Dil se Singer

ठुमरी हेमन्त : SWARGOSHTHI – 344 : THUMARI HEMANT



स्वरगोष्ठी – 344 में आज

फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व – 1 : ठुमरी हेमन्त

विरह व्यथा की अभिव्यक्ति के लिए चाँद-दूत की परिकल्पना – “चन्दा देश पिया के जा…”


अमीरबाई कर्नाटकी

‘रेडियो
प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ
हो रही हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की इस पहली
कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत
करता हूँ। पिछली श्रृंखला में हमने आपके लिए फिल्मों में पारम्परिक ठुमरी
के साथ-साथ उसके फिल्मी प्रयोग को भी रेखांकित किया था। इस श्रृंखला में भी
हम फिल्मी ठुमरियों की चर्चा कर रहे हैं, किन्तु ये ठुमरियाँ पारम्परिक
नहीं हैं। इन ठुमरी गीतों को फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकारों ने लिखा है और
संगीतकारों ने इन्हें विभिन्न रागों में बाँध कर ठुमरी गायकी के तत्वों से
अभिसिंचित किया है। हमारी इस श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” के
शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में
शामिल किये गए ऐसे गीत हैं जिनमे राग, भाव और रस की दृष्टि से उपशास्त्रीय
गायन शैली ठुमरी के तत्वों का उपयोग हुआ है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक
दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और
पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप
से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग
में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के
मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का
प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में
लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों
में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला
में हम आपसे पाँचवें और छठे दशक की फिल्मों में शामिल ऐसी ही कुछ
गैर-पारम्परिक चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज हमने आपके
लिए 1944 में प्रदर्शित फिल्म “भर्तृहरि” से एक फिल्मी ठुमरी का चयन किया
है। इस ठुमरीनुमा गीत को पण्डित इन्द्र ने लिखा है, संगीतकार खेमचन्द्र
प्रकाश ने इसे राग हेमन्त के स्वर में बाँधा है और इसे गायिका-अभिनेत्री
अमीरबाई कर्नाटकी ने गाया है।


ठुमरी
गीतों में “रस निष्पत्ति” एक प्रमुख तत्व होता है। नौ रसों में “श्रृंगार
रस” ठुमरी गीतों में प्रमुख रूप से उकेरा जाता है। श्रृंगार रस के दो पक्ष;
संयोग और वियोग होते हैं। आज के ठुमरी गीत में श्रृंगार रस के वियोग पक्ष
को रेखांकित किया गया है। नायिका अपनी विरह-व्यथा को नायक तक पहुँचाने के
लिए वही मार्ग अपनाती है, जैसा कालिदास के “मेघदूत” में अपनाया गया है।
“मेघदूत” का यक्ष जहाँ अपनी विरह वेदना की अभिव्यक्ति के लिए मेघ को
सन्देश-वाहक बनाता है, वहीं आज के ठुमरी गीत की नायिका अपनी विरह व्यथा की
अभिव्यक्ति के लिए चाँद को दूत बनने का अनुरोध कर रही है।

ठुमरी
एक भाव-प्रधान, चपल-चाल वाला गीत है। मुख्यतः यह श्रृंगार प्रधान गीत है;
जिसमें लौकिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार का श्रृंगार मौजूद होता है।
इसीलिए ठुमरी में लोकगीत जैसी कोमल शब्दावली और अपेक्षाकृत हलके रागों का
ही प्रयोग होता है। अधिकतर ठुमरियों के बोल अवधी, भोजपुरी अथवा ब्रज भाषा
में होते हैं। नृत्य में प्रयोग की जाने वाली अधिकतर ठुमरी कृष्णलीला
प्रधान होती हैं। शान्त, गम्भीर अथवा वैराग्य भावों की सृष्टि करने वाले
रागों के बजाय चंचल रागों; जैसे पीलू, काफी, जोगिया, खमाज, भैरवी, तिलक
कामोद, गारा, पहाड़ी, तिलंग आदि में ठुमरी गीतों को निबद्ध किया जाता है।
सम्भवतः हलके या कोमल रागों में निबद्ध होने के कारण ही पण्डित विष्णु
नारायण भातखण्डे ने अपनी पुस्तक “क्रमिक पुस्तक मालिका” में ठुमरी को
“क्षुद्र गायन शैली” कहा है। आज की ठुमरी में राग हेमन्त की झलक है। ठुमरी
गायन में त्रिताल, चाँचर, दीपचन्दी, जत, दादरा, कहरवा आदि तालों का प्रयोग
होता है।

