Dil se Singer

राग तिलंग : SWARGOSHTHI – 354 : RAG TILANG



स्वरगोष्ठी – 354 में आज

पाँच स्वर के राग – 2 : “लगन तोसे लागी बलमा…”

इन्दुबाला देवी से तिलंग की एक प्राचीन ठुमरी और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए


मदन मोहन
इन्दुबाला देवी

‘रेडियो
प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी नई
श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब
संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे
भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनमें केवल पाँच स्वरों का
प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन
परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित
होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर,
चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों
को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ,
गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल
स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के
शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है।
इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान
होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण
होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर
की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है,
उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और
जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है।
रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों
की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम
आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच
स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है।
श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग तिलंग का
परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही पिछली शताब्दी की मशहूर गायिका
इन्दुबाला देवी के स्वर में एक पुरानी ठुमरी रिकार्डिंग के माध्यम से राग
के उपशास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराने का प्रयास करेंगे। अनेक फिल्मी गीतों
में राग तिलंग का प्रयोग किया गया है। इस राग पर आधारित 1957 में
प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” से एक गीत –“लगन तोसे लागी बलमा…”, लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।

राग तिलंग की रचना खमाज थाट से मानी गई है। खमाज थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि॒
इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का
आश्रय राग ‘खमाज’ कहलाता है। खमाज थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य
प्रमुख राग है- झिंझोटी, तिलंग, रागेश्वरी, गारा, देस, जैजैवन्ती, तिलक
कामोद आदि। खमाज थाट इन्हीं रागों में से एक राग तिलंग में आज हम आपको दो
रचनाओं का रसास्वादन करा रहे हैं। पहले आप सुनिए, राग तिलंग पर आधारित एक
फिल्म संगीत। यह गीत हमने 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” से
लिया है। अनीता गुहा, अमिता, अनूप कुमार, शुभा खोटे और दलजीत अभिनीत इस
फिल्म में इस गीत के साथ ही कई गीत राग आधारित थे। फिल्म का संगीत
सुप्रसिद्ध संगीतकार मदन मोहन ने तैयार किया है। गीतकार हैं, राजेन्द्र
कृष्ण। राग तिलंग के अनुकूल स्वरों में लता मंगेशकर ने गीत –“लगन तोसे लागी
बलमा…” का अत्यन्त मधुर गायन किया है। लीजिए पहले आप राग तिलंग पर
आधारित यह गीत सुनिए।
राग तिलंग : “लगन तोसे लागी बलमा…” : लता मंगेशकर : फिल्म – देख कबीरा रोया

