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राग पटदीप : SWARGOSHTHI – 373 : RAG PATADEEP



स्वरगोष्ठी – 373 में आज

राग से रोगोपचार – 2 : तीसरे प्रहर का राग पटदीप

डिप्रेशन और चिन्ताविकृति का नामोनिशान मिटाता है राग पटदीप


उस्ताद राशिद खाँ
लता मंगेशकर

‘रेडियो
प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
नई श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस
श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक
पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत
करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृत की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल
प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती
हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की
शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है।
भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम
का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में
स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7
शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं
स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम
से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत
हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद
के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क
सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम
कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं
में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं
का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों
का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना
और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध
होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से
रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के
साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन,
तनाव, चिन्ता, विकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला
में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे
हैं। श्रृंखला के दूसरे अंक में आज हम राग पटदीप के स्वरो से विभिन्न
रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको राग पटदीप में निबद्ध एक खयाल
सुनवाएँगे, जिसे उस्ताद राशिद खाँ ने प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही
“स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार लता मंगेशकर के स्वर में राग पटदीप पर
आधारित फिल्म “शर्मीली” का एक गीत भी प्रस्तुत करेंगे।

राग पटदीप काफी थाट का राग माना जाता है। इसके आरोह के स्वर हैं; नि, सा (कोमल), म, प, नि, सां और अवरोह के स्वर है; सां, नि, ध, प, म, (कोमल),
रे सा। यदि व्यक्ति प्रयास करते-करते निराश हो गया हो, डिप्रेशन की स्थिति
में आ गया हो और अपने जीवन से निराश हो गया हो तो राग पटदीप के
संवेदनापूर्ण स्वरों से उसे सहानुभूति प्रदान करते हुए प्रयास और कर्म के
क्षेत्र में पूर्ण मनोयोग से संलग्न होने के लिए प्रेरणा देते हैं। राग
पटदीप के उत्तरांग के स्वरों के द्वारा अन्तरात्मा की पुकार बलवती होगी और
यह स्वर निराशा तथा क्लेश को हर लेती है और नवऊर्जा का संचार करेंगे। म, प,
(कोमल), म, प, नि, ध, प, (कोमल), म, प, सां, ध, प, म, प, (कोमल)…
स्वर मथ-मथ कर सभी आन्तरिक गुबार, पीड़ा, निराशा, डिप्रेशन को बाहर का
रास्ता दिखा देंगे। इन विकृतियों के बाहर हो जाने पर व्यक्ति सरल, सात्विक
और संवेदनशील मनःस्थिति के साथ परोपकार और समस्याओं के समाधान के लिए
प्रयासरत होगा। राग पटदीप में कोमल गान्धार स्वर मन को पिघलाता है। मध्यम
और पंचम स्वर मनोबल में वृद्धि करता है। शुद्ध निषाद पुकार का भाव कायम
करता है। अवरोह के स्वरों से सफलता प्राप्ति के पश्चात संवेदनपूर्ण शान्ति
का दर्शन होता है। डिप्रेशन और चिन्ताविकृति से पीड़ित व्यक्ति को राग पटदीप
का श्रवण दिन के 4 से 5 बजे के बीच कराया जाना चाहिए। लगातार 15 दिनों तक
इस प्रयोग को अपनाने से डिप्रेशन और चिन्ताविकृत का नामोनिशान मिट जाएगा।
राग पटदीप : ‘रंग रँगीला बनरा मोरा…’ : उस्ताद राशिद खाँ
राग
पटदीप का सम्बन्ध काफी थाट से माना जाता है। इसके आरोह में ऋषभ और धैवत
वर्जित है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। अतः यह
औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। इसका वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता
है। इसमें केवल गान्धार स्वर कोमल और अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते
हैं। राग पटदीप के गायन-वादन का समय दिन का तीसरा प्रहर माना जाता है। इस
राग को विद्वानों ने काफी थाट का राग मान लिया है, किन्तु यह राग दस थाट
में से किसी भी थाट के अनुकूल नहीं है। क्योंकि वर्णित दस थाट में कोई भी
ऐसा थाट नहीं है, जिसमें केवल गान्धार स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग
किये जाते हों। इस राग की रचना राग भीमपलासी के कोमल निषाद को शुद्ध स्वर
में परिवर्तन करने से हुई है। मध्य सप्तक में बढ़त करते समय बीच-बीच में
शुद्ध निषाद की झलक दिखाना आवश्यक होता है, अन्यथा राग भीमपलासी की छाया
दृष्टिगोचर होने लगती है। अब हम आपको राग पटदीप पर आधारित 1971 में
प्रदर्शित फिल्म “शर्मीली” का एक गीत सुनवाते हैं। लोकतत्त्वों से मिश्रित
और गीतकार गोपालदास नीरज रचित इस गीत को लता मंगेशकर ने स्वर दिया है।
संगीत रचना सचिनदेव बर्मन की है। यह गीत रूपकताल में निबद्ध है। आप यह गीत
सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।
राग पटदीप : “मेघा छाए आधी रात बैरन बन गई…” : लता मंगेशकर : फिल्म – शर्मीली

संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के 373वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको आठवें दशक की एक फिल्म से
रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक
अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर
देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का
उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 380वें अंक की
‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के
तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के
प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की
जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।

1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com
पर ही शनिवार, 16 जून, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि
उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली
प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर
स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम
के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 375वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में
प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या
अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी
में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा
swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’
की 371वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1956 में प्रदर्शित
फिल्म “जागते रहो’ के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी
दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – भैरव, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी”
की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही
उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।
प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस
पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह
आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो।
यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते
हैं।

अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी
महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की दूसरी कड़ी में आपने कुछ
शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग पटदीप का परिचय
प्राप्त किया और इस राग में निबद्ध एक खयाल रचना का उस्ताद राशिद खाँ के
स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही इसी राग पर आधारित फिल्म “शर्मीली”
का एक फिल्मी गीत कोकिलकण्ठी पार्श्वगायिका लता मंगेशकर के स्वर में सुना।
हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का
अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। 

“स्वरगोष्ठी” के
सभी संगीत-प्रेमियों के लिए आज के अंक में हम एक शुभ सूचना देना चाहते
हैं। कई दशक पूर्व उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी ने सुविख्यात संगीतज्ञ
पण्डित राधावल्लभ चतुर्वेदी की पुस्तक “ऊँची अटरिया रंग भरी” का प्रकाशन
किया था। इस अनूठे ग्रन्थ में उत्तर प्रदेश के लोकगीतों का संकलन उनकी
स्वरलिपि के साथ किया गया था। समय के साथ ही यह ग्रन्थ संगीत-प्रेमियों के
लिए अप्राप्य हो गया है। पिछले दिनों पण्डित राधावल्लभ चतुर्वेदी की
सुपुत्री सुश्री नीलम चतुर्वेदी ने सूचित किया है कि अब इस ग्रन्थ का
पुनर्प्रकाशन केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी द्वारा किया जा रहा है। शीघ्र ही
यह ग्रन्थ संगीत-प्रेमियों के लिए सुलभ होगा। 

आज के अंक के बारे में यदि
आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला
के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें 
swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  

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