Dil se Singer

राग भीमपलासी : SWARGOSHTHI – 294 : RAG BHIMPALASI



स्वरगोष्ठी – 294 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 7 : भीमपलासी के स्वर में पिरोया गीत

“तेरे सदक़े बलम न करे कोई ग़म…..”


‘रेडियो
प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी
श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की सातवीं कड़ी में मैं
कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के
अंक में हम आपसे राग भीमपलासी पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला में हम भारतीय
फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व
पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत
के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के
कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला का समापन हम आगामी 25
दिसम्बर को नौशाद अली की 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर,
1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक
साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके
पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही
मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र
बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों
दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत
अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना
वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ
करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान
उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग
था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ
करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन
खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले
गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को
बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए
तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार
बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया
नगरी बम्बई की ओर रुख किया।

फिल्मों
में अपने सांगीतिक जीवन के पहले दशक में ही नौशाद को इतनी सफलता मिल चुकी
थी कि 1949 की फिल्म ‘अन्दाज़’ से उन्हें एक फिल्म के लिए एक लाख रुपये
पारिश्रमिक मिलने लगा था। कई संगीतकारों के पाकिस्तान चले जाने के कारण
सबसे अधिक लाभ नौशाद और सी. रामचन्द्र को हुआ। इस समय तक नौशाद की फिल्मों
में मुख्य गायिकाओं के रूप में ज़ोहराबाई, उमा देवी (टुनटुन), निर्मला देवी
और शमशाद बेगम का वर्चस्व रहा। फिल्म ‘अन्दाज’ से ही नौशाद के खेमे में लता
मंगेशकर का पदार्पण हुआ, जो काफी सफल और लम्बे समय तक जारी रहा। वर्ष 1949
में प्रदर्शित फिल्म ‘अन्दाज’ के निर्माण की योजना बन रही थी। निर्माण के
दौरान ही नौशाद से किसी ने लता मंगेशकर के सुरीलेपन की चर्चा की। यह भी
विचारणीय होगा कि नौशाद और लता मंगेशकर की परस्पर भेंट माध्यम कौन था? इस
सवाल के जवाब में कई किस्से प्रचलित हैं। पहला किस्सा यह चर्चित है कि
स्टूडियो में कार्यरत एक मराठीभाषी चपरासी ने लता मंगेशकर के बारे में
नौशाद को जानकारी दी थी। संगीतकार गुलाम हैदर और पार्श्वगायक जी.एम.
दुर्रानी का नाम भी इस मामले में लिया जाता है। यह भी कहा जाता है कि
कारदार स्टूडिओ में बगल से गुनगुनाते हुए गुजरती लता मंगेशकर की सुरीली
आवाज़ से प्रभावित होकर नौशाद ने उन्हें बुलवाया था, पर शायद सच यही है कि
फिल्म ‘मजबूर’ में लता मंगेशकर के साथ गा चुके मुकेश ने ही नौशाद से लता
मंगेशकर का परिचय कराया था। बहरहाल, लता मंगेशकर से नौशाद बहुत प्रभावित
हुए और उनके साथ नौशाद ने मेहनत भी बहुत की। लता मंगेशकर ने न केवल उर्दू
शब्दों के शुद्ध उच्चारण बल्कि शब्दों को आत्मसात कर उनकी भावनात्मक
प्रस्तुति का कौशल भी नौशाद से सीखा। लता मंगेशकर सीधे-सीधे नौशाद के खेमे
की प्रमुख गायिका बन गईं।
नौशाद  और  लता  मंगेशकर

