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राग मालकौंस : SWARGOSHTHI – 355 : RAG MALKAUNS



स्वरगोष्ठी – 355 में आज

पाँच स्वर के राग – 3 : “मन तड़पत हरिदर्शन को आज…”

राजन-साजन मिश्र से श्रृंगाररस की बन्दिश और मुहम्मद रफी से भक्तिरस का गीत सुनिए


नौशाद, मुहम्मद रफी और शकील बदायूनी
पण्डित राजन और साजन मिश्र

“रेडियो
प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब
संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे
भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनमें केवल पाँच स्वरों का
प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन
परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित
होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर,
चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों
को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ,
गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल
स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के
शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है।
इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान
होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण
होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर
की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है,
उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और
जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है।
रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों
की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम
आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच
स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है।
श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग मालकौंस का
परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात युगल गायक राजन और साजन
मिश्र के स्वरों में राग मालकौंस की एक बन्दिश के माध्यम से राग के
शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। अनेक फिल्मी गीतों में राग मालकौंस
का प्रयोग किया गया है। राग मालकौंस में ही निबद्ध 1952 में प्रदर्शित
फिल्म “बैजू बावरा” से एक विख्यात गीत –“मन तड़पत हरिदर्शन को आज…”, मुहम्मद
रफी के स्वर में सुनवा रहे हैं।

पाँच स्वर
के राग अर्थात औड़व-औड़व जाति के रागों की श्रृंखला के अन्तर्गत आज की कड़ी
में हम बेहद लोकप्रिय राग मालकौंस की चर्चा कर रहे हैं। राग मालकौंस भैरवी
थाट का एक लोकप्रिय राग है। पहले आपको सुनवाते है, राग मालकौंस का एक
आकर्षक फिल्मी रूपान्तरण। संगीतकार नौशाद ने फिल्म ‘बैजू बावरा’ के लिए एक
कालजयी भक्तिगीत रचा था। नौशाद की भक्तिरस प्रधान गीतों की रचनात्मक कुशलता
के बारे में फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग, अपनी पुस्तक ‘धुनों की
यात्रा’ में लिखते हैं- “नौशाद के संगीत के दो पहलू रहे हैं- एक तो
शास्त्रीय आधार का सरस, सुगम्य रूपान्तरित लोकसंगीत और दूसरा शास्त्रीय
आधारित आभिजात्य संगीत जिसमें कभी मुगलिया या लखनऊ की नवाबी संस्कृति की
खूबसूरत भंगिमाएँ रहती थीं, तो कभी ईश्वर की आराधना करता उदात्त
भक्ति-संगीत। साहित्य में भक्ति-साहित्य भले ही लोकरंजक और लोकसंस्कृति से
प्रेरित रहा हो, पर नौशाद के भक्ति-गीतों में शुद्ध, गम्भीर शास्त्रीय सुर
ही लगे हैं। नौशाद के संगीत की मूल प्रवृत्ति भारतीय शास्त्रीय
संगीत-परम्परा की तरह ही कलावादी रही है।” फिल्म ‘बैजू बावरा’ के भक्तिपरक
गीत यदि नौशाद को शिखर तक ले जाते हैं, वहीं गायक मुहम्मद रफी को उनके
भावपूर्ण गायन के लिए प्रथम श्रेणी के गायकों में शामिल कराते हैं।
प्रस्तुत है, गीतकार शकील बदायूनी, संगीतकार नौशाद और गायक मुहम्मद रफी
द्वारा सृजित आस्था, समर्पण और पुकार से युक्त फिल्म ‘बैजू बावरा’ का यह
गीत।

राग मालकौंस : ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज…’ : मुहम्मद रफी : फिल्म – बैजू बावरा




