Dil se Singer

घायल जो करने आए वही चोट खा गए…….."गुमनाम" के शब्द और "रेशमा" आपा का दर्द

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४९

ड़े दिनों के बाद ऐसा हुआ कि महफ़िल में हाज़िरी लगाने के मामले में सीमा जी पिछड़ गईं और महफ़िल का मज़ा कोई और लूट गया। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं पिछली महफ़िल की प्रश्न-पहेली की। वैसे अगर शरद जी के लिए कुछ कहना हो तो हम यही कहेंगे कि “बड़े दिनों के बाद उन बेवतनों को याद वतन की मिट्टी आई है।” यूँ तो आप महफ़िल से कभी भी गायब नहीं हुए लेकिन ऐसा आना भी क्या आना कि आने की खबर न हो। वैसे तो हम सीधे-सादे गणित में अंकों का हिसाब लगाया करते हैं, लेकिन इस बार हमने सोचा कि क्यों न अंकों के मायाजाल में थोड़ा उलझा जाए। तो अगर हम ४७वीं कड़ी की प्रश्न-पहेली के अंकों को देखें तो हिसाब कुछ यूँ था: सीमा जी: ४ अंक, शरद जी: २ अंक और शामिख जी: १ अंक। अब हम इन अंकों को एक चक्रीय क्रम में आगे की ओर सरका देते हैं। फिर जो हिसाब बनता है, वही पिछली कड़ी की अंक-तालिका है यानि कि सीमा जी: १ अंक, शरद जी: ४ अंक और शामिख जी: २ अंक। अब बारी है आज के प्रश्नों की| तो ये रहे प्रतियोगिता के नियम और उसके आगे दो प्रश्न: ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, वहीं दूसरे स्थान पर आने वाला पाठक अपनी पसंद की ३ गज़लों को सुनने का हक़दार होगा। इस तरह चुनी गई आठ गज़लों को हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच पेश करेंगे। और साथ हीं एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि “अमुक” सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: –

१) एक शायर जिसे जीते-जी अपना एक हीं गज़ल-संग्रह “बर्ग-ए-नै” देखना नसीब हुआ और जिसने पूरी की पूरी छंद में एक नाटिका की रचना की थी। उस शायर और उसकी उस नाटिका के नाम बताएँ।
२) “तीसरा मिसरा कहीं पहले दो मिसरों में गुप्त है”- इस पंक्ति में किस फ़ार्म, किस विधा की बात की जा रही है। और उस फ़ार्म की तख़्लीक़ का श्रेय किसे दिया जाता है?