1954
में प्रदर्शित फिल्म ‘अमर’ की मुख्य नायिका के लिए एक बार फिर नौशाद ने
लता मंगेशकर की आवाज़ का चयन किया। लेखक राजू भारतन ने लता मंगेशकर पर लिखी
अपनी पुस्तक, ‘लता मंगेशकर – ए बायोग्राफी’ में फिल्म ‘अमर’ के एक गीत “तेरे सदक़े बलम…”
की रिकार्डिंग के अवसर की एक दिलचस्प घटना का उल्लेख किया है। उनके अनुसार
गीत में एक स्थान पर एक मुरकी थी, जिसे यथावत लेने में लता मंगेशकर को
असुविधा हो रही थी। रिकार्डिग के दिन उनकी तबीयत ठीक नहीं थी और उन्होने
कुछ खाया भी नहीं था। रिकार्डिंग का तीसरा टेक हो रहा था, जब लता मंगेशकर
एकाएक बेहोश हो गईं। अफरा-तफरी में लोग इधर-उधर दौड़े, और पानी के छींटे
मारने पर उन्हें होश भी आ गया, परन्तु कार्य के प्रति उनका समर्पण देखिए कि
होश में आते ही उनके मुँह से निकला कि नौशाद साहब, मैं वह मुरकी नहीं ले पाई
संगीत के प्रति उनके समर्पण ने ही फिल्म ‘अमर’ तक वह इस ऊँचाई तक पहुँच गई
थी कि उनके आसपास कोई नहीं था। अब हम आपको फिल्म ‘अमर’ का यही गीत सुनवाते
हैं। नौशाद का राग भीमपलासी के स्वरों में पिरोया यह गीत लता मंगेशकर ने
दादरा ताल में गाया है।

राग भीमपलासी : “तेरे सदक़े बलम…” : लता मंगेशकर : फिल्म – अमर

उस्ताद  गुलाम  मुस्तफा  खाँ

राग
‘भीमपलासी’ भारतीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस
की रचनाएँ खिल उठती है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात आरोह में
पाँच स्वर- सा, ग (कोमल), म, प, नि (कोमल), सां और अवरोह में सात स्वर- सां नि (कोमल), ध, प, म ग (कोमल), रे, सा
प्रयोग किए जाते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद कोमल और शेष सभी स्वर
शुद्ध होते हैं। यह काफी थाट का राग है और इसका वादी और संवादी स्वर क्रमशः
मध्यम और तार सप्तक का षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर मध्यम के स्थान पर
पंचम का प्रयोग भी किया जाता है। भीमपलासी के गायन-वादन का समय दिन का चौथा
प्रहर होता है। कर्नाटक संगीत पद्यति में ‘भीमपलासी’ के समतुल्य राग है
‘आभेरी’। ‘भीमपलासी’ एक ऐसा राग है, जिसमें खयाल-तराना से लेकर भजन-ग़ज़ल की
रचनाएँ संगीतबद्ध की जाती हैं। श्रृंगार और भक्ति रस की अभिव्यक्ति के लिए
यह वास्तव में एक आदर्श राग है। आइए अब हम आपको इसी राग में कण्ठ संगीत का
एक मोहक उदाहरण सुनवाते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ
के स्वरों में राग भीमपलासी में निबद्ध एक मोहक खयाल रचना प्रस्तुत कर रहे
हैं। आप इस रचना का रसास्वादन कीजिए और मुझे, आज के इस अंक को यहीं विराम
देने की अनुमति दीजिए।

राग भीमपलासी : “अब तो बड़ी देर भई…” : उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ
संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’
के 294वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1957 में प्रदर्शित एक
उल्लेखनीय हिन्दी फिल्म के एक गीत का अंश सुनवाते हैं। इस गीत के अंश को
सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं।
‘स्वरगोष्ठी’ के 297वें अंक की पहेली का उत्तर सम्पन्न होने तक जिस
प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला
(सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – गीत के इस अंश में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप इस पार्श्वगायक की आवाज़ को पहचान सकते हैं? हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 3 दिसम्बर 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS
में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर
भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम
‘स्वरगोष्ठी’ के 296वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और
प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या
अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी
में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’
क्रमांक 292 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1954 में प्रदर्शित फिल्म
‘शबाब’ से एक राग केन्द्रित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था।
आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर
है- राग – मुल्तानी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक – उस्ताद अमीर खाँ

इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागियों में से पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आप सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की हार्दिक बधाई।

अपनी बात
मित्रो,
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर अपने
सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर जारी लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में
राग-दर्शन” के आज के अंक में आपने राग भीमपलासी के स्वरों में पिरोये एक
गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक
दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला के आलेख को तैयार करने के
लिए हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार
सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया
है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि
आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत
हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते
हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com
पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे
‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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