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राग तोड़ी और मुल्तानी : SWARGOSHTHI – 370 : RAG TODI & MULTANI




स्वरगोष्ठी – 370 में आज


दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 9 : तोड़ी थाट



विदुषी मालिनी राजुरकर से राग तोड़ी में खयाल और उस्ताद अमीर खाँ से फिल्मी गीत सुनिए


विदुषी मालिनी राजुरकर
उस्ताद अमीर खाँ

‘रेडियो
प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन
मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के
अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था
है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का
प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम
5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति
है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट
कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72
मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग
किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ
किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है।
भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव,
पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत
प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट
स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है।
पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ‘राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन
कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत ‘ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का
परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस
समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी
में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली
का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक
ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का
प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने
भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई
सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात
भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से
नौवाँ थाट तोड़ी है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे तोड़ी थाट पर चर्चा
करेंगे और इस थाट के आश्रय राग तोड़ी में निबद्ध खयाल रचना विदुषी मालिनी
राजुरकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। साथ ही तोड़ी थाट के अन्तर्गत
वर्गीकृत जन्य राग मुल्तानी के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण
उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।

आज
बारी है थाट और राग ‘तोड़ी’ से परिचय प्राप्त करने की। श्रृंखला की अभी तक
की कड़ियों में हमने उत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित थाट प्रणाली को
रेखांकित करने का प्रयास किया है। आज की कड़ी में हम दक्षिण भारतीय संगीत
में प्रचलित प्राचीन थाट व्यवस्था पर चर्चा करेंगे। दक्षिण भारतीय संगीत
पद्यति के विद्वान पण्डित व्यंकटमखी ने थाटों की संख्या निश्चित करने के
लिए गणित को आधार बनाया और पूर्णरूप से गणना कर थाटों की कुल संख्या 72
निर्धारित की। इनमें से उन्होने 19 व्यावहारिक थाटों का चयन किया।
व्यंकटमखी की थाट संख्या को दक्षिण भारतीय संगीतज्ञों ने तो अपनाया, किन्तु
उत्तर भारत के संगीत पर इसका विशेष प्रभाव नहीं हुआ। उत्तर भारतीय संगीत
के विद्वान पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने रागों के वर्गीकरण के लिए 10
थाट प्रणाली को अपनाया और रागों का वर्गीकरण किया, जो आज तक प्रचलित है।
थाट का उद्देश्य मात्र राग के शुद्ध और विकृत स्वरों को चिह्नित करना है।
चूँकि एक थाट के गठन के लिए सप्तक के सातों स्वरों का होना आवश्यक है, अतः
यह भी आवश्यक है कि थाट सम्पूर्ण हो।
आइए
आज आपका परिचय ‘तोड़ी’ थाट से कराते हैं। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर
हैं- सा, रे॒, ग॒, म॑, प, ध॒, नि अर्थात ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल,
मध्यम तीव्र तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते है। इस थाट का आश्रय राग
‘तोड़ी’ ही कहलाता है। राग ‘तोड़ी’ एक सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसके आरोह
में- सा, रे॒, ग॒, म॑प, ध॒, नि, सां स्वरों का तथा अवरोह में- सां, नि, ध॒,
प, म॑, ग॒, रे॒, सा स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर धैवत
और संवादी स्वर गान्धार होता है तथा राग के गायन-वादन का समय दिन का दूसरा
प्रहर माना जाता है। अब हम आपको राग तोड़ी की एक मोहक बन्दिश का रसास्वादन
कराते हैं। द्रुत तीनताल में प्रस्तुत इस खयाल रचना के बोल हैं- ‘कान्ह करत मोसे रार ऐ री माई…’
इसे प्रस्तुत कर रहीं हैं, ग्वालियर परम्परा में देश की जानी-मानी गायिका
विदुषी मालिनी राजुरकर। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के
अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो
विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से
स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक
गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में
निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर
और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत
की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर
लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से
नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के
गायन में भी कुशल हैं। लीजिए, मालिनी जी के स्वरों में सुनिए राग तोड़ी की
यह बन्दिश।
राग तोड़ी : ‘कान्ह करत मोसे रार…’ : विदुषी मालिनी राजुरकर

