Dil se Singer

मोहब्बत की कहानी आँसूओं में पल रही है.. सज्जाद अली ने शहद-घुली आवाज़ में थोड़ा-सा दर्द भी घोल दिया है

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०३

माफ़ी, माफ़ी और माफ़ी… भला कितनी माफ़ियाँ माँगूंगा मैं आप लोगों से। हर बार यही कोशिश करता हूँ कि महफ़िल-ए-ग़ज़ल की गाड़ी रूके नहीं, लेकिन कोई न कोई मजबूरी आ हीं जाती है। इस बार घर जाने से पहले यह मन बना लिया था कि आगे की दो-तीन महफ़िलें लिख कर जाऊँगा, लेकिन वक़्त ने हीं साथ नहीं दिया। घर पर अंतर्जाल की कोई व्यवस्था नहीं है, इसलिए वहाँ से महफ़िलों की मेजबानी करने का कोई प्रश्न हीं नहीं उठता था। अंत में मैं हार कर मन मसोस कर रह गया। तो इस तरह से पूरे तीन हफ़्ते बिना किसी महफ़िल के गुजरे। अब क्या करूँ!! फिर से माफ़ी माँगूं? मैं सोच रहा हूँ कि हर बार क्षमा-याचना करने से अच्छा है कि पहले हीं एक “सूचना-पत्र” महफ़िल-ए-ग़ज़ल के दरवाजे पर चिपका दूँ कि “मैं महफ़िल को नियमित रखने की यथा-संभव कोशिश करूँगा, लेकिन कभी-कभार अपरिहार्य कारणों से महफ़िल अनियमित हो सकती है। इसलिए किसी बुधवार को १०:३० तक आपको महफ़िल खाली दिखे या कोई रौनक न दिखे, तो मान लीजिएगा कि इसके मेजबान को ऐन मौके पर कोई बहुत हीं जरूरी काम निकल आया है। फिर उस बुधवार के लिए मुझे क्षमा करके अगले बुधवार को महफ़िल की राह जरूर ताकिएगा, क्योंकि महफ़िल आएगी तो बुधवार को हीं और ९:३० से १०:३० के बीच किसी भी वक़्त। अगर आप ऐसा करते हैं तो मैं आप सभी का आभारी रहूँगा। धन्यवाद!”

चलिए तो आज की महफ़िल में शमा जलाते हैं। आज की महफ़िल जिस नज़्म से सजने वाली है, जिस नज़्म के नाम है… उस नज़्म को अपनी आवाज़ से मक़बूल किया है पाकिस्तान के बहुत हीं जाने-माने सेमि-क्लासिकल एवं पॉप गायक, अभिनेता , निर्माता और निर्देशक सज्जाद अली ने। आपको शायद याद हो कि पिछले साल ९ दिसम्बर को हमने “शामिख फ़राज़” जी के आग्रह पर “अहमद फ़राज़” की ग़ज़ल “अब के बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिले” सुनवाई थी, जिसे इन्हीं सज्जाद साहब ने गाया था। उस वक़्त हमने इनका छोटा-सा परिचय दिया था। तो पहले उसी परिचय से शुरूआत करते हैं:

सज्जाद अली के अब्बाजान साजन(वास्तविक नाम: शफ़क़त हुसैन) नाम से मलयालम फिल्में निर्देशित किया करते हैं। ७० के दशक से अबतक उन्होंने लगभग ३० फिल्में निर्देशित की हैं। मज़े की बात यह है कि खुद तो वे हिन्दुस्तान में रह गए लेकिन उनके दोनों बेटों ने पाकिस्तान में खासा नाम कमाया। जैसे कि आज की गज़ल के गायक सज्जाद अली पाकिस्तान के जानेमाने पॉप गायक हैं, वहीं वक़ार अली एक जानेमाने संगीतकार। सज्जाद अली का जन्म १९६६ में कराची के एक शिया मुस्लिम परिवार में हुआ था। बचपन से हीं इन्हें संगीत की शिक्षा दी गई। शास्त्रीय संगीत में इन्हें खासी रूचि थी। उस्ताद बड़े गुलाम अली खान, उस्ताद बरकत अली खान, उस्ताद मुबारक अली खान, मेहदी हसन खान, गुलाम अली, अमानत अली खान जैसे धुरंधरों के संगीत और गायिकी को सुनकर हीं इन्होंने खुद को तैयार किया। इनका पहला एलबम १९७९ में रीलिज हुआ था, जिसमें इन्होंने बड़े-बड़े फ़नकारों की गायिकी को दुहराया। उस एलबम के ज्यादातर गाने “हसरत मोहानी” और “मोमिन खां मोमिन” के लिखे हुए थे। यूँ तो इस एलबम ने इन्हें नाम दिया लेकिन इन्हें असली पहचान मिली पीटीवी की २५वीं सालगिरह पर आयोजित किए गए कार्यक्रम “सिलवर जुब्ली” में। दिन था २६ नवंबर १९८३. “लगी रे लगी लगन” और “बावरी चकोरी” ने रातों-रात इन्हें फर्श से अर्श पर पहुँचा दिया। एक वो दिन था और एक आज का दिन है…सज्जाद अली ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। अप्रेल २००८ में “चहार बलिश” नाम से इन्होंने अपना एलबम रीलिज किया, जिसमें “चल रैन दे”(यह गाना वास्तव में जुलाई २००६ में मार्केट में आया था और इस गाने ने उस समय खासा धूम मचाया था) भी शामिल है। इनके बारे में इससे ज्यादा क्या कहा जाए कि खुद ए०आर०रहमान इन्हें “ओरिजिनल क्रोसओवर” मानते हैं।