इन सवालों के बाद चलिए अब रूख करते हैं आज की गज़ल की ओर। आज की गज़ल की खासियत यह है कि इसके शायर गुमनाम हैं तो इसकी गायिका के बारे में लोगों को ज़्यादा कुछ मालूंम नहीं है। यूँ तो इनकी आवाज़ हिन्दुस्तान के कोने-कोने में रवाँ-दवाँ है, लेकिन कितनों को इनकी शख्सियत की जानकारी है, यह पक्के यकीन से नहीं कहा जा सकता। बरसों पहले सुभाष घई साहब की एक फिल्म आई थी “हीरो” जिसका एक गाना बड़ा हीं मक़बूल हुआ। उस गाने की मक़बूलियत का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी पिछले साल हीं रीलिज हुई “ज़न्नत” में एक नगमा उसी गाने पर आधार करके तैयार किया गया था। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं “चार दिनों का प्यार ओ रब्बा, बड़ी लंबी जुदाई” गाने की। इस गाने का असर ऐसा हुआ कि चाहे किसी को फिल्म की कहानी या फिल्म के कलाकार याद हों न हों, लेकिन इस गाने और इस गाने में छिपी कशिश की छाप मिटाए नहीं मिटती। कहते है कि जब “रेशमा” जी (यह नाम याद है ना?) को इस गाने के लिए संपर्क किया गया तो वो इस हालत में नहीं थीं कि इसे गा सकें। मतलब कि इन्हें अपनी “पश्तो” ज़बान छोड़कर और कोई भी ज़बान सही से नहीं आती थी और हिंदी/उर्दू के लफ़्ज़ों का सही तलफ़्फ़ुज़ तो इनके लिए दूर की कौड़ी के समान था। लेकिन सुभाष घई साहब और एल०पी० साहबान जिद्द पर अड़े थे कि गाना इन्हीं को गाना है। कई दिनों की मेहनत और न जाने कितने रिहर्सल्स के बाद यह गाना तैयार हो पाया। और जैसा कि कहते हैं कि “रेस्ट इज हिस्ट्री”। वैसे हम भारतीयों और हिंदी-भाषियों के लिए इनकी पहचान यहीं तक सीमित है लेकिन जिन्होंने इनके पंजाबी गाने सुने हैं उन्हें “रेशमा” आपा का सही मोल मालूम है। “शाबाज़ कलंदर” ,”गोरिये मैं जाना परदेस” और “कित्थे नैन न जोरीं” जैसे नज़्मों को सुनने के बाद और कुछ सुनने का दिल हीं नहीं होता। पाकिस्तान के एक अखबार “न्युज लाईन” के संवाददाता “आयेशा जावेद अकरम” के साथ “आपा” ने अपनी ज़िंदगी कुछ यूँ शेयर की: मेरा जन्म राजस्थान के बीकानेर में सौदागरों के एक परिवार में हुआ था। जन्म की सही तारीख मालूम नहीं क्योंकि घरवालों ने इसे याद रखना जरूरी नहीं समझा। वैसे मुझे इतना मालूम है कि देश के बंटवारे के समय मैं एक या दो महीने की थी और उसी दौरान मेरे परिवार का हिन्दुस्तान से पाकिस्तान जाना हुआ था। जब मेरा परिवार हिन्दुस्तान में था तो हम बीकानेर से देश के दूसरे कोनों में ऊँट ले जाया करते थे(क्योंकि हमारे यहाँ के ऊँट बड़े मशहूर थे) और उन जगहों से गाय-बकरियाँ लाकर अपने यहाँ व्यापार करते थे। हमारा समुदाय बहुत बड़ा था और हम खानाबदोशों की ज़िंदगी जिया करते थे। आपस में हममे बड़ा प्यार था। पाकिस्तान जाने के बाद भी यही सब चलता रहा। वैसे हममें से बहुत सारे अब लाहौर और करांची में बस गए हैं।

बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि “आपा” को नाक की हड्डी का कैंसर हुआ था। लेकिन उनके आत्म-विश्वास और उनके प्रशंसकों की दुआओं ने उन्हें वापस ठीक कर दिया। इस बारे में वो कहती हैं: क्या मैं आपको बीमार लगती हूँ? नहीं ना? फिर क्यों मेरे बारे में लोग लिखते रहते हैं कि मैं मर रही हूँ। हाँ, मुझे कैंसर था, लेकिन भला हो इमरान खान का, जिनके अस्पताल के डाक्टरों के इलाज से मेरा रोग जाता रहा। लेकिन मुझे मालूम नहीं कि इन अखबार वालों के साथ क्या दिक्कत है कि वे हमेशा मेरे खराब स्वास्थ्य के बारे में छापते रहते हैं और इसी कारण अब मेरे पास गाने के न्योते नहीं आते। अब आप बताएँ, बस ऐसे गुजारा होता है? मैं आपको यकीन दिलाती हूँ कि मैं दुनिया की किसी भी भाषा में गा सकती हूँ। इस खूबी में मेरा कोई योगदान नहीं है। सब ऊपर वाले का करम है, उसी ने मुझे ऐसी आवाज़ दी है। संगीत के सफ़र की शुरूआत कैसे हुई, यह पूछने पर उनका जवाब था: मैं हमेशा दरगाहों, मज़ारों और मेलों में गाया करती थी। एक बार इसी तरह मैं अपने किसी संबंधी की शादी में गा रही थी तो सलीम गिलानी साहब ने मुझे सुना और मुझे रेडियो पर गाने की सलाह दी। उस समय मेरी उम्र कोई ११-१२ साल की होगी। फिर तो मेरी नई कहानी हीं शुरू हो गई। “ओ रब्बा, दो दिनां दा मेल, ओथे फिर लंबी जुदाई”(यह गाना आपको सुना-सुना नहीं लग रहा, हीरो की “लंबी जुदाई” कहीं इसी की नकल तो नहीं है?) जैसे गाने घर-घर में सुने जाने लगे और इस तरह मैं धीरे-धीरे आगे बढती गई। भले हीं मेरा बहुत नाम था और अब भी है लेकिन इस दौरान मैने अपनी हया कायम रखी है और किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं किया है। दैनिक भास्कर में “आपा” से जुड़ा एक बड़ा हीं अनोखा किस्सा छपा था। आप भी देखें: यूं तो मलिका पुखराज को काफ़ी आत्म-केंद्रित व्यक्ति माना जाता था, मगर उनकी ज़िंदगी की कुछ ऐसी मार्मिक घटनाएं हैं, जिनसे उनके अंदर का इंसान उभरकर बाहर आ जाता है। अपने पति शब्बीर शाह की मृत्यु के बाद मलिका अंदर से ही टूट गईं। एक दिन उन्होंने गायिका रेशमा का गाया एक गीत “हैयो रब्बा! दिल लगदा नैयों मेरा” सुन लिया। रेशमा ख़ुद मलिका जी की बहुत भक्त थीं। मलिका जी ने उन्हें बुलवा भेजा। कहा कि वे एक ह़फ्ते उनके साथ उनके घर रुक जाएं और उन्हें यही गीत गा-गाकर सुनाएं। रेशमा ने इसे अपना सम्मान माना और ठहर गईं। अब दिन में कई बार रेशमा से गाने की फरमाइश होती। रेशमा गातीं और मलिका फूट-फूटकर रोना शुरू कर देतीं। इस क्रम से रेशमा डर गईं। हाथ जोड़े कि अब बस भी करें। मगर मलिका रोना चाहती थीं। सो रेशमा ने ख़ूब गाया और वे भी ख़ूब रोईं। यह आपा की आवाज़ में बसे दर्द का हीं असर था कि आँसू बरबस निकल पड़े। “आपा” के बाद अब बात करते हैं आज की गज़ल के गज़लगो की। सुरेन्द्र मलिक “गुमनाम” साहब के बारे में अंतर्जाल पर ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए अभी हम इन दो शेरों के अलावा कुछ और कह नहीं सकेंगे। वैसे यह तो ज़ाहिर है कि इन शेरों को लिखने वाला शायर “गुमनाम” हीं रहा और इसे गाकर जगजीत सिंह जी कहाँ से कहाँ पहुँच गए। है ना?:

काँटों की चुभन पाई, फूलों का मज़ा भी,
दिल दर्द के मौसम में रोया भी हँसा भी।

आने का सबब याद ना जाने की खबर है,
वो दिल में रहा और उसे तोड़ गया भी।

और यह रही आज़ की गज़ल, जिसे हमने “दर्द” एलबम से लिया है। तो आनंद लीजिए हमारी आज की पेशकश का:

लो दिल की बात आप भी हमसे छुपा गए,
लगता है आप गैरों की बातों में आ गए।

मेरी तो इल्तजा थी रक़ीबों से मत मिलो,
उनके बिछाए जाल में लो तुम भी आ गए।

ये इश्क़ का सफ़र है मंज़िल है इसकी मौत,
घायल जो करने आए वही चोट खा गए।

रोना था मुझको उनके दामन में ज़ार-ज़ार,
पलकों के मेरे अश्क उन्हीं को रूला गए।

“गुमनाम” भूलता नहीं वो तेरी रहगु़ज़र,
जिस रहगुज़र से प्यार की शम्मा बुझा गए।

चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली –

____ करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन यूँ ही औरों को सताया जाये

आपके विकल्प हैं –
a) ख़ुदकुशी, b) बेदिली, c) दिल्लगी, d) बेरुखी

इरशाद ….

