Dil se Singer

ठुमरी झिझोटी : SWARGOSHTHI – 334 : THUMARI JHINJHOTI



स्वरगोष्ठी – 334 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 1 : “पिया बिन नाहीं आवत चैन…”

जब सहगल ने उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायी ठुमरी को अपना स्वर दिया


उस्ताद अब्दुल करीम खाँ
कुन्दनलाल सहगल

‘रेडियो
प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ
हो रही श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की इस पहली
कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी
संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया
प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की
सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको
हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व
में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला
सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके
पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध
का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए
यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। आज से शुरू हो रही हमारी नई लघु
श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के शीर्षक से ही
यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई
उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी
गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक
ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों
के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर
फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से
लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ
है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और
संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में
संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में
हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज हम
आपके लिए फिल्म देवदास की जिस ठुमरी को लेकर उपस्थित हुए हैं वह 1936 में
हिन्दी भाषा में निर्मित फिल्म देवदास की है। राग झिंझोटी की यह ठुमरी 1925
-26 में महाराज कोल्हापुर के राजगायक रहे उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के
स्वरों में है। आज के अंक में आप खाँ साहब की आवाज़ में पारम्परिक और हिन्दी
फिल्मों के यशस्वी गायक और नायक कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में फिल्मी
संस्करण सुनेंगे।


राग – झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन…’ : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म – देवदास 1936
राग – झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन…’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ : पारम्परिक ठुमरी

संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के 334वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी अथवा दादरा
गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित
तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से
केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं।
‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी
के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया
जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह कौन सा राग है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस फिल्मी पार्श्वगायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 16 सितम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर,
प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 336वें अंक में
प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के
बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना
चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे
दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’
की 332वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथियों
द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत एक धुन का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से दो
प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, वाद्य – शहनाई, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दादरा और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, वादक – उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथी

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे नियमित प्रतिभागी हैं – चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी
आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ
‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे।
उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक
बधाई।

अपनी बात
मित्रों,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से
आरम्भ हो चुकी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक
ठुमरी” की यह पहली कड़ी थी। आज की इस कड़ी में आपने राग झिंझोटी की ठुमरी का
रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में
हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और
शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित
रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी
आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी
कोई फरमाइश हो तो हमें
swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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