगल-सल्तनत के वैभव
को उभारने के लिए तत्कालीन दरबारी संगीत की झलक दिखाने का हर सम्भव प्रयत्न
किया। नौशाद और के. आसिफ ने तय किया कि अकबर के नवरत्न तानसेन की मौजूदगी
का अनुभव भी फिल्म में कराया जाए। नौशाद की दृष्टि विख्यात गायक उस्ताद बड़े
गुलाम अली खाँ पर थी, किन्तु फिल्म में गाने के लिए उन्हें मनाना सरल नहीं
था। पहले तो खाँ साहब ने फिल्म में गाने से साफ मना कर दिया, परन्तु जब
दबाव बढ़ा तो टालने के इरादे से, एक गीत के लिए 25 हजार रुपये की माँग की।
खाँ साहब ने सोचा कि एक गीत के लिए इतनी बड़ी धनराशि देने के लिए निर्माता
तैयार नहीं होंगे। यह उस समय की एक बड़ी धनराशि थी, परन्तु के. आसिफ ने
तत्काल हामी भर दी। नौशाद ने शकील बदायूनी से प्रसंग के अनुकूल गीत लिखने
को कहा। गीत तैयार हो जाने पर नौशाद ने खाँ साहब को गीत सौंप दिया। उस्ताद
बड़े गुलाम अली खाँ ने ठुमरी अंग की गायकी में अधिक प्रयोग किए जाने वाले
राग सोहनी, दीपचन्दी ताल में निबद्ध कर गीत- ‘प्रेम जोगन बन के…’ को
रिकार्ड कराया। रिकार्डिंग से पहले खाँ साहब ने वह दृश्य देखने की इच्छा भी
जताई, जिस पर इस गीत को शामिल करना था। मधुबाला और दिलीप कुमार के उन
प्रसंगों को देख कर उन्होने अपने गायन में कुछ परिवर्तन भी किये। इस प्रकार
भारतीय फिल्म-संगीत-इतिहास में राग सोहनी के स्वरों में ढला एक अनूठा गीत
शामिल हुआ। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में
पिरोया यह गीत नौशाद और के. आसिफ को इतना पसन्द आया कि उन्होने खाँ साहब को
दोबारा 25 हजार रुपये भेंट करते हुए एक और गीत गाने का अनुरोध किया। खाँ
साहब का फिल्म में राग रागेश्री, तीनताल में निबद्ध दूसरा गीत गाया – ‘शुभ
दिन आयो राजदुलारा…’
। ये दोनों गीत फिल्म संगीत के इतिहास के सर्वाधिक
उल्लेखनीय किन्तु सबसे खर्चीले गीत सिद्ध हुए। लीजिए, आप उस्ताद बड़े गुलाम
अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में ढला यह गीत सुनिए और हमें आज के इस
अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।
राग सोहनी : ‘प्रेम जोगन बन के…’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ : फिल्म – मुगल-ए-आजम

संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के 382वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित एक
फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको
दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के
उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों
का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 390वें अंक
की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018
के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के
प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की
जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।



1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में मुख्य स्वर किस पार्श्वगायिका के है?
आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com
पर ही शनिवार, 1 सितम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि
उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली
प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर
स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम
के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 384वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में
प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या
अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी
में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’
की 380वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1952 में प्रदर्शित
फिल्म “बैजू बावरा” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से
किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मालकौंस, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मोहम्मद रफी

“स्वरगोष्ठी”
की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही
उत्तर देकर विजेता बने हैं; मैरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, फिनिक्स, अमेरिका से मुकेश लढ़िया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी
उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक
बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर
ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी
हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के
सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप
इसमें भाग ले सकते हैं।

अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी
महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की दसवीं कड़ी में आपने कुछ
शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग सोहनी का परिचय
प्राप्त किया। आपने पण्डित उल्हास कशालकर द्वारा प्रस्तुत राग सोहनी की दो
रचनाओं का रसास्वादन किया। साथ ही आपने उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वर
में इस राग पर केन्द्रित एक फिल्मी गीत फिल्म “मुगल-ए-आजम” से सुना। हमें
विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन
करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में
यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली
श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग सोहनी : SWARGOSHTHI – 382 : RAG SOHANI : 26 अगस्त, 2018

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