पिछली महफिल के साथी –

पिछली महफिल का सही शब्द था “तेशे” और शेर कुछ यूं था –

मुसीबत का पहाड़ आख़िर किसी दिन कट ही जायेगा
मुझे सर मार कर तेशे से मर जाना नहीं आता…

यगाना चंगेजी साहब के लिखे इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना शामिख जी ने। आप बहुत दिनों के बाद समय पर हाज़िर हुए हैं। वैसे महफ़िल में पहली हाज़िरी तो निर्मला जी ने लगाई थी। निर्मला जी, आपको हमारी महफ़िल पसंद आ रही है, इसके लिए हम आपका तहे-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। लेकिन यह क्या, आपने तो शब्द/शेर-पहेली में हिस्सा हैं नहीं लिया। हमारी महफ़िल में कोई ऐसे खाली हाथ नहीं आता, आगे से इस बात का जरूर ध्यान रखिएगा 🙂 । शरद जी, आपसे भी यही शिकायत है।

तो हाँ, हम बात कर रहे थे शामिख जी के शेरों की, तो यह रही आपकी पेशकश:

हमसुख़न तेशे ने फ़रहाद को शीरीं से किया
जिस तरह का भी किसी में हो कमाल अच्छा है। (चचा ग़ालिब)

हाँ इश्क़ मेरा दीवाना ये दीवाना मस्ताना
तेशे को बना कर अपना क़लम लिखेगा नया फ़साना (अनाम)

जहाँ शरद जी इस बार स्वरचित शेरों के मामले में पिछड़ गए, वहीं मंजु जी ने अपना पलड़ा हल्का नहीं होने दिया। बानगी देखिए:

सैकड़ों तेशे चलाए थे नींव के लिए ,
चिन्नी थी दीवार इमारत के लिए . (हमारे हिसाब से यहाँ चुननी थी, होना चाहिए था)

इस बार हमारी महफ़िल बड़ी जल्दी हीं सिमट गई। शायद इसे किसी की नज़र लग गई है। तो हम चले नज़र उतारने का इंतजाम करने। तब तक आप महफ़िल में सबसे आखिर में हाज़िर होने वालीं सीमा जी के शेरों का मज़ा लें। खुदा हाफ़िज़!

एक हुआ दीवाना एक ने सर तेशे से फोड़ लिया
कैसे कैसे लोग थे जिनसे रस्म-ए-वफ़ा की बात चली (मुनिर नियाज़ी)

तेशे बग़ैर मर न सका कोह्‌कन असद
सर्‌गश्‌तह-ए ख़ुमार-ए रुसूम-ओ-क़ुयूद था! (अनाम)

कोह-ए-गम और गराँ, और गराँ और गराँ
गम-जूड तेशे को चमकाओ कि कुछ रात कटे (मखदूम मुहीउद्दीन)

प्रस्तुति – विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. “महफ़िल-ए-ग़ज़ल” श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक “तन्हा”. साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -“शान-ए-महफिल”. हम उम्मीद करते हैं कि “महफ़िल-ए-ग़ज़ल” का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर के तुम नाराज़ न होना….राजेंद्र कुमार की दरख्वास्त रफी साहब की आवाज़ में

Sajeev

14 comments

seema gupta September 29, 2009 at 4:58 am

1)तेरी आवाज़ आ रही है अभी…. महफ़िल-ए-शाइर और "नासिर"
महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३०
"सुर की छाया" नाटिका
सैय्यद नासिर रज़ा काज़मी

regards

Reply
seema gupta September 29, 2009 at 5:02 am

2)आदमी बुलबुला है पानी का….. महफ़िल-ए-यादगार और तख़्लीक-ए-गुलज़ार
महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०७
त्रिवेणी
श्री संपूरण सिंह "गुलज़ार
regards

Reply
seema gupta September 29, 2009 at 5:04 am

अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये

जिन चिराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ़ नहीं
उन चिराग़ों को हवाओं से बचाया जाये

बाग में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाये

ख़ुदकुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन यूँ ही औरों को सताया जाये

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये

निदा फ़ाज़ली
regards

Reply
seema gupta September 29, 2009 at 5:09 am

चाँद से गिर के मर गया है वो
लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है |