द्वितीय प्रहर निशि रे ध वर्जित, गावत तिलंग राग,
ग नी स्वर संवाद करत, रखियत खमाज थाट।
राग
तिलंग को खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत
वर्जित होता है। राग की जाति औड़व-औड़व होती है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह
में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध निषाद, किन्तु
अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और
संवादी स्वर निषाद होता है। राग तिलंग के गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि
का दूसरा प्रहर माना जाता है। यद्यपि राग तिलंग में ऋषभ स्वर वर्जित होता
है, फिर भी राग के सौन्दर्य-वृद्धि के लिए कभी-कभी तार सप्तक के अवरोह में
ऋषभ स्वर का प्रयोग कर लिया जाता है। यह श्रृंगार रस प्रधान, चंचल प्रकृति
का राग होता है, अतः इसमें छोटा खयाल, ठुमरी और सुगम संगीत की रचनाएँ अधिक
मिलती हैं। यह पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग तिलंग से मिलता-जुलता राग
खमाज होता है। दोनों रागों में भेद को स्पष्ट करने के लिए कुछ तथ्यों को
जानना आवश्यक है। दोनों रागों में पर्याप्त समानता है, किन्तु एक अन्तर के
कारण राग तिलंग और खमाज में अन्तर आ जाता है। दोनों राग खमाज थाट से
सम्बद्ध होता है और दोनों के आरोह में शुद्ध निषाद तथा अवरोह में कोमल
निषाद का प्रयोग किया जाता है। दोनों रागों में वादी और संवादी क्रमशः
गान्धार और निषाद स्वर होते हैं और दोनों पूर्वांग प्रधान राग होते हैं।
परन्तु राग खमाज के अवरोह में शुद्ध ऋषभ स्वर का भी प्रयोग किया जाता है,
जिस कारण राग की जाति बदल जाती है। अर्थात राग तिलंग औडव-औडव जाति का राग
है, जबकि राग खमाज औडव-षाड़व का राग है। हम यह भी कह सकते हैं कि राग खमाज
अपने थाट का आश्रय राग है, जबकि राग तिलंग जन्य राग होता है। राग तिलंग में
अधिकतर ठुमरी गायी जाती है। एक शताब्दी से भी पहले व्यावसायिक गायिकाओं
द्वारा गायी गई ठुमरियों का स्वरूप कैसा होता था, इसका अनुभव कराने के लिए
अब हम आपको पिछली शताब्दी की गायिका इन्दुबाला देवी के स्वर में राग तिलंग
की एक ठुमरी सुनवाते है। भारत में ग्रामोफोन रिकार्ड के निर्माण का आरम्भ
1902 से हुआ था। सबसे पहले ग्रामोफोन रिकार्ड में उस समय की मशहूर गायिका
गौहर जान की आवाज़ थी। संगीत की रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर में ग्रामोफोन
कम्पनी को बड़ी कठिनाई से गायिकाएँ उपलब्ध हो पातीं थीं। प्रारम्भ में
व्यावसायिक गायिकाएँ ठुमरी, दादरा, कजरी, होरी, चैती आदि रिकार्ड कराती
थीं। 1902 से गौहर जान ने जो सिलसिला आरम्भ किया था, 1910 तक लगभग 500
व्यावसायिक गायिकाओं ने अपनी आवाज़ रिकार्ड कराई। इन्हीं में एक गायिका
इन्दुबाला देवी भी थीं। आइए अब हम इन्हीं की आवाज़ में राग तिलंग की ठुमरी
सुनते हैं। ठुमरी के बोल हैं, –“तुम काहे को नेहा लगाए…”। आप यह ठुमरी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।
राग तिलंग : “तुम काहे को नेहा लगाए…” : ठुमरी : इन्दुबाला देवी

संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के 354वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक सुविख्यात और रागबद्ध
फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित
तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से
केवल एक अथवा दो प्रश्न का उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग
ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक
अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।
इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में
महाविजेताओं की घोषणा के साथ ही उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।


1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुपरिचित पार्श्वगायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 3 फरवरी, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर,
प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 356वें अंक में
प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के
बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना
चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे
दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’
की 352वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म “भाभी की
चूड़ियाँ” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से
कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है;
राग – भूपाली, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

वर्ष 2018 की इस प्रथम पहेली क्रमांक 352 का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल
पहेली के इन दोनों विजेताओं को “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” की ओर से हार्दिक
बधाई। हमारे पिछले कई महाविजेताओं ने इस पहेली में भाग नहीं लिया। ऐसा
प्रतीत होता है कि हमारे नियमित महाविजेता इस अंक में विराम देकर अन्य
प्रतिभागियों से आगे निकालना चाहते हैं। इस पहेली प्रतियोगिता हमारे नये
प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के
तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी
ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।

अपनी बात
मित्रो, 
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी नई
श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” के इस दूसरे अंक में आपने राग तिलंग का परिचय
प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के उपशास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए
रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर की सुप्रसिद्ध गायिका इन्दुबाला देवी स्वर
में राग तिलंग की एक ठुमरी का रसास्वादन कराया। राग तिलंग के स्वरों का
उपयोग करते हुए अनेक फिल्मी गीत भी रचे गए हैं। आज आपने फिल्म “देख कबीरा
रोया” से राग तिलंग पर आधारित एक गीत सुविख्यात गायिका लता मंगेशकर के स्वर
में सुना। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे।
इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका
कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें
swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के
इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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