Dil se Singer

बातों बातों में – 14 : गीतकार असद भोपाली के बारे में उनके सुपुत्र ग़ालिब असद भोपाली से बातचीत

बातों बातों में – 14

गीतकार असद भोपाली के बारे में उनके बेटे ग़ालिब असद भोपाली से बातचीत


जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं…

नमस्कार

दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं,
रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में
सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ
कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन
चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे
में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र
हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ ने
फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के
अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह
श्रृंखला है ‘बातों बातों में’, जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे
शनिवार को। इस बार हम आपके लिए लेकर आए हैं जाने-माने गीतकार असद भोपाली के
व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में उनके बेटे गालिब असद भोपाली से की गई
लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश। इनसे बातचीत की है कृष्णमोहन मिश्र ने। 


असद भोपाली

फिल्म-जगत में कुछ ऐसे भी सृजनशील रचनाकार
हुए हैं, जिन्होने गुणबत्ता से कभी भी समझौता नहीं किया, चाहे फिल्म
उन्हें किसी भी श्रेणी की मिली हो। फिल्म-जगत के एक ऐसे ही प्रतिभावान,
स्वाभिमानी और संवेदनशील शायर-गीतकार असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व
पर “बातों बातों में” के इस अंक में हम चर्चा करेंगे। पिछले दिनों फिल्म और
टेलीविज़न धारावाहिक के पटकथा, संवाद और गीत लेखक ग़ालिब खाँ से हमारा
सम्पर्क हुआ। मालूम हुआ कि अपने समय के चर्चित गीतकार असद भोपाली के आप
सुपुत्र हैं। अपने स्वाभिमानी पिता से ही प्रेरणा पाकर ग़ालिब खाँ फिल्म और
टेलीविज़न के क्षेत्र में सफलतापूर्वक सक्रिय हैं। हमने ग़ालिब साहब से
अनुरोध किया कि वो अपने पिता असद भोपाली के बारे में हमारे साथ बातचीत
करें। अपनी व्यस्तता के बावजूद उन्होने हमसे बातचीत की। प्रस्तुत है चार
दशकों तक फिल्म-गीतकार के रूप में सक्रिय श्री असद भोपाली के व्यक्तित्व और
कृतित्व पर उनके सुपुत्र ग़ालिब खाँ से किये गये साक्षात्कार के सम्पादित
अंश।


ग़ालिब असद भोपाली

कृष्णमोहन- ग़ालिब खाँ साहब, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के इस मंच पर हम आपका हार्दिक स्वागत करते हैं।


ग़ालिब खाँ- धन्यवाद। आपने इस मंच पर मुझे अपने पिता जी के बारे में कुछ कहने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।

कृष्णमोहन-
ग़ालिब साहब, करोड़ों फिल्म संगीत प्रेमी आपके पिता को असद भोपाली के नाम से
जानते हैं। हम उनका वास्तविक नाम जानना चाहते हैं साथ ही यह भी जानना
चाहेंगे कि आपके खानदान का सम्बन्ध भोपाल से किस प्रकार से जुड़ा हुआ है?

ग़ालिब
खाँ- मेरे पिता असद उल्लाह खाँ का जन्म 10 जुलाई 1921 को भोपाल में हुआ
था। उनके पिता यानि मेरे दादा मुंशी अहमद खाँ का भोपाल के आदरणीय
व्यक्तियों में शुमार था। वे एक शिक्षक थे और बच्चों को अरबी-फारसी पढ़ाया
करते थे। पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा भी उनके शिष्यों में से एक थे।
वो घर में ही बच्चों को पढ़ाया करते थे, इसीलिए मेरे पिताजी भी अरबी-फारसी
के साथ साथ उर्दू में भी वो महारत हासिल कर पाए जो उनकी शायरी और गीतों में
हमेशा झलकती रही। उनके पास शब्दों का खज़ाना था। एक ही अर्थ के बेहिसाब
शब्द हुआ करते थे उनके पास। इसलिए उनके जाननेवाले संगीतकार उन्हें गीत
लिखने की मशीन कहा करते थे।

कृष्णमोहन- फिल्म-जगत में आने से पहले एक शायर के रूप वो कितने लोकप्रिय थे?