आपके
लिए आज हमने जो ठुमरी गीत चुना है; वह 1944 की फिल्म “भर्तृहरि” से है। यह
फिल्म उत्तर भारत में बहुप्रचलित ‘लोकगाथा’ पर आधारित है। इस लोकगाथा के
नायक ईसापूर्व पहली शताब्दी में उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के राजा
भर्तृहरि हैं। यह लोकगाथा भी फिल्म निर्माताओं का प्रिय विषय रहा है। इस
लोकगाथा पर पहली बार 1922 में मूक फिल्म बनी थी। इसके बाद 1932, 1944 और
1954 में हिन्दी में तथा 1973 में गुजराती में भी इस लोकगाथा पर फ़िल्में
बन चुकी हैं। 1944 में बनी फिल्म “भर्तृहरि” की नायिका सुप्रसिद्ध
अभिनेत्री मुमताज शान्ति थीं और इस फिल्म के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश थे;
जिन्होंने उस समय तेजी से उभर रहीं पार्श्वगायिका अमीरबाई कर्नाटकी को इस
ठुमरी गीत को गाने के लिए चुना। 1906 में बीजापुर, कर्नाटक में जन्मीं
अमीरबाई कर्नाटकी ने 1934 में अपनी बड़ी बहन और प्रसिद्ध अभिनेत्री गौहरबाई
के सहयोग से फिल्मों में प्रवेश किया था। इसी वर्ष उन्हें पहली बार फिल्म
“विष्णुभक्ति” में अभिनय करने का अवसर मिला। 1934 से 1943 के बीच अमीरबाई
ने अभिनय और गायन के क्षेत्र में कड़ा संघर्ष किया। अन्ततः 1943 में उनकी
किस्मत तब खुली जब उन्हें ‘बोम्बे टाकीज’ की फिल्म “किस्मत” में गाने का
अवसर मिला। इस फिल्म के गीतों से अमीरबाई को खूब प्रसिद्धि मिली। उन्हें
प्रसिद्ध करने में फिल्म के संगीतकार अनिल विश्वास का बहुत बड़ा योगदान था।
अमीरबाई कर्नाटकी ने फिल्मों में अभिनय और पार्श्वगायन के अलावा संगीत
निर्देशन भी किया था। 1948 में बहाव पिक्चर्स की सफल फिल्म “शाहनाज़” में
अमीरबाई ने संगीत निर्देशन किया था। अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों में जो
ठुमरी गीत हम आपके लिए प्रस्तुत करने जा रहे हैं; वह ऋतु प्रधान राग
“हेमन्त” और कहरवा ताल में निबद्ध है। राग हेमन्त पूर्वी थाट का राग है। इस
राग के आरोह में पाँच और अवरोह में सात प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह
औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता
है। इस राग में ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल और मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग
होता है। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम है। यह ऋतु प्रधान राग
होता है, अतः हेमन्त ऋतु में किसी भी समय और अन्य समय में सूर्यास्त के
समय (सन्धिप्रकाश के समय) गाया-बजाया जा सकता है। इस राग में श्रृंगार का
विरह पक्ष और तड़प का भाव खूब उभरता है। गायिका अमीरबाई कर्नाटकी ने नायिका
की विरह-व्यथा को अपने स्वरों के माध्यम से किस खूबी से अभिव्यक्त किया
है; यह आप यह ठुमरी गीत सुन कर सहज ही अनुभव कर सकते हैं। यह परम्परागत
ठुमरी नहीं है; इसके गीतकार हैं पं. इन्द्र; जिनकी ‘चाँद-दूत’ परिकल्पना को
अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों ने सार्थक किया है।

राग हेमन्त : “चन्दा देश पिया के जा…” : अमीरबाई कर्नाटकी : फिल्म – भर्तृहरि


संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के 344वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1947 में प्रदर्शित एक
पुरानी फिल्म से एक ठुमरीनुमा गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश
को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने
हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप
प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक की ‘स्वरगोष्ठी’
तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र
का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की
गणना के बाद महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी।


1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुप्रसिद्ध गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 25 नवम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर,
प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 346वें अंक में
प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के
बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना
चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे
दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’
की 342वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको एक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे तीन
में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर
है, राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – विदुषी गिरिजा देवी

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं – चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी
आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ
‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे।
उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक
बधाई।

अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से
आरम्भ हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की पहली कड़ी में
आपने 1944 में प्रदर्शित फिल्म “भर्तृहरि” के ठुमरीनुमा गीत का रसास्वादन
किया। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे फिल्मी गीतों पर चर्चा करेंगे
जिसमें ठुमरी शैली के दर्शन होंगे। आज आपने जो गीत सुना, उसमें राग हेमन्त
की छाया है। इस नई श्रृंखला में भी हम आपसे फिल्मी ठुमरियों पर चर्चा
करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर भी चर्चा करेंगे तथा
सम्बन्धित रागों तथा इस संगीत शैली पर आधारित रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे।
हमारी वर्तमान और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के
बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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