Dil se Singer

सावन के नज़ारे हैं….शमशाद बेगम की पहली फिल्म के एक गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 731/2011/171

मस्कार! ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ के दोस्तों, स्वागत है आप सभी का इस सुरीले सफ़र में। कृष्णमोहन मिश्र जी द्वारा प्रस्तुत ‘वतन के तराने’ लघु शृंखला के बाद आज से एक नई शृंखला के साथ, मैं सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ हाज़िर हो गया हूँ। आज से शुरु होने वाली लघु शृंखला समर्पित है फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की एक लाजवाब पार्श्वगायिका को। ये वो गायिका हैं दोस्तों जिनकी आवाज़ की तारीफ़ में संगीतकार नौशाद साहब नें कहा था कि इसमें पंजाब की पाँचों दरियाओं की रवानी है। उधर ओ. पी. नय्यर साहब नें इनकी शान में कहा था कि इस आवाज़ को सुन कर ऐसा लगता है जैसे किसी मंदिर में घंटियाँ बज रही हों। इस अज़ीम गुलुकारा नें कभी हमसे अपना नाम बूझने को कहा था, लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि आज भी जब हम इनका गाया कोई गीत सुनते हैं तो इनका नाम बूझने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि इनकी खनकती आवाज़ ही इनकी पहचान है। प्रस्तुत है फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ की नई लघु शृंखला ‘बूझ मेरा क्या नाव रे’। शमशाद बेगम के गाये गीतों की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आज ६ दशक बाद भी उनके गाये हुए गीतों के रीमिक्स जारी हो रहे हैं। आइए इस शृंखला में उनके गाये गीतों को सुनने के साथ साथ उनके जीवन और करीयर से जुड़ी कुछ बातें भी जानें, और शमशाद जी के व्यक्तित्व को ज़रा करीब से जानने की कोशिश करें।

विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़ौजी जवानों को सम्बोधित करते हुए शमशाद बेगम नें बरसों बरस पहले अपनी दास्तान कुछ यूं शुरु की थीं – “देश के रखवालों, आप सब को मेरी दुआएँ! मेरे लिए गाना तो आसान है, पर बोलना बहुत मुश्किल। समझ में नहीं आ रहा है कि कहाँ से शुरु करूँ! आप मेरे गानें अपने बचपन से ही सुनते चले आ रहे होंगे, पर आज पहली बार आप से बातें कर रही हूँ। जगबीती बयान करना मेरे लिये बहुत मुश्किल है। दास्तान यूं है कि मेरा जन्म लाहौर में १९१९ में हुआ। उस समय लड़कियों को जो ज़रूरी तालीम दी जाती थी, मुझे भी दी गई। गाने का शौक घर में किसी का भी नहीं था मेरे अलावा। मेरे वालिद ग़ज़लों के शौक़ीन थे और वे मुशायरों में जाया करते थे। कभी कभी वे मुझसे ग़ज़लें गाने को भी कहते थे। मास्टर ग़ुलाम हैदर मेरे वालिद के अच्छे दोस्त थे। एक बार उन्होंने मेरी आवाज़ सुनी और उनको मेरी आवाज़ पसंद आ गई। मास्टरजी नें एक रेकॉर्डिंग् कंपनी (jien-o-phone) के ज़रिये मेरा पहला रेकॉर्ड निकलवा दिया। १४ साल की उम्र में मेरा पहला गाना रेकॉर्ड हुआ जो था “हाथ जोड़ा लई पखियंदा ओये क़सम ख़ुदा दी चंदा”। उस रेकॉर्ड कंपनी नें फिर मेरे १०० रेकॉर्ड्स निकाले। १९३७ में मैं पेशावर रेडियो की आर्टिस्ट बन गई, जहाँ मैंने पश्तो, परशियन, हिंदी, उर्दू और पंजाबी में प्रोग्राम पेश किए। पर मैंने कभी संगीत की कोई तालीम नहीं ली। १९३९ में मैं लाहौर और फिर दिल्ली में रेडियो प्रोग्राम करने लगी। पंचोली जी नें पहली बार मुझे प्लेबैक का मौका दिया १९४० की पंजाबी फ़िल्म ‘यमला जट’ में, जिसमें मेरा गीत “आ सजना” काफ़ी हिट हुआ था। मेरी पहली हिंदी फ़िल्म थी पंचोली साहब की ‘ख़ज़ांची’। उन्होंने मुझसे फ़िल्म के सभी आठ गीत गवाये। यह फ़िल्म ५२ हफ़्तों से ज़्यादा चली।” दोस्तों, शमशाद जी नें बहुत ही कम शब्दों में अपने शुरुआती दिनों का हाल बयान कर दिया। लेकिन इतनी आसानी से हम भला संतुष्ट क्यों हों? इसलिये कल हम उनसे इन्ही दिनों के बारे में विस्तार से जानेंगे। लेकिन फ़िल्हाल सुना जाये शमशाद जी की पहली हिंदी फ़िल्म ‘ख़ज़ांची’ से उनका गाया यह गीत “सावन के नज़ारे हैं”। मास्टर ग़ुलाम हैदर का संगीत है, और गीत लिखा है वली साहब नें। १९४१ में बनी इस फ़िल्म को निर्देशित किया था मोती गिदवानी नें और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे एम. इस्माइल, रमोला और नारंग।

और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत –

१. एक बड़े निर्माता निर्देशक की पहली निर्मित फिल्म थी ये.

२. आवाज़ है शमशाद बेगम की.

३. मुखड़े में शब्द है – “याद”

अब बताएं –

इस गीत के गीतकार – ३ अंक

इस गीत के संगीतकार – २ अंक

फिल्म का नाम – २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम –

जी इंदु जी अमित जी अब १० से भी अधिक श्रृंखलाएं जीत चुके हैं. बधाई के हकदार तो हैं ही

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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Amit

4 comments

अमित तिवारी August 28, 2011 at 2:03 pm

This post has been removed by the author.

Reply
अमित तिवारी August 28, 2011 at 2:24 pm

Behzad Lucknowi

Reply
गुड्डोदादी August 28, 2011 at 4:52 pm

यादों की चिंगारी में शोला भड़क गया

शत शत नमन शमशाद बेगम जी को
एक >>>> नहीं लिखा जाता

Reply
indu puri August 28, 2011 at 6:56 pm

music director-{Ram ganguli
if this song is 'kah do kah do koyal se na gaaye re ho mohe apanaa koii yaad aaye re …'
aage aap jano bhai ha ha ha

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