रहमान इन्हें “ओरिजिनल क्रोसओवर” मानते हैं और कहते हैं कि: “From the realm of the classical, he metamorphosed into one of the brightest lights of Pakistani pop.Always striking the right note, and never missing a beat, even the most hardened purist has to give Sajjad his due. This man can breathe life in a Ghazal even as he puts the V back into verve. He is one of the very few singers in Pakistan who seems a complete singer. As far as skill is concerned I feel nobody compares to Sajjad Ali. He is simply too good at everything he chooses to create.” यानि कि “शास्त्रीय संगीत के साम्राज्य से चलकर सज्जाद ने पाकिस्तानी पॉप की चमकती-धमकती दुनिया में भी अपनी पकड़ बना ली है। ये हमेशा सही नोट लगाते हैं और एक भी बीट इधर-उधर नहीं करते, इसलिए जो “प्युरिस्ट” हैं उन्हें भी सज्जाद का महत्व जानना चाहिए। ये ग़ज़लों में जान फूँक देते हैं और गानों में जोश का संचार करते हैं। ये पाकिस्तान के उन चुनिंदे गायकों में से हैं जिन्हें एक सम्पूर्ण गायक कहा जा सकता है। जहाँ तक योग्यता की बात है तो मेरे हिसाब से सज्जाद अली की कोई बराबरी नहीं कर सकता। ये जो भी करते हैं, उसमें शिखर तक पहुँच जाते हैं।”

सज्जाद अली के बारे में हंस राज हंस कहते हैं कि “अगर मेरा पुनर्जन्म हो तो मैं सज्जाद अली के रूप में जन्म लेना चाहूँगा।” तो इतनी काबिलियत है इस एक अदने से इंसान में।

“विकिपीडिया” पर अगर देखा जाए तो इनके एलबमों की फेहरिश्त इतनी लंबी है कि किसे चुनकर यहाँ पेश करूँ और किसे नहीं, यह समझ नहीं आता। फिर भी मैं कुछ हिट सिंगल्स की लिस्ट दिए देता हूँ:

बाबिया, चल उड़ जा, कुछ लड़कियाँ मुझे, चीफ़ साब, माहिवाल, तस्वीरें, जादू, झूले लाल, चल झूठी, दुआ करो, प्यार है, पानियों में, सोहनी लग दी, सिन्ड्रेला, तेरी याद, ऐसा लगा, कोई नहीं, ना बोलूँगी (रंगीन), चल रैन दे (जिसका ज़िक्र हमने पहले भी किया है), पेकर (२००८)

कुछ सालों से सज्जाद गायकी की दुनिया में नज़र नहीं आ रहे थे, लेकिन अच्छी खबर ये है कि अभी हाल में हीं इन्होंने “शोएब मंसूर” की आने वाली फिल्म “बोल” के लिए एक गाना रिकार्ड किया है। इसी अच्छी खबर के साथ चलिए हम अब आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं।

हम अभी जो नज़्म सुनवाने जा रहे हैं उसे हमने “सिन्ड्रेला” एल्बम से लिया है, जो २००३ में रीलिज हुई थी। इस नज़्म में सज्जाद अली की आवाज़ की मिठास आपको बाँधे रखेगी, इसका मुझे पूरा यकीन है। नज़्म का उनवान है “पानियों में”..

पानियो में चल रही हैं,
कश्तियाँ भी जल रही हैं,
हम किनारे पे नहीं हैं.. हो..

ज़िंदगी की _______,
है मोहब्बत की कहानी,
आँसूओं में पल रही है… हो..

जो कभी मिलते नहीं हैं,
मिल भी जाते हैं कहीं पर,
ना मिलें तो ग़म नहीं है.. हो..

दूर होते जा रहे हैं,
ये किनारे, वो किनारे,
ना तुम्हारे, ना हमारे… हो..

चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की… ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ….

पिछली महफिल के साथी –

पिछली महफिल का सही शब्द था “बिछड़” और शेर कुछ यूँ था-

ईंज मैं रोई, जी मैं बिछड़ के खोई,
कूंज (गूंज) तड़प दीदार बिना

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो
मेरी तरह तुम भी झूठे हो (बशीर बद्र)

बिछड़ कर हम से कहाँ जाओगे
तासीर हमारी वापिस ले आएगी (मंजु जी)

शायद कोई रोयेगा अपनी कब्र पर भी
बिछड़ जाने की रस्म निभानी ही होगी (शन्नो जी)

बिछड़ के भी वो मुझसे दूर रह न सका
आंख से बिछड़ा और दामन मैं रह गया (अवनींद्र जी)

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों मैं मिले
जैसे सूखे हुए कुछ फूल किताबों मैं मिले (अहमद फ़राज़)

हर बार की तरह पिछली महफ़िल में भी मैं शब्द गायब करना भूल गया। सजीव जी ने इस बात की जानकारी दी। सजीव जी, आपका धन्यवाद! वैसे उस महफ़िल की शोभा बनीं पूजा जी (शायद पहली बार 🙂 ).. पूजा जी, इस उपलब्धि के लिए आपको ढेरों बधाईयाँ। मंजु जी, जन्मदिवस की बधाईयों को स्वीकार करते हुए मैं आपको तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। आपने मेरे लिए जो पंक्तियाँ लिखीं, जो दुआएँ दीं (जीवेत शरद: शतम) उसकी प्रशंसा के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। ताज मैंने नहीं पहनाया, ताज आपने मुझे पहनाया है। शन्नो जी, आप सबसे थोड़ा-बहुत मजाक कर लूँ, इतना हक़ तो मुझे है हीं। है ना? 🙂 पंजाबी तो मुझे भी नहीं आती (आ जाती, अगर कोई पंजाबन मिल जाती मुझे.. लेकिन मिली हीं नहीं 🙂 ) , इसलिए तो आप सबसे कहा था कि रिक्त स्थानों की पूर्ति कर दें। लेकिन यह नज़्म भी “तन्हा” हीं रह गई, किसी ने भी इसे पूरा करके इसका साथ नहीं दिया। खैर, लगता है कि अब किसी पंजाबन को हीं ढूँढ कर कहना होगा कि बताओ हमारे “राहत” भाईसाब क्या कह रहे हैं और उन पंक्तियों का अर्थ क्या निकलता है। हा हा.. अवनींद्र जी, आप देर आए, लेकिन आए तो सही.. आपके बिना महफ़िल में कमी-सी रह जाती। ये क्या, आपको अहमद फ़राज़ साहब का नाम नहीं याद आ रहा था। कोई बात नहीं, आप हीं के लिए हमने आज के पोस्ट में अहमद साहब की उसी ग़ज़ल का लिंक दिया है, वहाँ जाकर ग़ज़ल पढ लें, सुन लें और उनके बारे में जान भी लें। यह आपके लिए गृह-कार्य है। करेंगे ना? 🙂

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति – विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. “महफ़िल-ए-ग़ज़ल” श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक “तन्हा”. साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -“शान-ए-महफिल”. हम उम्मीद करते हैं कि “महफ़िल-ए-ग़ज़ल” का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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12 comments

AVADH November 24, 2010 at 6:23 am

वाकई सज्जाद अली की आवाज़ एक अजीब सी कशिश है और धुन भी सीधी सादी पर दिल को छू लेने वाली लगी.
लगता है गायब होने वाला शब्द रह गया.
अवध लाल

Reply
विश्व दीपक November 24, 2010 at 6:48 am

अवध जी,
हर महफ़िल में मुझसे यह गलत हो रही है। क्या करूँ!! चलिए मैंने शब्द गायब कर दिया है। आप जवाब दे दें और शेर भी डालें.. ज़रूर..

धन्यवाद,
विश्व दीपक

Reply
sumit November 24, 2010 at 6:55 am

गायब शब्द है मेहरबानी
शे'र अभी याद नही जैसे ही याद आयेगा महफिल मे फिर आऊँगा
तब तक के लिए bye bye…

Reply
sumit November 24, 2010 at 7:01 am

शेर याद आ गया
शेर- बहुत शुक्रिया बडी मेहरबानी
मेरी जिन्दगी मे हजूर आप आये

आगे की लाईन याद नही आ रही

Reply
प्रतीक माहेश्वरी November 24, 2010 at 7:19 am

क्या बात है… सज्जाद अली की आवाज़ बहुत खूब है… ये ग़ज़ल तो सुनी थी पर गायक के बारे में आज पहली बार पढ़ा.. बहुत अच्छा लगा…

गायब किया हुआ शब्द "मेहरबानी" है..