तोड़ी
थाट के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं, मधुवन्ती, मुल्तानी, कोकिलापंचमी,
गुर्जरीतोड़ी, हेमवन्ती, रुद्रमंजरी, श्रीवन्ती आदि। राग मुल्तानी, तोड़ी थाट
का राग है। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। अर्थात आरोह में पाँच और
अवरोह में सात स्वर का प्रयोग किया जाता है। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों
का प्रयोग नहीं किया जाता। इस राग में ऋषभ, गान्धार तथा धैवत स्वर कोमल और
मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग किया जाता है। आज हम आपको राग मुल्तानी में निबद्ध
एक फिल्मी गीत सुनवाते है। वर्ष 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ के
संगीतकार नौशाद ने सुविख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ से यह गीत
गवाया था। इससे पूर्व वर्ष 1952 में नौशाद ने उस्ताद अमीर खाँ से फिल्म
‘बैजू बावरा’ में दो गीत गवा कर अपने शास्त्रीय संगीत के प्रति अनुराग को
सिद्ध किया था। उस्ताद अमीर खाँ जैसे दिग्गज गवैये नौशाद की प्रतिभा के ऐसे
कायल हुए कि आगे चल कर जब भी उन्हें नौशाद ने बुलाया, अपनी सहमति और सहयोग
प्रदान किया। रागदारी संगीत के प्रति नौशाद की ऐसी अगाध श्रद्धा थी कि इस
विषय पर प्रायः फिल्म के निर्माता-निर्देशक के साथ उनकी मीठी नोकझोक भी हो
जाती थी। एक साक्षात्कार में नौशाद ने फ़िल्मकार ए.आर. कारदार के हवाले से
जिक्र किया भी था कि फिल्म में राग आधारित गीत रखने के सवाल पर कैसे उन्हें
चुनौती मिली थी। उस्ताद अमीर खाँ को नौशाद साहब ने दोबारा याद किया, 1954
में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ के लिए। इस फिल्म के अन्य गीतों के लिए मोहम्मद
रफी, लता मंगेशकर और हेमन्त कुमार थे, किन्तु उस्ताद अमीर खाँ से उन्होने
राग मुल्तानी के स्वरों में मीरा का एक पद- ‘दया कर हे गिरिधर गोपाल…’
गवाया। यह राग दिन के चौथे प्रहर के परिवेश को यथार्थ रूप से अनुभूति कराता
है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति
दीजिए।
राग मुल्तानी : ‘दया कर हे गिरिधर गोपाल…’ : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म – शबाब

संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के 370वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1985 में प्रदर्शित एक फिल्म
से रागबद्ध हिन्दी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर
आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो
प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा
तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते
हैं। इस अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे,
उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही
पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की
घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।

1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस विद्वान गायक के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com
पर ही शनिवार, 26 मई, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि
उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली
प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो
सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद
किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ
‘स्वरगोष्ठी’ के 372वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत
गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी
अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत
करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा
swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 368वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म “झनक झनक पायल बाजे” के एक रागाधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो
प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – अड़ाना, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर
है; स्वर – उस्ताद अमीर खाँ और साथी।

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता
में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं;
मुम्बई, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ.
किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, हैदराबाद से डी. हरिणा
माधवी और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध
है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त
सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस
पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह
आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो।
यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते
हैं। 

अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी
श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की नौवीं कड़ी में आपने तोड़ी थाट का
परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग तोड़ी में पिरोया एक खयाल
सुविख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में रसास्वादन किया। इसके
साथ ही तोड़ी थाट के जन्य राग मुल्तानी में निबद्ध फिल्म “शबाब” का एक
फिल्मी गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे
अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी
प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो
तो हमें अवश्य लिखें। हमारी अगली श्रृंखला में आपको विभिन्न रागों से
रोगों के उपचार का तरीका बताया जाएगा। हमारी नई श्रृंखला अथवा आगामी
श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें 
swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग तोड़ी और मुल्तानी : SWARGOSHTHI – 370 : RAG TODI & MULTANI : 20 मई, 201

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