ग़ालिब
खाँ- मेरे पिता को शायरी का शौक़ किशोरावस्था से ही था। उस दौर में जब
कवियों और शायरों ने आज़ादी की लड़ाई में अपनी कलम से योगदान किया था, उस
दौर में उन्हें भी अपनी क्रान्तिकारी लेखनी के कारण जेल की हवा खानी पड़ी
थी।

कृष्णमोहन- इसका अर्थ हुआ कि असद भोपाली साहब स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी थे।

ग़ालिब
खाँ- जी हाँ, आज़ादी की लड़ाई में हर वर्ग के लोगों ने हिस्सा लिया था।
इनमें साहित्यकारों की भी भूमिका रही है। मेरे पिता ने एक बुद्धिजीवी के
रूप में इस लड़ाई में अपना योगदान किया था। क्रान्तिकारी लेखनी के कारण
अँग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल में बन्द कर दिया था। ये और बात है कि
अँग्रेज़ जेलर भी उनकी ‘गालिबी’ का प्रशंसक हो गया था। (जी हाँ; वो अँग्रेज़
जेलर शायरी को ‘गालिबी’ कहा करता था)। जेल से छूटने के बाद मेरे पिता
मुशायरों में हिस्सा लेते रहे।

कृष्णमोहन- स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी लेखनी से योगदान करने वाले शायर असद भोपाली साहब फिल्मी दुनिया में कैसे पहुंचे?

सुरैया

ग़ालिब
खाँ- तब देश आज़ाद हो चुका था। उन दिनों हर छोटे-बड़े मुशायरे में उन्हें
सम्मान से बुलाया जाता था। इसी शायरी ने उन्हें फिल्मनगरी मुम्बई (तत्कालीन
बम्बई) पहुँचा दिया। हुआ यूँ कि भोपाल टाकीज कि तरफ से एक मुशायरे का
आयोजन किया गया था और शायरों की जबान में कहा जाए तो उन्होंने ये ‘मुशायरा
लूट लिया’ था। नतीजा ये हुआ कि भोपाल टाकिज के मैनेजर मिस्बाह साहब ने
उन्हें पाँच सौ रूपये दिये और फाजली ब्रदर्स का पता दिया, जिन्हें अपनी नयी
फिल्म के गीतों के लिए एक माहिर शायर कि दरकार थी। वो सन 1949 में बम्बई
आये और हमेशा के लिए यहीं के होकर रह गए। ‘दुनिया’ उनकी पहली फिल्म थी।
संगीतकार थे सी. रामचन्द्र और मुख्य भूमिकाओं में करण दीवान, सुरैया, और
याकूब जैसे महान कलाकार थे। इस फिल्म का गीत “अरमान लुटे दिल टूट गया…”
लोकप्रिय भी हुआ था।


कृष्णमोहन-
ग़ालिब साहब, 1949 में प्रदर्शित फिल्म ‘दुनिया’ में आपके पिता असद भोपाली
के लिखे इस पहले गीत को क्यों न हम श्रोताओं को सुनवाते चलें? 

ग़ालिब खाँ- ज़रूर, मेरे पिता के इस पहले फिल्मी गीत को श्रोताओं को ज़रूर सुनवाइए। 

फिल्म – दुनिया : “अरमान लुटे दिल टूट गया…” : गायिका – सुरैया 

 
कृष्णमोहन-
बहुत दर्द भरा गीत है। अब आपसे हम यह जानना चाहेंगे कि फिल्म-जगत में
स्थापित हो जाने के बाद असद साहब के शुरुआती दौर का सबसे लोकप्रिय गीत कौन
सा है? 

