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राग मारूविहाग : SWARGOSHTHI – 376 : RAG MARUVIHAG


स्वरगोष्ठी – 376 में आज


राग से रोगोपचार – 5 : रात्रि के पहले प्रहर का राग मारूविहाग



सामान्य चिन्ता को दूर भगाया जा सकता है, राग मारूविहाग के स्वरों से


मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर
उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ

‘रेडियो
प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस
श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक
पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत
करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के
प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो
जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों
की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित
है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है।
प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत
में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7
शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है।
इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य
माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात
संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में
नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क
सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम
कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं
में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं
का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों
का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना
और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध
होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से
रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के
साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन,
तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला
में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे
हैं। श्रृंखला के पाँचवें अंक में आज हम राग मारूविहाग के स्वरो से
विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको आगरा घराने के सुविख्यात
गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में राग मारूविहाग में निबद्ध खयाल रचना
सुनवाएँगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1963 में
प्रदर्शित फिल्म “सेहरा” से इसी राग में पिरोया एक युगलगीत मोहम्मद रफी और
लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।

राग मारूविहाग
का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद माना जाता है। इस राग के
गायन-वादन का सटीक समय रात्रि में 8 से 9 बजे तक होता है। इस राग में दोनों
मध्यम और शेष स्वर शुद्ध लगते हैं। इस राग के आरोह में नि, सा, ग, म॑, प,
नि, सां और अवरोह में सां, नि, प, ध, प, म॑, ग, रे, सा, स्वरों का प्रयोग
किया जाता है। राग मारूविहाग में यमन और बिहाग रागों की छाया दृष्टिगत होती
है। नि, सा, ग; प, नि, सा; सा, म॑, ग; से बिहाग तथा म॑, प, ध, प; सां, नि,
प, ध, म॑, प, म॑, ग, म॑, रे, सा; में यमन अथवा कल्याण राग की झलक मिलती
है। इस राग का भाव करुण, समर्पित तथा पुकार से युक्त प्रतीत होता है। जब
व्यक्ति दिन भर के परिश्रम के बाद भी निराशा का अनुभव करता है, तब राग
मारवा के स्वर उसकी पीड़ा पर मरहम का कार्य करते हैं। इसके बाद व्यक्ति
प्रभु के सामने समर्पित होकर पुकार-पुकार कर अपनी अपनी करुण आवाज़ में
प्रार्थना करत है। इस मनःस्थिति को राग मारूविहाग के स्वर सहज रूप से
अभिव्यक्त करते हैं। यदि व्यक्ति की चिन्ता और निराशा भाव सामान्य है इस
राग के स्वर इसका निदान कर सकते हैं। यदि व्यक्ति की चिन्ता, विकृति का रूप
ग्रहण कर चुकी हो तो व्यक्ति को इस राग के बाद राग मालकौंस का श्रवण कराना
चाहिए। सामान्य चिन्ता की स्थिति में उपजे विकारों में राग मारूविहाग का
श्रवण सार्थक हो सकता है। उदाहरणस्वरूप अब हम आपको उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के
स्वर में राग मारूविहाग का एक खयाल सुनवा रहे हैं।
राग मारूविहाग : “तोरी मोरी बात…” : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ

राग
मारूबिहाग कल्याण थाट का राग है। इसे सन्धिप्रकाश राग भी कहा जाता है। यह
राग औडव-सम्पूर्ण जाति का है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर
प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता।
राग में तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग मुख्यतः किया जाता है। शेष सभी स्वर
शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद
होता है। राग मारूबिहाग में कल्याण और बिहाग रागों का मिश्रण होता है। इस
राग में तीव्र मध्यम के साथ शुद्ध मध्यम का प्रयोग भी होता है। तीव्र मध्यम
आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है, जबकि शुद्ध मध्यम केवल आरोह में
षडज के साथ प्रयोग होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से
होता है। 1963 में वी. शान्ताराम के निर्देशन में फिल्म ‘सेहरा’ का
प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म के संगीतकार वाराणसी के कुशल शहनाई-वादक रामलाल
ने कई गीत रागों में बाँधे थे। राग मारूबिहाग पर आधारित यह गीत भी इस फिल्म
में शामिल था। गीत में लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी ने युगल-स्वर दिया था।
आप राग मारूविहाग की स्पष्ट छाया इस गीत में मिलती है। आप यह गीत सुनिए और
मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।
राग मारूबिहाग : “तुम तो प्यार हो…” : लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी : फिल्म – सेहरा

संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के 376वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सातवें दशक की एक फिल्म से
रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक
अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर
देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का
उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 380वें अंक की
‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के
तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के
प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की
जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।


1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस युगल-गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com
पर ही शनिवार, 7 जुलाई, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि
उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली
प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर
स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम
के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 378वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में
प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या
अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी
में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा
swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’
की 374वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1952 में प्रदर्शित
फिल्म “बैजू बावरा” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से
किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पूरियाधनाश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – द्रुत एकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – उस्ताद अमीर खाँ

“स्वरगोष्ठी”
की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही
उत्तर देकर विजेता बने हैं; कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश से डॉ. पूर्ण प्रकाश पाण्डेय, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी
उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक
बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर
ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी
हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के
सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप
इसमें भाग ले सकते हैं।

अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी
महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की पाँचवीं कड़ी में आपने कुछ
शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग मारूविहाग का परिचय
प्राप्त किया और इस राग में पिरोया एक खयाल उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में
रसास्वादन किया। इसके साथ ही इसी राग पर आधारित फिल्म “सेहरा” से संगीतकार
रामलाल का संगीतबद्ध एक फिल्मी गीत लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के
युगल-स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी”
के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते
रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें।
हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो
तो हमें
swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग मारूविहाग : SWARGOSHTHI – 376 : RAG MARUVIHAG : 1 जुलाई, 2018

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1 comment

Dr D.G.Pancholi July 10, 2018 at 11:03 pm

Beautiful and enchanting as ever thanks everybody who are involved in this project really unique of its kind thanks again

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