थाट भैरवी, वादी म सा, रखिए रे प वर्ज्य,
तृतीय प्रहर निशि गाइए, मालकौंस का अर्ज।

राग
मालकौंस की गणना भैरवी थाट के अन्तर्गत की जाती है। इसमें ऋषभ और पंचम
स्वर वर्जित वर्जित होता है। अतः इसकी जाति औड़व-औड़व होती है। राग का वादी
स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मालकौंस में गान्धार, धैवत और
निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। इस राग का गायन-वादन रात्रि के
तीसरे प्रहर में सर्वाधिक अनुकूल होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में
समान रूप से किया जाता है। सुविख्यात इसराज और मयूरवीणा वादक पण्डित
श्रीकुमार मिश्र से इस राग पर हमारी विस्तृत चर्चा हुई। उन्होने बताया कि
राग भैरवी के कोमल ऋषभ और पंचम को हटा देने पर बचे हुए भैरवी के स्वरों-
कोमल गान्धार, मध्यम, कोमल धैवत और कोमल निषाद में मध्य व तार सप्तक के षडज
का संयोग कर देने से जिस राग का रूप निर्मित होता है वह मालकौंस है। औड़व
जाति के इस इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग
मालकौंस सागर की भाँति है। विविध नदियों का मानों इसमें समागम है। इसके
मन्द्र धैवत को षडज मान कर यदि मालकौंस के स्वरों का प्रयोग किया जाए तो
राग भूपाली का दर्शन होने लगता है। मन्द्र निषाद को जब षडज मान कर मालकौंस
के स्वरों का प्रयोग किया जाता है तब राग मेघ मल्हार का आभास होने लगता है।
इसी प्रकार गान्धार स्वर को यदि षडज मान कर प्रयोग किया जाए तो राग दुर्गा
और मध्यम को षडज मान कर चलने पर राग धानी की झलक मिलने लगती है। राग
भूपाली का आत्मनिवेदन, मेघ मल्हार का नैसर्गिक गाम्भीर्य, राग दुर्गा में
व्याप्त भक्तिभाव की विनयपूर्ण अभिव्यक्ति और राग धानी का वैचित्र्य भाव,
इन सभी के समागम से राग मालकौंस का गम्भीर चिन्तनशील स्वरूप कायम होता है।
राग मालकौंस में षडज स्वर आधार है। कोमल गान्धार स्वर से पुकार का भाव और
मध्यम स्वर पर ठहराव से मन व्यापक चिन्तन की दिशा में अग्रसर होने लगता है।
राग मालकौंस में कोमल ऋषभ और पंचम स्वर के न होने से मध्यम के साथ शेष
तीनों कोमल स्वर गान्धार, धैवत और निषाद के मिलाप से गाम्भीर्य कायम होता
है। कोमल ऋषभ के विषाद भाव और पंचम की जागृति दोनों ही दार्शनिक गाम्भीर्य
निर्मित करने में व्यवधान उत्पन्न न करें, इसीलिए इनका प्रयोग निषिद्ध है।
राग मालकौंस में प्रयुक्त स्वरों को निरन्तर दुहराने से राग भूपाली, मेघ
मल्हार, दुर्गा और धानी झलक जाएँगे। इसलिए राग मालकौंस को बरतना सरल नहीं
होता। मध्यम के साथ मिल कर स्वरात्मक व सहयोगी क्रियाकलाप होंगे तो मालकौंस
का स्वरूप कायम रहेगा। अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, राग मालकौंस के
शास्त्रीय स्वरूप को प्रदर्शित करने के लिए इस राग की एक बन्दिश। अब आप
सुनिए, सुविख्यात युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वर में द्रुत
तीनताल में निबद्ध एक खयाल रचना। आप इस रचना का आस्वादन करें और मुझे आज के
इस अंक को यहीं विराम देने की की अनुमति दें।
राग मालकौंस : “आज मोरे घर आइल बलमा…’ : पण्डित राजन और साजन मिश्र

संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के 355वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का
अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से
किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा
दो प्रश्न का उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं।
360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे,
उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही
पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की
घोषणा के साथ ही उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।


1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायक और गायिका की युगल आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 10 फरवरी, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर,
प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के
357वें
अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा
कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच
बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ
के नीचे दिये गए
COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’
की 353वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा
रोया” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम
दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग
तिलंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

वर्ष 2018 की पहेली क्रमांक 353 का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी
उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से
हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले
सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर
ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग
ले सकते हैं।

अपनी बात
मित्रों,
आज हम आपको एक चिन्ताजनक सूचना देना चाहते हैं। “स्वरगोष्ठी” की पहेली
प्रतियोगिता की पिछले कई वर्षों की महाविजेता और हमारी नियमित पाठक व
श्रोता, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की श्रीमती विजया राजकोटिया अवस्थ हैं।
आगामी 12 फरवरी, 2018 को अमेरिका में उनकी स्पाइनल सर्जरी होने वाली है।
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक और सम्पादक मण्डल के सभी सदस्य उनके इस
कष्ट से उदास हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि विजया जी को शीघ्र
स्वस्थ करें। ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” के इस
अंक में आपने राग मालकौंस का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के
शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए हमने पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वर में
राग मालकौंस के एक द्रुत खयाल का रसास्वादन कराया। राग मालकौंस के स्वरों
का उपयोग करते हुए कई फिल्मी गीत भी रचे गए हैं। आज आपने फिल्म “बैजू
बावरा” से राग मालकौंस के स्वरों में पिरोए एक चर्चित गीत मुहम्मद रफी के
स्वर में सुना। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा
करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए
यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें
swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग मालकौंस : SWARGOSHTHI – 355 : RAG MALKAUNS : 4 Feb., 2018

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