ग़ालिब
खाँ- शुरुआती दौर में उन्होंने संगीतकार श्यामसुन्दर और हुस्नलाल भगतराम
जैसे नामी संगीतकारों के साथ काम किया था। बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्देशित
सफलतम फिल्म ‘अफसाना’ के गीतों से उन्होने अपनी लेखनी का लोहा भी मनवा
लिया। फिल्म का एक गीत -“किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली, फिर कौन किसी का होता
है, ऐ दुनिया वालों सच तो कहो क्या प्यार भी झूठा होता है…” आज भी लोगों
को याद है। मुझे अपने पिता के लिखे गीतों में यह गीत बेहद पसंद है।
कृष्णमोहन जी, क्या यह गीत हम श्रोताओं को सुनवा सकते हैं? 

कृष्णमोहन-
अवश्य, मैं स्वयं आपसे यही कहना चाह रहा हूँ। तो “बातों बातों में” के
प्रिय पाठकों-श्रोताओं, आप सुनिए हमारे आज के अतिथि जनाब ग़ालिब खाँ की
पसन्द का गीत, जिसे उनके पिता और सुप्रसिद्ध शायर-गीतकार असद भोपाली ने
1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘अफसाना’ के लिए लिखा था। आप यह गीत सुनें। 

फिल्म – अफसाना : “किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली…” : गायक – मुकेश 




ग़ालिब
खाँ- फिल्म ‘अफसाना’ के गीत से उन्हें लोकप्रियता तो मिली, परन्तु फिल्म
की सफलता के सापेक्ष उन्हें काम नहीं मिला। उस समय के कलाकारों को काम से
ज्यादा संघर्ष करना पड़ता था, उन्होंने भी किया। 1963 में प्रदर्शित फिल्म
‘पारसमणि’ के गीत लिखने का उन्हें प्रस्ताव मिला। यह एक फेण्टेसी फिल्म
थी। फिल्म की संगीत-रचना के लिए नये संगीतकार लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल को
अनुबन्धित किया गया था। मेरे पिता ने उस समय की जन-रुचि और फिल्म की थीम के
मुताबिक इस फिल्म के लिए गीत लिखे थे। फिल्म ‘पारसमणि’ के गीत- “हँसता हुआ
नूरानी चेहरा…” और “वो जब याद आये, बहुत याद आये…” ने लोकप्रियता के
परचम लहरा दिये थे। ये गीत वर्षों बाद आज भी लोकप्रियता के शिखर पर हैं। 

कृष्णमोहन- आगे बढ़ने से पहले क्यों न हम इस फिल्म का एक गीत अपने पाठकों-श्रोताओं को सुनवाते चलें। 

ग़ालिब खाँ- जी हाँ, मेरे खयाल से हम अपने पाठकों को ‘पारसमणि’ का बेहद लोकप्रिय गीत– “हँसता हुआ नूरानी चेहरा…” सुनवाते हैं। 

फिल्म – पारसमणि : “हँसता हुआ नूरानी चेहरा…” : स्वर – लता मंगेशकर और कमल बरोट 


कृष्णमोहन-
बहुत ही मधुर गीत आपने सुनवाया। ग़ालिब साहब; अब हम जानना चाहेंगे की आपके
पिता असद भोपाली ने किन-किन संगीतकारों के साथ काम किया और किन संगीतकारों
से उनके अत्यन्त मधुर सम्बन्ध रहे? 

ग़ालिब
खाँ- मेरे पिता ने संगीतकार सी. रामचन्द्र, हुस्नलाल-भगतराम, खैय्याम,
हंसराज बहल, एन. दत्ता, नौशाद, ए.आर. कुरैशी (मशहूर तबलानवाज़ अल्लारक्खा),
चित्रगुप्त, रवि, सी. अर्जुन, सोनिक ओमी, राजकमल, लाला सत्तार, हेमन्त
मुखर्जी, कल्याणजी-आनन्दजी जैसे दिग्गज संगीतकरों के साथ काम किया। परन्तु
‘पारसमणि’ में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल जैसे नए संगीतकारों के साथ सफलतम गीत
देने के बाद नए संगीतकारों के साथ काम करने का जो सिलसिला शुरू हुआ वो
अन्त तक चलता रहा। नए संगीतकारों में गणेश और उषा खन्ना के साथ वो अधिक
सहज थे। संगीतकार राम लक्ष्मण उनके अन्तिम संगीतकार साथियों में से हैं,
जिनके पास आज भी उनके कई मुखड़े और गीत लिखे पड़े हैं। 

