Dil se Singer

ठुमरी तिलंग : SWARGOSHTHI – 350 : THUMARI TILANG



स्वरगोष्ठी – 350 में आज

फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व – 7 : समापन कड़ी में तिलंग की ठुमरी

पाश्चात्य संगीत के भराव के साथ ठुमरी – “सजन संग काहे नेहा लगाए…”


लता मंगेशकर

‘रेडियो
प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी
श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की इस सातवीं और समापन कड़ी में
मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।
पिछली श्रृंखला में हमने आपके लिए फिल्मों में पारम्परिक ठुमरी के साथ-साथ
उसके फिल्मी प्रयोग को भी रेखांकित किया था। इस श्रृंखला में भी हमने आपसे
केवल फिल्मी ठुमरियों पर ही चर्चा की है, किन्तु ये ठुमरियाँ पारम्परिक रही
हों, यह आवश्यक नहीं हैं। इन ठुमरी गीतों को फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकारों
ने लिखा है और संगीतकारों ने इन्हें विभिन्न रागों में बाँध कर ठुमरी
गायकी के तत्वों से अभिसिंचित किया है। हमारी इस श्रृंखला “फिल्मी गीतों
में ठुमरी के तत्व” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला
का विषय फिल्मों में शामिल किये गए ऐसे गीत हैं जिनमे राग, भाव और रस की
दृष्टि से उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी के तत्वों का उपयोग हुआ है। सवाक
फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित
पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग
आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने
अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता
की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की
फिल्मों में अनेकानेक ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ
ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी
अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों
का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे पाँचवें और छठे दशक की ऐसी
ही कुछ गैर-पारम्परिक चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात कर रहे हैं।
आज हम आपके लिए जो ठुमरी गीत प्रस्तुत करने जा रहें हैं, वह एक पारम्परिक
ठुमरी को आधार बना कर रची गई है। आज की ठुमरी में हारमोनियम की ही नहीं
बल्कि अन्य कई पाश्चात्य वाद्यों की भी संगति की गई है। राज कपूर, माला
सिन्हा, मुबारक और लीला चिटनिस द्वारा अभिनीत फिल्म “मैं नशे में हूँ” के
एक प्रसंग में संगीतकार शंकर जयकिशन ने ठुमरी अंग में इस गीत का संगीत
संयोजन किया है। लता मंगेशकर के गाये इस ठुमरी गीत का मुखड़ा तो एक
पारम्परिक ठुमरी -“सजन संग काहे नेहा लगाए…” का है लेकिन दोनों अन्तरे
गीतकार हसरत जयपुरी ने फिल्म के नायक के चरित्र के अनुकूल, परम्परागत ठुमरी
की शब्दावली में रचे हैं।

ध्यकाल
में ठुमरी तवायफ़ों के कोठों सहित रईसों और जमींदारों की छोटी-छोटी
महफ़िलों में फलती-फूलती रही। इस समय तक ठुमरी गायन की तीन प्रकार की
उप-शैलियाँ विकसित हो चुकी थी। नृत्य के साथ गायी जाने वाली ठुमरियों में
लय और ताल का विशेष महत्त्व होने के कारण ऐसी ठुमरियों को “बन्दिश” या
“बोल-बाँट” की ठुमरी कहा जाने लगा। इस प्रकार की ठुमरियाँ छोटे ख़याल से
मिलती-जुलती होती हैं, जिसमे शब्द का महत्त्व बढ़ जाता है। ऐसी ठुमरियों को
सुनते समय ऐसा लगता है, मानो तराने पर बोल रख दिए गए हों। ठुमरी का दूसरा
प्रकार जो विकसित हुआ उसे “बोल-बनाव” की ठुमरी का नाम मिला। ऐसी ठुमरियों
में शब्द कम और स्वरों का प्रसार अधिक होता है। गायक या गायिका कुछ शब्दों
को चुन कर उसे अलग-अलग अन्दाज़ में प्रस्तुत करते हैं। धीमी लय से आरम्भ
होने वाली इस प्रकार की ठुमरी का समापन द्रुत लय में कहरवा की लग्गी से
किया जाता है। ठुमरी के यह दोनों प्रकार “पूरब अंग” की ठुमरी कहे जाते हैं।
एक अन्य प्रकार की ठुमरी भी प्रचलन में आई, जिसे “पंजाब अंग” की ठुमरी कहा
गया। ऐसी ठुमरियों को प्रचलित करने का श्रेय बड़े गुलाम अली खाँ, उनके भाई
बरकत अली खाँ और नजाकत-सलामत अली खाँ को दिया जाता है। ऐसी ठुमरियों में
“टप्पा” जैसी छोटी- छोटी तानों का काम अधिक होता है।