(गुलज़ार )
अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
बात बनाएँ, बिगड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।
(श्री अटल बिहारी वाजपेयी )
मेरी गुड़िया-सी बहन को ख़ुदकुशी करनी पड़ी
क्या ख़बर थी दोस्त मेरा इस क़दर गिर जाएगा
(मुनव्वर राना )
ग़म-ए-हयात से बेशक़ है ख़ुदकुशी आसाँ
मगर जो मौत भी शर्मा गई तो क्या होगा

(अहसान बिन 'दानिश' )
मेरा मकान शायद है ज़लज़लों का दफ़्तर
दीवारें मुतमइन हैं हर वक़्त ख़ुदकुशी को
(ज्ञान प्रकाश विवेक )
इन्तहा दर्द की न रास आई
करले वो ख़ुदकुशी तो क्या कीजे.
(देवी नांगरानी )

regards

Reply
सजीव सारथी September 29, 2009 at 5:30 am

वाह तनहा भाई, रेशमा जी के बारे में इतना कुछ भला और कहाँ मिल सकता है…..आपकी रिसर्च को सलाम….क्या "होटल" फिल्म का गाना "हायो रब्बा कैसी ये यारां दी यारी .." भी रेशमा की आवाज़ में नहीं था…..वाकई बहुत दरद है इस आवाज़ में…..

Reply
Manju Gupta September 29, 2009 at 3:03 pm

आदरणीय विश्व दीपक जी चुनना भी ठीक है .लेकिन यहाँ ईंट की जोड़ाई कराना या दीवार उठाने से अर्थ है .
आज का जवाब है खुदकुशी
जब तुम मेरे घर से रुखसत होते हो ,मनोदाह में जलता रात -दिन मन ,
ए मेरे रुस्तम ! कैसे बयाँ करूं हाल दिल
खुदकुशी करने को जी चाहता है .

Reply
Shamikh Faraz September 30, 2009 at 2:18 am

पहले सवाल का जवाब.
शायर का नाम. सैय्यद नासिर रज़ा काज़मी
"सुर की छाया" नाटिका
महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३०

दुसरे सवाल का जवाब.
त्रिवेणी
इसका श्री गुलज़ार साहब को दिया जाता है जिनका पूरा नाम सम्पुरण सिंह कालरा है.
महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०७

Reply
Shamikh Faraz September 30, 2009 at 2:22 am

ख़ुदकुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन यूँ ही औरों को सताया जाये

nida fazili.

Reply
Shamikh Faraz September 30, 2009 at 2:28 am

कैसे लोग हैं क्या खूब मुन्सुफी की है हमारे क़त्ल को कहते हैं खुदखुशी की है.
प्रकाश अर्श

Reply
Shamikh Faraz September 30, 2009 at 2:30 am

और कितनी ठोकरें खायेगी तू ऎ जिन्‍दगी
खुदकुशी करने को मयखाने तलक तो आ गई

munavvar rana

Reply
Shamikh Faraz September 30, 2009 at 2:31 am

कितने तारो ने यहाँ टूटकर ख़ुदकाशी की है
कब से बोझ से हाँफ़ रहा था बेचारा…..
चलो आसमान को कुछ मुक्ति तो मिली

gulzar sahab

Reply
Shamikh Faraz September 30, 2009 at 2:37 am

फूल अब करने लगे हैं खुदकुशी का फैसला,
बाग़ के हालात देखो कितने अब्तर हो गए।

मनीष शुक्ल

Reply
निर्मला कपिला September 30, 2009 at 4:13 am

बार बार ये लाजवाब गज़ल का लुत्फ उठाया धन्यवाद्

Reply
शरद तैलंग September 30, 2009 at 6:11 am

कल व्यस्तता रही इसलिए हाज़िर नहीं हो सका
पहेली का जवाब :
प्रश्न १ : कडी ३०/सुर की छया/ सैयद नासिर रज़ा काज़मी
प्रश्न २ : कडी ०७/ त्रिवेणी / गुलज़ार

शे’र :
दर्द के साथ दोस्ती कर ली
इसलिए मैने खुदकुशी कर ली
ज़िन्दगी को सवांरने के लिए
हमने बरबाद ज़िन्दगी कर ली । (स्वरचित)

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