कृष्णमोहन-
असद भोपाली जी ने हर श्रेणी की फिल्मों में अनेक लोकप्रिय गीत लिखे हैं,
किन्तु उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका, जो उन्हें बहुत पहले ही मिलना चाहिए
था। इस सम्बन्ध में आपका और आपके परिवार का क्या मत है? 

ग़ालिब
खाँ- मेरे पिता ने 1949 से 1990 तक लगभग चार सौ फिल्मों में दो हज़ार से
ज्यादा गीत लिखे परन्तु फिल्म ‘दुनिया’ से लेकर ‘मैंने प्यार किया’ के गीत
“कबूतर जा जा जा…” तक उन्हें वो प्रतिष्ठा नहीं मिली जिसके वो हकदार थे।
इस अन्तिम फिल्म के लिए ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर अवार्ड
प्राप्त हुआ था। दरअसल इस स्थिति के लिए वो खुद भी उतने ही ज़िम्मेदार थे,
जितनी ये फिल्म नगरी। कवियों और शायरों वाली स्वाभाविक अकड़ उन्हें काम
माँगने से रोकती थी और जीवनयापन के लिए जो काम मिलता गया वो करना पड़ा। बस
इतना ध्यान उन्होने अवश्य रखा था कि कभी अपनी शायरी का स्तर नहीं गिरने
दिया। कम बजट की स्टंट फिल्मों में भी उन्होंने “हम तुमसे जुदा हो के, मर
जायेंगे रो-रो के…” जैसे गीत लिखे। अपेक्षित सफलता न मिलने से या यूँ
कहूँ कि उनकी असफलता ने उन्हें शराब का आदी बना दिया था और उनकी शराब ने
पारिवारिक माहौल को कभी सुखद नहीं होने दिया। पर आज जब मैं उनकी स्थिति को
अनुभव कर पता हूँ तो समझ में आता है कि जितना दुःख उनकी शराब ने हमें दिया
उससे ज्यादा दुःख वो चुपचाप पी गए और हमें एहसास तक नहीं होने दिया। 

प्रसिद्ध
शायर ग़ालिब के हमनाम (असद उल्लाह् खाँ) होने के साथ-साथ स्वभाव, संयोग और
भाग्य भी उन्होंने कुछ वैसा ही पाया था। मेरे पिता के अन्तर्मन का दर्द
उनके गीतों में झलकता है। दर्द भरे गीतों की लम्बी सूची में से फिल्म ‘मिस
बॉम्बे’ का एक गीत मैं पाठकों को सुनवाना चाहता हूँ। 

कृष्णमोहन-
दोस्तों, ग़ालिब खाँ के अनुरोध पर हम आपको 1957 की फिल्म ‘मिस बॉम्बे’ का
यह गीत सुनवा रहे हैं। स्वर मोहम्मद रफी का और संगीत हंसराज बहल का है। 

फिल्म – मिस बॉम्बे : “ज़िंदगी भर ग़म जुदाई का..” : स्वर – मोहम्मद रफी

 
कृष्णमोहन- साहित्य क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों के बारे में भी हमें बताएँ। क्या उनके गीत / ग़ज़ल के संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं? 