ठुमरी
के साथ हमोनियम की संगति बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से ही शुरू हो गई थी।
पिछली कड़ियों में हमने हारमोनियम पर ठुमरी बजाने में दक्ष कलाकार भैया
गणपत राव की चर्चा की थी। आज की कड़ी में हम उस समय के कुछ और हारमोनियम
वादकों की चर्चा करेंगे। बनारस के लक्ष्मणदास मुनीम (मुनीम जी), इस
पाश्चात्य वाद्य पर गत और तोड़े बेजोड़ बजाते थे। राजा नवाब अली भी
हारमोनियम पर रागों कि व्याख्या कुशलता से करते थे। इलाहाबाद के नीलू बाबू
भी बहुत अच्छा हारमोनियम बजाते थे। ठुमरी और हारमोनियम का चोली-दामन का साथ
रहा है।

आज
जो ठुमरी हम आपको सुनवाने जा रहे हैं उसमें हारमोनियम की ही नहीं बल्कि
अन्य कई पाश्चात्य वाद्यों की भी संगति की गई है। राज कपूर, माला सिन्हा,
मुबारक और लीला चिटनिस द्वारा अभिनीत फिल्म “मैं नशे में हूँ” के एक प्रसंग
में संगीतकार शंकर जयकिशन ने ठुमरी अंग में इस गीत का संगीत संयोजन किया
है। लता मंगेशकर के गाये इस ठुमरी गीत का मुखड़ा तो एक पारम्परिक ठुमरी –“सजन संग काहे नेहा लगाए…”
का है लेकिन दोनों अन्तरे गीतकार हसरत जयपुरी ने फिल्म के नायक के चरित्र
के अनुकूल, परम्परागत ठुमरी की शब्दावली में रचे हैं। फिल्म के कथानक और
प्रसंग के अनुसार इस ठुमरी के माध्यम से नायक (राज कपूर) और नायिका (माला
सिन्हा) के परस्पर विरोधी सोच को दिखाना था। इसीलिए दोनों अन्तरों से पहले
तेज लय में पाश्चात्य संगीत के दो अंश डाले गए हैं। शेष पूरा गीत ठहराव
लिये हुए बोल- बनाव की ठुमरी की शक्ल में है। गीत में भारतीय और पाश्चात्य
संगीत के समानान्तर प्रयोग से दर्शकों और श्रोताओं को बेहतर संगीत चुनने का
अवसर देना भी प्रतीत होता है। स्वर-साधिका लता मंगेशकर ने उलाहना भाव से
भरी इस ठुमरी में करुण रस का स्पर्श देकर गीत को अविस्मरणीय बना दिया है।
राग तिलंग में निबद्ध होने से ठुमरी का भाव और अधिक मुखरित हुआ है। वर्ष
2017 को विदायी देते हुए आइए, सुनते हैं, रस से भरी यह ठुमरी।
ठुमरी तिलंग : “सजन संग काहे नेहा लगाए…” : लता मंगेशकर : फिल्म – मैं नशे में हूँ

संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के अगले दो अंक 351 और 352, संगीत पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियों
पर केन्द्रित होगा, अतः आज के अंक और अगले अंक में हम आपसे पहेली का कोई
प्रश्न नहीं पूछ रहे हैं। 352वें अंक से पहेली का क्रम पूर्ववत जारी रहेगा।
अगले दो अंको में आप पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियों की रसानुभूति
कीजिए।
इस
अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई
जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस
संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’
की 348वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म “धूल का
फूल” से एक ठुमरी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों
का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – सुधा मल्होत्रा

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में मुम्बई, महाराष्ट्र की शुभा खाण्डेकर
ने पहली बार भाग लिया है और तीनों प्रश्नो के सही उत्तर दिये हैं। हम शुभा
जी का हार्दिक स्वागत करते हैं और आशा करते हैं कि अपने संगीत-ज्ञान से
भविष्य में भी श्रोताओं को लाभान्वित कराती रहेंगी। पहेली के प्रश्नों के
सही उत्तर देने वाले हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी हैं – चेरीहिल न्यूजर्सी
से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी
आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ
‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे।
उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक
बधाई।

अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर अब तक जारी
हमारी श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की यह समापन कड़ी थी। इस
कड़ी में आपने 1959 में प्रदर्शित फिल्म “मैं नशे में हूँ” के ठुमरी गीत का
रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हमने आपसे कुछ ऐसे फिल्मी गीतों पर चर्चा
की है जिसमें आपको ठुमरी शैली के दर्शन हुए होंगे। आज आपने जो गीत सुना, वह
राग तिलंग पर आधारित है। “स्वरगोष्ठी” की आगामी श्रृंखलाओं में भी हम
शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा जारी रखेंगे। हमारी
आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी
कोई फरमाइश हो तो हमें 
swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले दो अंकों में हम संगीत पहेली के विजेताओं से आपका
परिचय कराएँगे और उनकी प्रस्तुतियों से आपका रसास्वादन भी कराएँगे। अगले
रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों
का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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