शेर तो फिलहाल यही लिख रहा हूँ:
"ज़िन्दगी से हम भी तर जाते,
जीते जी ही हम मर जाते,
पर उनकी नज़रों की ज़रा सी मेहरबानी न हो सकी"

आभार

Reply
सजीव सारथी November 24, 2010 at 7:48 am

vd bhai welcome back pahle to aur bahut bahut bahut shukriya……pata nahi kab se is geet ko dhoondh raha tha….waah thanks again

Reply
Manju Gupta November 24, 2010 at 12:16 pm

जवाब – मेहरबानी

शेर हाजिर है जनाब

चीनी से भी ज्यादा मीठी माफ़ी ,

महफिल सजा के की मेहरबानी .

Reply
shanno November 24, 2010 at 5:16 pm

टहलते हुए इधर से निकली तो महफ़िल में रोशनी और चहल-पहल दिखी. शुकर है खुदा का ( या महफ़िल चलाने वाले का ) कि बहुत लटके-झटके के साथ महफ़िल फिर से हिचकियाँ लेकर चालू हो गई. लगता तो ऐसा था जैसे बिलकुल ही ठप्प हो गयी हो 🙂 बार-बार महफ़िल की बत्ती गुल करके कहीं गायब हो जाना ये कहाँ की इंसाफी है भला ? 🙂 इस बार सज्जाद मियाँ ने भी अच्छा ही गाया…उनके उस्तादों की जो लाइन लगी देखी उससे बचकर निकल गयी…क्योंकि इतने नाम याद रखने की दिमाग में जगह नहीं….
और तन्हा जी, आपने पंजाबी सीखने की और पंजाबन की चर्चा की है..तो उस पर कहना है कि आप काहे को अफ़सोस को करते हो..ई बात कुछ पल्ले नहीं पड़ी. पंजाबी कुड़ियों की तो कोई कमी नहीं..कितनी तो मंडराती होंगी इधर उधर..या फिर भी दिक्कत हो तो पंजाबी सीखने की क्लास ज्वाइन कर लीजिये..वहाँ जरूर संभावना लगती है :)और इतनी गुजारिश है आप से कि हमरी ई बात का बुरा ना मानें…मजाक करिवे का कुछ हमरा भी हक बनता है, है ना ? 🙂

' मेहरबानी ' शब्द पर एक जलता-बुझता शेर लिखकर लाई हूँ..तो पेश है..

शमा के नसीब में तो बुझना ही लिखा है
मेहरबानी है उसकी जो जला के बुझाता है.

( स्वरचित )

अब हम जाइत हैं..बाई बाई…

Reply
AVADH November 24, 2010 at 5:53 pm

दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मेहरबानी चाहिए.
दुष्यंत कुमार (?)या निदा फाजली.
दुविधा हो गयी. कृपया मदद कर दें.
अवध लाल

Reply
avenindra November 27, 2010 at 2:13 pm

बहुत दीन बाद लगा की अपनी mehfil खोयी नहीं है मैं कई बार साईट खोलता था मगर कोई हरकत नज़र नहीं आती थी ,शन्नो जी ने भी अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है ,शायद आप kisi ज़रूरो काम मैं मसरूफ रहे होंगे ,खैर अब वापीस आप लोगों से मीलकर बेहद ख़ुशी हुई !
dil ही dil मैं ले लिया दिल मेहरबानी आपकी
दिल ये इस काबील कहाँ है कदरदानी आपकी
एक स्वरचित शेर भी अर्ज़ है —-
ऐ मेरे यार ज़रा सी मेहरबानी कर दे
मेरी साँसों को अपनी खुशबु की nishaani कर दे
मेरे होठों पे ठहर जा गुनगुना लूं तुझे
छलकती आंख की हर अश्क को पानी पानी कर दे !!(स्वरचित)

Reply
neelam November 30, 2010 at 5:31 am

मेहरवानी थी उनका या कोई करम था ,
या खुदा ये उनको कैसा भरम था …………

वो मेहरबाँ न थे पर नाखुदा भी तो न थे
वो थे किससे वावस्ता और किससे जुदा थे

जो अच्छा लगे उसे अपना लो जो बुरा लगे उसे जाने दो …………..V.D BHAI.

Reply
shanno November 30, 2010 at 2:09 pm

माफ कीजियेगा..नीलम जी की मेहरबानी / प्रेरणा से एक शेर अभी उपजा है..जो सेवा में प्रस्तुत है…

मेहरबानी हो बता दें क्या है वावस्ता
तो नाप लेंगे हम खुद अपना रस्ता.

( अभी बताया ना कि मेरे ही दिमाग की उपज है..तो स्वरचित ही हुआ ) 🙂

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