ग़ालिब
खाँ- इस मामले में भी दुर्भाग्य ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उनकी लिखी हजारों
नज्में और गजले जिस डायरी में थी वो डायरी बारिश कि भेंट चढ़ गयी। उन
दिनों हम नालासोपारा के जिस घर में रहा करते थे, वह पहाड़ी के तल पर था और
वहाँ मामूली बारिश में भी बाढ़ कि स्थिति पैदा हो जाती थी और ऐसी ही एक
बाढ़, असद भोपाली की सारी “गालिबी” को बहा ले गयी। तब उनकी प्रतिक्रिया,
मुझे आज भी याद है। उन्होने कहा था- ‘जो मैं बेच सकता था मैं बेच चुका था,
और जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं थी’। एक शायर के पूरे
जीवन की त्रासदी इस एक वाक्य में निहित है। 

कृष्णमोहन- आप अपने बारे में भी हमारे पाठको को कुछ बताएँ। यह भी बताएँ कि अपने पिता का आपके ऊपर कितना प्रभाव पड़ा? 

ग़ालिब
खाँ- मेरे पिता मिर्ज़ा ग़ालिब से कितने प्रभावित थे इसका अंदाज़ा आप इसी से
लगा सकते हैं कि उन्होने मेरा नाम ग़ालिब ही रखना पसन्द किया। वो अक्सर कहते
थे कि वो असदउल्लाह खाँ “ग़ालिब” थे और ये ‘ग़ालिब असदउल्लाह खाँ’ है। अब ये
कुछ उस नाम का असर है और कुछ धमनियों में बहते खून का, कि मैंने भी
आखिरकार कलम ही थाम ली। शायरी और गीत लेखन से शुरुआत की, फिर टेलीविज़न
सीरियल के लेखन से जुड़ गया। ‘शक्तिमान’ जैसे धारावाहिक से शुरुआत की। फिर
‘मार्शल’, ‘पैंथर’, ‘सुराग’ जैसे जासूसी धारावाहिकों के साथ ‘युग’,
‘वक़्त की रफ़्तार’, ‘दीवार’ के साथ-साथ ‘माल है तो ताल है’, ‘जीना इसी का
नाम है’, ‘अफलातून’ जैसे हास्य धारावाहिक भी लिखे। ‘हमदम’, ‘वजह’ जैसी
फिल्मो का संवाद-लेखन किया। एक फिल्म ‘भिन्डी बाज़ार इंक’ की पटकथा-संवाद
लिखने का सौभाग्य मिला, जिसे दर्शकों ने काफी सराहा। बस मेरी इतनी ही
कोशिश है कि मैं अपने पिता के नाम का मान रख सकूँ और उनके अधूरे सपनों को
पूरा कर पाऊँ। 

कृष्णमोहन-
आपका बहुत-बहुत आभार, आप “बातों बातों में” के मंच पर आए और अपने पिता असद
भोपाली की शायरी के विषय में हमारे पाठकों के साथ चर्चा की। अब चलते –चलते
आप अपनी पसन्द का कोई गीत हमारे पाठकों/श्रोताओं को सुनवा दें। 

ग़ालिब
खाँ- ज़रूर, पाठको को मैं एक ऐसा गीत सुनवाना चाहता हूँ, जिसे जब भी मैं
सुनता हूँ अपने पिता को अपने आसपास पाता हूँ। यह फिल्म ‘एक नारी दो रूप’का
गीत है जिसे रफी साहब ने गाया है और संगीतकार हैं गणेश। चूँकि फिल्म चली
नहीं इसलिए गीत भी अनसुना ही रह गया। आप इस गीत को सुने और मुझे इजाज़त
दीजिए। 

फिल्म – एक नारी दो रूप : “दिल का सूना साज तराना ढूँढेगा…” : स्वर – मोहम्मद रफी 
आपको
हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और
फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के
चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के
साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



वार्ताकार : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 


Related posts

बसन्त ऋतु की दस्तक और वाणी वन्दना

कृष्णमोहन

अफसाना लिख रही हूँ….उमा देवी की आवाज़ में एक खनकता नगमा

Sajeev

चित्रकथा – 35: शायर व गीतकार ज़फ़र गोरखपुरी का फ़िल्म संगीत में योगदान

PLAYBACK

Leave a Comment